Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
सोशल मीडिया पर एक विपक्षी ने मोदी जी के उन भाषणों का वीडियो पोस्ट कर दिया जिनमें वे गिरते रुपये के मुद्दे पर केंद्र सरकार को कोस रहे हैं। वीडियो देखकर एक भाजपाई भड़क गया। उसने कमेंट में लिखा- ‘ज़्यादा अर्थशास्त्री बनने का नाटक मत करो और अपना कर्नाटक संभालो।’
राजनैतिक गलियारों में जो दल दूसरे को नंगा करने निकलता है, वह अपने कपड़े पहले ही उतार चुका होता है। इससे किसी और के हाथों नंगा होने का ख़तरा टल जाता है।
कर्नाटक-कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद को लेकर रस्साकशी चल रही है। दक्षिणपंथियों को यह देखकर सुकून मिल रहा है कि दक्षिण में कांग्रेस का कोई मध्यममार्ग नहीं निकल पा रहा है।
डीके शिवकुमार किसी गुप्त समझौते की बात कर रहे हैं। उधर सिद्धारमैया यह सिद्ध करने पर तुले हैं कि जब तक सरकार रहेगी, तब तक वे ही मुख्यमंत्री रहेंगे। कर्नाटक से संबंध रखनेवाले कांग्रेस अध्यक्ष द्वारा एक आधिकारिक बयान दिया गया जिसमें कवि का तात्पर्य यह था कि कर्नाटक के विषय में अंतिम निर्णय राहुल गांधी जी विदेश से लौटकर लेंगे।
जब गुत्थी सुलझने को तैयार नहीं हुई तो अध्यक्ष महोदय ने गुत्थी की गेंद बनाकर थर्ड अम्पायर के पाले में फेंक दी।
राहुल गांधी एक जेब में हाथ डालकर कर्नाटक कांग्रेस के क्रिकेट मैच की अंपायरिंग करने निकले। चूँकि डीके शिवकुमार कांग्रेस के आर्थिक संकटमोचक हैं इसलिए जेबवाला हाथ डीके ने पकड़ रखा है। अब बेचारे राहुल जी को एक हाथ से दोनों धड़ों का फैसला करना है।
राहुल जी जेबवाले हाथ से मुट्ठी भींचकर दूसरे हाथ को हवा में उठाने की कोशिश करते हैं। जैसे ही हाथ थोड़ा उठने लगता है, सिद्धारमैया अपना पंजा उनकी कोहनी पर गड़ा देते हैं। समय की मार देखो, एक घूसे में नारियल फोड़नेवाले राहुल गांधी, अपनी कोहनी टस से मस नहीं कर पा रहे हैं।
जेबवाले हाथ पर एक पक्ष का कब्ज़ा, हवावाले हाथ पर दूसरे पक्ष का कब्ज़ा। इस भावुक दृश्य को देखकर कांग्रेस की आँखें भीग जाती हैं। भारत जोड़ो यात्रा के प्रवर्तक एक बार अपने दोनों हाथ जोड़ना चाहते हैं लेकिन दोनों हाथ अलग-अलग दिशा में खींचे जा रहे हैं।
राहुल जी ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए अपने पंजे को कांग्रेस के चुनाव-चिह्न की मुद्रा में लहराया। भावुक कांग्रेसियों को लगा कि वे पार्टी का निशान दिखाकर नेताओं को मर्यादा सिखा रहे हैं। लेकिन व्यावहारिक कांग्रेसी समझ गए कि वे दरअस्ल ‘ओके-टाटा-बाय-बाय’ कर रहे हैं।
इस नाज़ुक समय में अमित शाह यदि कर्नाटक की ओर मुँह करके खड़े भी हो जाएँ तो कांग्रेस के पसीने छूट सकते हैं। लेकिन भाजपा अभी ऐसा कुछ नहीं करेगी। वह तो चुपचाप तमाशा देख रही है कि दोनों दावेदारों में से किसे भाजपा की सदस्यता दिलानी है और कौन कुछ दिन और कांग्रेस में ही रहनेवाला है।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Seriously Funny
देश भर में दीवाली का माहौल है और बिहार में चुनाव का। हालाँकि राजनीति तो बिहार को ही अयोध्या मानकर अपने राजतिलक की प्रतीक्षा कर रही है।
हर दल स्वयं को भरत माने बैठा है कि सत्ता के रामचंद्र जी आकर उसी से गले लगेंगे। सत्ता के गले पड़ने के लिए हर नेता ने ख़ुद के भरत होने की घोषणा कर रखी है, लेकिन बिहार जानता है कि ये सब भरत, विभीषण बन जाने का सही मौक़ा तलाश रहे हैं।
दरअस्ल चुनाव वह पंचवटी है जिसमें हर रावण, साधु बनकर सीताहरण का अवसर तलाशता फिरता है। मारीच मुद्दों को भटकाने के लिए सीता के सामने कंचनमृग बनकर विचरता है और जो लक्ष्मण, सीता की सुरक्षा के लिए उपस्थित होता है उसे सीता खरी-खोटी सुनाकर ख़ुद अपने से दूर कर देती है।
बहरहाल टिकटों की आतिशबाज़ी हो चुकी है, जिनके पटाखे फुस्स हो गए उन्होंने अपने रॉकेट की बोतल का मुँह पार्टी कार्यालय की ओर मोड़ दिया। जिनको टिकट मिल गई उन्होंने अपने भीतर के बारूद को कपूर बताकर पार्टी की आरती उतारनी शुरू कर दी।
जिन्हें टिकट की सूची में जगह नहीं मिली, उन्होंने अपने-अपने लंकेश को भ्रष्टाचारी घोषित कर दिया है। उधर हर लंकेश मन ही मन सेतुनिर्माण की सूचना से भयभीत है, किंतु अपने चेहरे पर अहंकार का मास्क चिपकाकर अपने विरोधियों को भालू-बंदर सिद्ध करने पर तुला है।
नीतीश कुमार जब भी चुनाव प्रचार पर निकलते हैं तो उन्हें यह स्मरण रहता है कि अपनी सोने जैसी इमेज की लंका में उन्होंने ख़ुद अपनी ही पूँछ से आग लगाई है।
अयोध्या में राम के राजतिलक की तैयारियाँ चल रही हैं और लंका भीषण युद्ध में घिरी हुई है। चुनाव के शोर-शराबे से चैन की नींद सो रहे कुम्भकर्ण भी डिस्टर्ब होकर जाग गए हैं।
कोई अपना मेघनाद दांव पर लगा रहा है तो कोई अपने लक्ष्मण के लिए संजीवनी मंगवा रहा है। कोई पराये वानरों को भी अपना बनाने में जुटा है और कोई अपने भाई को भी लतिया रहा है।
हर पटाखे की बत्ती सुरसुरा रही है, लेकिन हर उम्मीदवार इस आशंका से ग्रस्त है कि कहीं ऐसा न हो कि बत्ती उसके पटाखे की जले और धमाका किसी और के पटाखे में हो जाए।
युद्ध के बाद जिसे सीता मिलेगी उसके घर दीवाली मनेगी और बाकी सब अपने कुनबे के साथ बैठकर अमावस्या मनाएंगे। लेकिन एक बात तय है कि फ़िलहाल देश में दीवाली का माहौल है।
✍️ चिराग़ जैन

Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
तुम लड़ते रहे चुनाव, ओ साब
मेरी थाली खाली है रही है
मुझसे टैक्स वसूला जाए, उन्हें चढ़ावा जाए
मैं देकर भी झिड़की खाऊँ, वो खाकर गुर्राए
वो मुझे दिखावें ताव, ओ साब
मेरी जेब मवाली है रही है
मध्यम वर्ग बनाकर मुझको, दोनों ओर निचोड़ा
इन्हें दान दो, उन्हें मान दो, नहीं कहीं का छोड़ा
मेरा बढ़ता रहा अभाव, ओ साब
वहाँ रोज़ दीवाली है रही है
जीएसटी ने पहले सों ही इनकम कम कर राखी
रोड टैक्स देकर भी ससुरा टोल रह गया बाकी
मेरा कैसे होय बचाव, ओ साब
हर दिन बदहाली है रही है।
✍️ चिराग़ जैन
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चुनाव आचार संहिता के अनुसार वोटिंग से कुछ घंटे पूर्व चुनाव क्षेत्र में चुनाव प्रचार पर रोक लग जाती है। यह नियम दशकों से यथावत है। इधर परिस्थितियाँ बदल गईं। तकनीक बदल गई। अब ठीक वोटिंग के समय टेलीविजन पर चुनावी रैली का प्रसारण होता है। लेकिन इससे चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं होता, क्योंकि उक्त रैली का आयोजन संबद्ध चुनाव क्षेत्र की भौगोलिक सीमा के बाहर होता है और बेचारा चुनाव आयोग इतना भोला है कि उसे यह समझ ही नहीं आता कि रैली का आयोजन चाहे कहीं भी हो, लेकिन उसका प्रसारण यदि संबंधित चुनाव क्षेत्र में हो रहा है तो इससे मतदाता की सोच प्रभावित हो सकती है।
चुनावी ख़र्च की सीमा तय है। लेकिन चुनाव प्रचार के लिए सोशल मीडिया जैसे सशक्त माध्यम का प्रयोग भोले-भाले नियामक संस्थानों को समझ ही नहीं आता।
माननीय न्यायालय ने एक राजनेता को यह कहकर ज़मानत पर रिहा किया कि “आप न्यायालय के समक्ष लंबित अपने मुआमले का चुनावी रैली में प्रयोग नहीं करेंगे।” न्यायालय का सम्मान करते हुए उक्त राजनेता ने अपने पहले भाषण में अपने साथियों के legal matters का ज़िक्र किया लेकिन अपने वाले मामले का ज़िक्र नहीं किया इसलिए अदालत के आदेश की अवमानना नहीं हुई। उनके सहयोगियों ने उसी मंच से उस मैटर का ज़िक्र कर दिया जिसका ज़िक्र वे स्वयं नहीं कर सकते थे। लेकिन माननीय न्यायालय इसलिए कुछ नहीं कह सकता क्योंकि उक्त राजनेता ने न्यायालय के आदेश का शब्दशः पालन किया है।
पत्रकार किसी भी मतदाता के ‘गुप्त मतदान के अधिकार’ का अतिक्रमण नहीं कर सकता। लेकिन नेशनल टेलीविजन पर वोटिंग की लाइव कवरेज में पोलिंग बूथ पर मौजूद पत्रकार क्या रिपोर्ट कर रहा है, यह स्टूडियो में बैठे एंकर को साफ़ समझ आ रहा है, पैनल में बैठे प्रवक्ताओं और विश्लेषकों को साफ़ समझ आता है, दर्शकों को भी साफ़ समझ आता है लेकिन नियामकों को समझ नहीं आता क्योंकि उनकी आँखों पर नियम बंधा हुआ है।
सभी राजनैतिक दल और लगभग सभी राजनेता नियामकों की आँखों में नियम झोंककर धड़ल्ले से नियम तोड़ते हैं। और जनता नियामकों की नपुंसक पॉवर की खिल्ली उड़ाते हुए नुक्कड़ पर बैठकर चाय की चुस्की लेकर ठहाका लगाती है। बीच-बीच में इस नुक्कड़ पर व्यवस्था की चीख उठती है लेकिन वह चीख दूसरे पक्ष के ठहाके के शोर में दब जाती है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Lapete Mein Netaji, Poetry
जब खेलन देनउ नाय
तो हाय
जे खेल को ड्रामा काइं करनौ
बैटिंग करनेवालन के बल्ले ही तोड़ दए हैं
रन लेनेवालन के दोनूं जूते जोड़ दए हैं
सीमा कू चर गई गाय
आय हाय
जे खेल को ड्रामा काइं करनौ
कैसे फेंकें गेंद समूची पिच ही खोद रखी है
अपनी तीनों किल्ली तुमने भगवा पोत रखी हैं
भगवा कू कौन गिराय
मर जाय
जे खेल को ड्रामा काइं करनौ
जिधर जरा हरक़त हो गेंद उधर ही मुड़ सकती है
एम्पायर की अपनी ख़ुद की किल्ली उड़ सकती है
कोई कैसे हाथ हिलाय
रे हाय
जे खेल को ड्रामा काइं करनौ
✍️ चिराग़ जैन