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इस राह चलकर देखते हैं

चलो, इस राह चलकर देखते हैं कहाँ बदले मुकद्दर, देखते हैं कहीं मुस्कान तो लब पर नहीं है मेरे आँसू छलककर देखते हैं हमें तो दिख रहा है कंठ नीला यहाँ सब सिर्फ शंकर देखते हैं हमारे हौसलों की थाह मत लो कहाँ तक है समंदर, देखते हैं अगर हँसता हुआ मिल जाऊँ उनको तो जिगरी यार जलकर...

प्रेम के इक ताल में

आजकल मुझसे न पूछो, कब उगा सूरज गगन में आजकल मैं प्रेम के इक ताल में उतरा हुआ हूँ बुद्धि का मत है विकलता मौन से होगी नियंत्रित किन्तु हर इक रोम अब वाचाल हो बैठा अचानक अब गिरा या तब गिरा का एक कौतुक चल रहा है मन मुआ मोती भरा इक थाल हो बैठा अचानक भाग्य है जिसका चुभन...

पुत्री के जन्म पर

इक किरण सूर्य की आई हो जैसे धरती के प्रांगण में वैसे ही आई है बिटिया मेरे मुस्काते जीवन में उसके आ जाने से मेरी मुस्कानों ने मआनी पाए उसको गोदी में ले चूमा तो अन्तस् ने उत्सव गाए शब्दों को ख़ूब निचोड़ लिया फिर भी यह गान अधूरा है बिटिया के जन्मोत्सव के इस सुख का अनुमान...

ओस पड़ी है

सपनों के कुछ चित्र खिंचे हैं, अन्तस के कॅनवास पर यूँ समझो कुछ ओस पड़ी है, सूखी-सूखी घास पर आँसू से मुस्कान भिगोई, तब जाकर कुछ रंग मिले सीमाओं के पिंजरे तोड़े, इच्छाओं के पंख हिले फिर पहरों तक मुग्ध रहे हम, मन के सहज उजास पर अलकों के पीछे इक दुनिया बसती है उल्लासों की...

संक्रमण काल

चौपालों पे कितने ठहाके गूंजा करते थे आज अधरों पे मुस्कान भी नहीं रही कभी स्वाभिमान तलवारों से दमकता था आज तलवार छोड़ो, म्यान भी नहीं रही पेड़ों से घरों की पहचान थी कभी पर अब पेड़ भी नहीं हैं पहचान भी नहीं रही नारियों के हाथ में भी आई न व्यवस्था और हद ये है पुरुष प्रधान...
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