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हम नहीं सुधरेंगे

मुझे कोविड-19 का दौर अच्छी तरह याद है। अपने-अपने घरों में कैद हम लोग, अपनी और अपनों की जान की ख़ैर मना रहे थे। ‘जान है तो जहान है’ -का अर्थ उस दौर में सारी दुनिया को एक साथ समझ आ गया था।
राजनीति के अतिरिक्त सब कुछ पूरी तरह रुक गया था। सब लोग त्याग, समर्पण, मानवता तथा वैराग्य किस्म की बातें करते थे। रिश्ते, प्रकृति, स्वास्थ्य और मनुष्यता का अर्थ सभी को ठीक-ठीक समझ आ गया था। महावीर का अपरिग्रह कुछ अंशों में सबके भीतर घटित होने लगा था। बिना किसी सरकारी ‘अभियान’ या ‘आदेश’ के भी लोग स्वच्छ रहने लगे थे।
मनुष्य के जीवन में आए इस परिवर्तन पर गिलहरी, चिड़िया, टिटहरी बधाई गाती फिर रही थीं। आसमान ने दिल्ली जैसे शहरों की मांग में तारे जड़ दिए थे। कोविड ने कुछ हद तक मनुष्यता के डीएनए को क्लीन कर दिया था।
‘कुछ हद तक’ इसलिए कि संकट की घड़ी में परस्पर सहयोग कर रहे लोगों का क्रेडिट हड़पनेवाले यशापेक्षी दैत्य उस दौर में भी नहीं सुधरे। सियासत उस समय भी ‘आपदा में अवसर’ तलाशती हुई वोट के गणित में व्यस्त थी। मरीज़ को अस्पताल में इलाज मिले, इससे पहले यह सोचा जाता था कि यदि यह मरीज़ ठीक हो गया तो इसका वोट हमारी पार्टी की ओर कैसे डायवर्ट होगा।
मनुष्य जाति पर इतना संकट था कि मरघट तक ने मानव की मिट्टी को शरण देने से कन्नी काट ली थी। स्थिति इतनी भयावह थी कि फोन की घंटी से दहशत होने लगी थी, कि कहीं कोई और ‘अपना’ तो नहीं चला गया। बेटे, अपने बाप की मिट्टी से ख़ौफ़ खा रहे थे।
भय ने मानव मन को इतना पवित्र कर दिया था कि बरसों-बरस से जिन रिश्तेदारों से बोलचाल बंद थी, उनको भी फोन करके हालचाल पूछने की पहल हो रही थी। सबके मन में क्षमा, करुणा, दया, अपनत्व और विरक्ति ने घर कर लिया था।
भय का इतना सकारात्मक परिणाम मैंने पहली बार उसी दौर में अनुभूत किया था। भय मनुष्य को मर्यादित करता है। भय मनुष्य को मनुष्य बनाता है। निर्भय होते ही मनुष्य में दानव जन्म लेने लगता है। निर्भय होते ही मानव मर्यादा लांघने लगता है।
आपको डूबने का भय नहीं रहेगा तो आप किनारे की सीमा लांघकर पानी के सीने पर अतिक्रमण करने लगेंगे। आपको गिरने का भय नहीं रहेगा तो आप पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण को चुनौती देने लगेंगे। आपको मरने का भय नहीं रहेगा तो आप मारने में नहीं हिचकिचाएंगे। आपको अस्वस्थ होने का भय नहीं रहेगा तो आप देह के अनुशासन को भंग करेंगे। आपको भूख का भय नहीं रहेगा तो आप अन्न का अपमान करेंगे।
यह सामान्य मानवीय स्वभाव है। इसीलिए कहा गया है कि ‘भय बिनु प्रीति न होई’। संबंध भी हम तब तक निबाहते हैं, जब तक उस संबंध को खोने का भय न हो। यहां तक कि किसी के साथ मनुष्यता का व्यवहार भी हम तभी तक कर पाते हैं जब तक उस व्यक्ति विशेष से हमें किसी प्रकार की हानि का भय रहता है।
जैसे ही हमें ज्ञात होता है कि अब सामनेवाला हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता, तुरंत हम अमानुष हो जाते हैं।
कोविड के समय हमने प्रकृति के महत्व को जाना था। तब यह अहसास हुआ था कि इस दुनिया को संभालने में प्रकृति, मनुष्य से कहीं अधिक सक्षम है। कई दशकों में मनुष्य ने जिस प्रकृति की सूरत बिगाड़कर रख दी थी, मानवीय हस्तक्षेप कम होते ही प्रकृति ने केवल एक ऋतुचक्र में अपनी खोई आभा पुनः जुटा ली।
लेकिन मनुष्य बहुत निमर्म है। जिन लोगों ने मनुष्य बनकर जीने की कसमें खाई थीं, वे ही लोग संकट के बीतते ही दोबारा वीभत्स हो गए। उस संकटकाल में सीखे गए सबक ताक पर रखकर मनुष्य ने फिर उसी आपाधापी में स्वयं को झोंक दिया। नदी की नीली धार से लेकर वृक्षों के हरे जिस्म तक सबको घायल करने का सिलसिला दोबारा शुरू हो गया। आसमान के चेहरे पर कालिख पोत दी। धरती की देह में सड़ांध बो दी।
सरकारी खजाने के बजट से वन लगाने के बजट पास हुए और भ्रष्टाचारी तंत्र वन लगाने के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये डकार गया। पृथ्वी बेचारी देखती रह गई। उसका जिस्म नंगा रह गया। अधिकारियों को धरती की बेबसी दिखाई नहीं देती। जब कभी पृथ्वी कराह कर उनके पैर पकड़ती है तो वे समझ ही नहीं पाते कि उनके पांव किसने पकड़े हैं। क्योंकि उनकी दृष्टि और उनके पैरों के बीच में उनका पेट लटका रहता है।
जिन रिश्तों के महत्व को समझते हुए हमने उस दौर में आंखें नम की थीं, उन्हीं रिश्तों को हम पुनः आंखें दिखाने लगे। जो पैसा उस दौर में ऑक्सीजन का एक सिलेंडर नहीं खरीद पा रहा था, उसी पैसे के लिए भाग-भागकर हम हांफ रहे हैं।
उस समय पैसा पड़ा था और संबंध काम आ रहे थे। आज संबंधों को लतियाकर पैसा कमाया जा रहा है। इन सब परिवर्तनों से समझ आ रहा है कि पर्यावरण केवल धरती का ही नहीं, बल्कि मनुष्य की मानसिकता का भी प्रदूषित है। प्रकृति तो अपने रंग-रूप को कुछ ही दिन में सुधार लेती है लेकिन मनुष्य न कभी सुधरा है, न कभी सुधरेगा। वह तो संकट के काल में सुधरने का अभिनय मात्र करता है।
✍️ चिराग़ जैन

जबरन वेक्सिनेशन

केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में हलफ़नामा दाखि़ल किया है कि किसी को जबरन वेक्सिनेशन नहीं लगाया जा सकता। यह ख़बर टीवी पर देखी और याद आ गया वह सब कुछ जो पिछले कुछ समय में व्यवहार में देखा है।
हवाई जहाज में यात्रा करने के लिए वेक्सीन की दोनों डोज़ होना अनिवार्य है। यदि ऐसा न हो तो हर बार यात्रा से 48 घंटे पूर्व का आरटीपीसीर दिखाना होगा (मूल्य न्यूनतम 500 रुपये प्रति टेस्ट)। लेकिन इसका यह बिल्कुल मतलब नहीं है कि सरकार ने किसी को वेक्सिनेशन के लिए विवश किया है।
सरकारी कर्मचारियों, डॉक्टरों, पुलिसवालों के साथ साथ ओला-उबर ड्राइवरों, डिलीवरी बॉय, चौकीदार, अर्बन क्लैप सर्वर व अन्य लोगों के लिए वेक्सिनेशन अनिवार्य किया गया। लेकिन किसी को जबरन वेक्सिनेशन के लिए विवश नहीं किया गया।
सुप्रीम कोर्ट भी सरकार के इस हलफ़नामे को फाइल में सहेज लेगा। आप जब मॉल, दफ़्तर वगैरह पर जाएंगे तो वहाँ गार्ड के व्यवहार से आपको महसूस होगा कि दोनों वेक्सिनेशन के बिना आपकी कहीं कोई इज़्ज़त नहीं है। लेकिन यह तय है कि किसी को वेक्सिनेशन के लिए मजबूर नहीं किया जा रहा।
आपके घर पर काम करनेवाली मेड को, आपकी गाड़ी साफ़ करनेवाले को (सरकारी निर्देशों का हवाले देकर) बिना वेक्सिनेशन के सोसाइटी में घुसने नहीं दिया जाएगा लेकिन किसी को भी वेक्सीन लगवाने के लिए विवश नहीं किया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि मेरी यह पोस्ट वेक्सीन अथवा कोविड संबंधी नियमों के पक्ष अथवा विपक्ष में कोई राय प्रस्तुत नहीं करती। इसका उद्देश्य केवल काग़ज़ी ख़ाना-पूरी और व्यवहारिक परिस्थिति के मध्य का अंतर स्पष्ट करना है।
इस वितण्डे में सभी सरकारें बराबर हैं। दिल्ली में आप कैब में दो से अधिक लोग नहीं बैठ सकते। मैं कई दिन से समझने की कोशिश कर रहा हूँ कि इससे कोरोना कैसे रुक जाएगा? मैं अपने माता-पिता को लेकर एक ही घर से निकलूँ लेकिन अगर एक ही कैब में बैठकर ट्रेवल करूँ तो कोरोना हो जाएगा।
मैं उन्हें लेकर अपनी गाड़ी में चलूँ या हायर करके टैक्सी में घूमूँ तो भी कोरोना नहीं होगा लेकिन ओला-उबर में बैठते ही कोरोना हो जाएगा।
समाजवादी पार्टी की चुनावी रैली में पीछे बैनर पर ‘वर्चुअल रैली’ लिख दिया जाएगा और कोरोना उस बैनर को पढ़ते ही चुनाव आयोग के नियमों का सम्मान करते हुए वापस लौट जाएगा।
दिल्ली में दुकानें खुलेंगी तो लोगों की भीड़ से कोरोना फैल जाएगा, लेकिन उन्हीं दुकानों के आगे रेहड़ी-पटरी लगाने पर कोरोना नहीं फैलेगा।
किसी राजनेता की रैली की तैयारी में सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियाँ उड़ती रहें लेकिन किसी बिटिया की विदाई के लिए आशीर्वाद देने वाली हथेलियों और किसी दिवंगत की शवयात्रा में कंधों की संख्या सीमित होनी चाहिए।
कोरोना के नाम पर समाज को जागरूक करने की बजाय ये जो ढोंग-ढकोसला चल रहा है, उसके चलते लोग इन नियमों के प्रति कैज्युअल हो रहे हैं। अदालतों में हलफ़नामे देकर आप काग़ज़ों का पेट तो भर देंगे साहब लेकिन आपने अपने आचरण से जनता के मन की इस उलझती गुत्थी को न सुलझाया तो आने वाले चुनावों में यही गुत्थी आपकी जीत की रफ़्तार को उलझा देगी।

~चिराग़ जैन

ओमिक्रोन की राजनीति

देश एक बार फिर दोराहे पर खड़ा हैं। एक ओर खुला राजमार्ग है जिसके दोनों ओर रोटी-पानी के स्रोत हैं लेकिन उसके हर मोड़ पर ‘दुर्घटना’ होने की आशंका भी है। दूसरी ओर वह बंद सड़क है, जो दुर्घटनाओं से तो हमें सुरक्षित कर देगी लेकिन रोज़मर्रा की ज़रूरतों का अभाव इस सुरक्षा का न्यूनतम मूल्य है।
इस दोराहे पर नेतृत्व का एक इशारा पूरे देश की नियति बन जाएगा। धर्मसंकट की इस घड़ी में नेतृत्व के कंधों की ज़िम्मेदारी महसूस की जा सकती है। एक ओर ऐसी सुरक्षा है जिसमें सम्पन्नता तो दूर न्यूनतम संसाधनों का भी अभाव हो जाएगा। और दूसरी ओर ऐसा जोखिम है जिसमें न्यूनतम आवश्यकता ही नहीं, वैभव-विलास तक का अभाव नहीं होगा।
सुबह-शाम एक-दूसरे की आँखों में झाँककर ‘लॉकडाउन लगेगा या नहीं’ -का उत्तर खंगालनेवालों को यह जानना होगा कि यह इतना सामान्य प्रश्न नहीं है, जितना हम समझ रहे हैं। सरकार राजमार्ग की ओर देश को ले जाएगी तो दूसरी लहर का हाहाकार स्मृतियों में उभरकर कान के पर्दे फाड़ देगा और बन्द सड़क की ओर देखने का प्रयास करेगी तो भूख और बेरोज़गारी के अजगर साँस लेना दूभर कर देंगे।
सरकार इस स्थिति में क्या निर्णय लेगी, यह उसके विवेक पर छोड़ना चाहिए लेकिन जनता यह अपेक्षा अवश्य करेगी कि जिस भी दिशा में देश को मोड़ा जाए, नेतृत्व उसके साथ उसी दिशा में चलता दिखाई दे। यदि जनता को बन्द गली में क़ैद करके नेतृत्व राजमार्ग के दोनों ओर बनी सुविधाएँ भोगता दिखा तो बन्द गली की घुटन से जनता के भीतर विस्फोट की आशंका उत्पन्न हो जाएगी और यदि जनता को राजमार्ग पर छोड़कर नेतृत्व ने स्वयं को बंद गली में सुरक्षित कर लेना चाहा तो राजमार्ग पर होनेवाली हर दुर्घटना की चीत्कार नेतृत्व के लिए ऐसी चिंघाड़ बन जाएगी, जिसमें जय-जयकार के नारों का शोर कभी सिर नहीं उठा पाएगा।
चुनाव निश्चित रूप से लोकतंत्र के लिए सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं लेकिन इस बार प्रशासन को चुनाव करना है कि राजनीति की दुकान को बचाना है या उन दुकानों के ग्राहकों को…!
✍️ चिराग़ जैन

रचनाकार

जीवन के तमाम प्रश्नचिन्हों के मध्य भी अपने भीतर के कबीर और तुलसी को बचाए रखनेवाले रचनाकार, वर्तमान के ऐसे विस्मयादिबोधक हैं, जिन्हें युग का सम्बोधनकारक बनने के लिए केवल युग के प्रारम्भ की घोषणा करनी है।

✍️ चिराग़ जैन

दो साल बाद कवि सम्मेलन

दो साल के घनघोर निठल्लेपन के बाद मुझे कवि-सम्मेलन का आमंत्रण मिला तो मैं फूला नहीं समा रहा था। सोशल डिस्टेंसिंग का ख्याल न होता तो उस दिन मेरा आयतन दो गज की सीमा को पार कर गया होता। जिस मोबाइल की घण्टी से भी रेमडिसिवर की बदबू आने लगी थी, उससे फिर से होटल से उठाए हुए शैम्पू और साबुन की ख़ुशबू आने लगी।
कोविड के भयावह दौर से गुज़र कर जो धड़कन विरक्ति की झपताल में चलने लगे गयी थी उसने यकायक द्रुत गति की कहरवा का रुख़ कर लिया।
पुराने मकान की दीवार पर गड़ी हुई कील में युगों से लटक रहे रस्सी के टुकड़े जैसी बेकार मेरी उंगलियाँ अचानक हाईटेंशन वायर की तरह फड़फड़ाने लगीं। मैनें मोबाइल में पड़ी ट्रेवल एप को इन फड़फड़ाती उंगलियों से छुआ तो उस एप्प ने मुझे उसी दृष्टि से देखा जिस दृष्टि से कभी देवकी माई ने कंस को मारकर आए कन्हैया को देखा होगा।
‘डिपार्चर’; ‘अराइवल’; ‘ट्रेवल डेट’ और ‘पैसेंजर डिटेल’ जैसे शब्दों को पढ़कर मेरी आँखें भर आईं। भीगी पलकों से बुक हुई टिकट को देखा तो उसका एक-एक शब्द अजंता की किसी अप्रतिम पेंटिंग की तरह मन पर छप गया। जिस एयरलाइंस के लोगो को भी कभी नज़र उठाकर नहीं देखा था, उसके लोगो की एक-एक लकीर को आँखों में बसा लिया। पीएनआर ऐसे रट गया, ज्यों साधनारत किसी तपस्वी को मंत्र रट जाता है।
टिकट बुकिंग का अलौकिक आनन्द उठाने के पश्चात मेरी गर्दन ने घूमकर कमरे के उस कोने पर दृष्टिपात किया, जहाँ चार-चार पहियों की स्वामिनी एक अटैची दो वर्ष से जड़वत खड़ी थी। ज्यों ही मैंने उसे छुआ तो ऐसा महसूस हुआ कि बरसों से पाषाण की तरह जी रही किसी अहल्या में प्राण संचरित हो गये हों। मेरे हाथ लगाते ही वह अपने चारों पहियों पर एक साथ नृत्य कर उठी। हैंडल पकड़कर मैंने उस पर नियंत्रण न किया होता तो वह उसी क्षण दौड़कर हवाई अड्डे पहुँच गयी होती।
मैंने बड़े प्यार से अटैची को बिस्तर पर लिटाया। फिर सलीक़े से उसकी ज़िप को टटोल कर रनर को पकड़ा। अटैची की ज़िप खुलने की आवाज़ सुनने को व्याकुल कान उत्साह में आँख के करीब झुक चुके थे। रनर एक निश्चित दिशा में चलने लगा और अटैची की सीत्कार जैसी आवाज़ ने पूरे माहौल को रोमांचित कर दिया। दोनों रनर बौराए हुए तीतरों की भाँति अलग-अलग दिशा में दौड़ गये और मेरे बाएँ हाथ ने आगे बढ़कर लगभग इस अंदाज़ में अटैची के दोनों फलक खोल दिये ज्यों अलीबाबा सिमसिम के भीतर कोई ख़ज़ाने का बक्सा खोल रहा हो। अटैची खुलते ही मेरी आँखें अटैची से होड़ करने लगीं। हालाँकि यह मुझे पहले से पता था कि अटैची ख़ाली होगी लेकिन फिर भी मैं आँख फाड़-फाड़कर उस ख़ालीपन को अपनी आँखों में भर लेना चाहता था।
अटैची में सजाने को जब मैंने कपड़ों की अलमारी खोली तो अलमारी के कब्ज़ों ने चूँ की आवाज़ करके मुझे सूचना दे दी कि कपड़े काफ़ी नाराज़ हैं, ज़्यादा चू-चपड़ मत करना। मैंने शर्मिंदगी से भरकर कलफ़ लगे कपड़ों की ओर देखा तो उन्होंने मुझे उसी हिकारत से देखा जैसे द्रौपदी ने चीरहरण के बाद युधिष्ठिर को देखा था। किंतु ढीठ होकर मैंने भी हैंगर पकड़कर एक जोड़ी पैंट-शर्ट को ठीक वैसे उतार लिया जैसे कीचक की अभद्रता के बाद भी कंक ने सैरन्ध्री को समझाने-बुझाने की हिम्मत जुटा ली थी।
लेकिन इस बार कपड़े मुझसे ज़्यादा ढीठ निकले। हैंगर से उतरने के बाद भी उनके माथे पर एक सिलवट पड़ी रह ही गयी थी। मैं समझ गया कि इस बार नरमी से काम न चलेगा। इतने दिन एक ही आसन में टँके-टँके कपड़ों ने अकड़ना सीख लिया है, सो मैंने भी इस्तरी लेकर उन्हें गर्मी दिखाई तब जाकर मुआमला शान्त हो सका।
एक-एक सामान को समझा-बुझाकर अटैची में जमाने के बाद अटैची के दोनों रनर्स को पुनः क़रीब लाया गया और महीनों से ख़ाली खड़ी बेचारी अटैची को तृप्त करके एक ओर खड़ा कर दिया गया। भीतर से भरे व्यक्तित्व की तरह अटैची का आत्मविश्वास भी देखने लायक था। पहले छूने भर से बौरा जाने वाली अटैची अब हिलाने पर भी ठहरकर पाँव बढ़ा रही थी।
मैं पूरी तैयारी करके मोबाइल में सुबह चार बजे का अलार्म लगाने लगा तो मोबाइल की घड़ी ने टोका – ‘इतने फॉर्मल क्यों हो रहा है बे, दो साल बाद कार्यक्रम का आमंत्रण मिला है। दस तो बज ही गए हैं… चार-छह घण्टे इस आमंत्रण का प्रचार कर… इस क्षण को एन्जॉय कर…!’
मुझे अपने टुच्चेपन पर शर्मिंदगी हुई। भरा हुआ कवि भी भला सोता है! यही तो समय है आत्मविश्वास के साथ बाक़ी कवियों को फोन कर-करके यह कहने का- ‘चलो, अब मैं सोता हूँ, सुबह जल्दी उठना है, छह बजे एयरपोर्ट पहुँचना है ना!’

✍️ चिराग़ जैन

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