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पानी ही पानी

दिल्ली में हर साल आती है बाढ़ हर साल सिर के ऊपर से गुज़रने लगता है पानी। और हर साल ढिठाई के साथ बयानबाज़ी करते हैं सरकारी गलियारे। …कमाल है जहाँ देखो पानी ही पानी है सिवाय सरकारी आँखों के। ✍️ चिराग़...

आन्दोलन

हम तो हर इक ज़ुल्म की हद से गुज़र भी जाएंगे शेर के बच्चे हैं, अपनी ज़िद पे मर भी जाएंगे ताश के पत्तों से बनते हैं सियासत के मकां ये तुम्हारे घर हवाओं से बिखर भी जाएंगे कौन रोके, गर फना होने पतंगा आ गया एक बादल सूर्य से लेने को पंगा आ गया ये सियासतदां संभल जाएं कि अब इस...

अन्ना आंदोलन

आज मैंने एक ग़ज़ब का नज़ारा देखा मैंने देखा एक होड़ सी लगी थी बारिश के जज़्बे से लोगों के जज़्बे की। झमाझम बरसात में दिल्ली की सड़कें उफ़न आईं थीं लोगों के हुज़ूम से। किसी को कोई डर ही नहीं था बीमार पड़ने का क्योकि वे सब आए थे देश की महामारी का इलाज़ करने। जहाँ तक निगाह जाती थी...

संकुचन

हम फैलाना चाहते हैं बाइबल को गीता को क़ुरआन को जातक को आगम को। लेकिन समेट लेना चाहते हैं अपने ईसा अपने कृष्ण अपने पैग़म्बर अपने बुद्ध और अपने महावीर। हमने शास्त्र बना दिया है किताबों को विस्तृत करके। और पुरखा बना दिया है भगवान को संकुचित करके। ✍️ चिराग़...

आज़ादी

शहीदों ने लिखी थी कल हमारे नाम आज़ादी मगर हमने बना डाली है इक इल्ज़ाम आज़ादी ‘ग़ुलामी की ज़दों में ज़िन्दगी दुश्वार होती है’ हमें चुपके से दे जाती है ये पैग़ाम आज़ादी कमाई से कहीं मुश्क़िल है दौलत की हिफ़ाज़त भी संभाले रख नहीं पाए कई सद्दाम आज़ादी घड़ी भर को नज़र चूकी, अंधेरा हो...
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