Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
प्रेम चलकर नित्य आता है हमारे द्वार अब भी
पर हमारी बाजुओं का पाश छोटा हो गया है
रोज़ सूरज रश्मियां अपनी लुटाता फिर रहा है
पर धरा की सोच का आकाश छोटा हो गया है
स्वप्न देखें रौशनी का, आँख पलकों में छिपाकर
कोसते हैं भाग्य को हम, अवसरों से मुँह चुराकर
साँस का सत्कार करने का नहीं है होश हमको
चाहते सौभाग्य हम, दुर्भाग्य पर नज़रें गड़ाकर
सामने खुशियाँ सुगंधित फूल चुनकर रख रही हैं
पर हमारी पुतलियों का व्यास छोटा हो गया है
उत्सवों में हम निजी एकांत लेकर जी रहे हैं
वास्तविकता त्याग दी, सिद्धांत लेकर जी रहे हैं
रोज़ करते फिर रहे पाखण्ड हम गंभीरता का
हम उदासी के लिए मुख क्लांत लेकर जी रहे हैं
हर गली, हर गाम पर, बिखरी पड़ी हैं खिलखिलाहट
पर हमारे प्राण में उल्लास छोटा हो गया है
अतिथियों को नाम से आवास घबराने लगा है
भूख इतनी बढ़ गई, उपवास भय खाने लगा है
हास्य को उपरांत यूँ संत्रास की चिंता बढ़ी है
क्रोध की कर कल्पना परिहास कतराने लगा है
कौन जाने किस घड़ी किसने छला है हम सभी को
आदमी का आपसी विश्वास छोटा हो गया है
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Shabdon Ki Kunjgaliyaan
सुख, कुछ ढूंढने में नहीं है। कुछ ढूंढने के लिये तो एषणा का आधार चाहिए, कुछ ढूंढने का अर्थ है कि इच्छाओं की विषबेल पोषित हो रही है। सुख और इच्छा बिल्कुल विपरीत तत्व हैं। इच्छाओं की पगडंडी सुख के आगार तक पहुँच ही नहीं सकती।
सुख तो स्वीकार्यता से जन्मता है। अपने वर्तमान को स्वीकार कर लेना, सुख के शिखर का पहला सोपान है। अपनी परिस्थितियों से एकाकार हो जाना न्यूनतम अर्हता है सुखी होने की।
तथागत के नयन निमीलित इसीलिए हैं कि वे बहुत दूर दिखनेवाली मरीचिका को देखने से निषिद्ध हैं। वे ऊतनी भर पलकें खोले हैं, जिनसे वर्तमान पल को देखा जा सके। वर्तमान के सौंदर्य को निहारा जा सके। भविष्य की तलाश वर्तमान के सौंदर्य को अनदेखा कर देती है।
हम न जाने क्या ढूंढते-ढूंढते कहीं खो गए हैं। हम किसी कल्पना की आस में वास्तविकता का अपमान किये चले जा रहे हैं। इसलिए तलाशो मत, जो हाथ में है उसे जी लो। अगर हाथ ख़ाली हों, तो इस ख़ालीपन को ही जी लो। यह रिक्तता किसी पूर्ति की आशा से कहीं अधिक आनंददायी है।
उपलब्ध को अनदेखा करके अभीष्ट के लिए कसमसाना, अतिक्रमणवादी का चलन है। कोई महावीर इसकी अनुशंसा नहीं करता, कोई बुद्ध इसका समर्थन नहीं करता, किसी जीसस के आचरण से ऐसी प्रेरणा नहीं मिलती। गीता में जिसे स्थितप्रज्ञ कहा गया है, वह इस प्रवृत्ति की विलोम मनोदशा है।
कृष्ण अपने वर्तमान को जीते रहे। उन्होंने जिस पल को जिया उसी में रम गए। वृंदावन में गैया चराते कान्हा को देखकर यह अनुमान कर पाना कठिन था कि यही व्यक्ति एक दिन राजनैतिक महाभारत का केंद्र बिंदु होगा। वृंदावन में रास रचाते कन्हैया को देखकर यह कल्पना नहीं की जा सकती थी कि यही किशोर इंद्रप्रस्थ और द्वारका जैसे नगर बसाएगा। इसलिए वर्तमान को देखकर भविष्य का अनुमान लगाने में ऊर्जा नष्ट न करो। कृष्ण ने वृंदावन में महाभारत नहीं किया। वह पल रास का पल था। वह क्षण बाँसुरी का क्षण था। तब भरपूर रास रचाया गया। तब भरपूर बंसी बजाई गई। और इतना रास रचा लिया कि जब मथुरा-गमन हुआ तो रास की कोई आकांक्षा उनके पैर न पकड़ पाई। जब कुरुक्षेत्र के मौदान में रथ हाँका तब बंसी के स्वरों ने उनकी स्मृतियों में व्यवधान उत्पन्न नहीं किया।
वर्तमान को जीनेवाला भविष्य की चिंताओं से तो मुक्त होता ही है, अतीत की स्मृतियों से भी अछूता रहता है।
जिसने बचपन पूरा जी लिया, उसका यौवन तृप्त होता है, और जिसने यौवन भरपूर जी लिया उसका बुढ़ापा भव्य होता है। भरपूर बचपन जीकर युवा होनेवाला व्यक्ति बचपन के अभावों से दुःखी नहीं रहता।
जब आप भरपेट भोजन करते हो, एक-एक कौर का स्वाद लेकर भोजन करते हो, तो फिर भोजन का वह क्षण आपकी स्मृतियों का स्थान नहीं घेरता। लेकिन जब आपको भरपेट भोजन न मिल सका हो, जब आपकी थाली आपकी क्षुधा को पूर्ण न कर पाई हो, या जब आपने दूसरे की पत्तल में झाँकते हुए भोजन किया हो; तब वह कष्ट आपको ज़रूर याद रह जाता है। इसलिए वर्तमान को भरपूर जीना ही एकमात्र उपाय है। इसमें कुछ सकारात्मक और नकारात्मक है ही नहीं। जो है वह सच है। सत्य केवल सत्य है। उसमें कुछ अच्छा या बुरा नहीं है। उसमें कोई सौभाग्य या दुर्भाग्य नहीं हो सकता।
हर वर्तमान को एक दिन कथा हो जाना है। इस कथा में हम अपने क़िरदार में पूरी तरह पगे हुए दिखने चाहियें। जो अभिनेता अभी के दृश्य में आगेवाले दृश्य के संवाद बोलेगा, उसे मंच से उतार दिया जाएगा।
कोई नायक या खलनायक है ही नहीं। सब केवल अभिनेता हैं। नायक और खलनायक तो किरदार के नाम हैं। जो अपना क़िरदार ईमानदारी से निभाएगा, वह सुखी रहेगा। नायक से खलनायक के चरित्र की तुलना करनेवाले नादान लोग हैं। तुलना अभिनय की हो सकती है, किरदार की नहीं। किरदार तो दोनों ही महत्वपूर्ण हैं।
अपने किरदार के प्रति ईमानदार रहना ज़रूरी है, अन्यथा अपनी भूमिका सही से न निभा पाने की बेचैनी से नींद की खड़ी फ़सल को करवटों का पाला मार जाता है। सुख हमको ढूंढना तब शुरू करता है, जब हम सुख को ढूंढना बन्द कर देते हैं।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जिन डेरों ने उत्सव पूरा था रैना के आँचल में
भोर उन्हीं डेरों पर इक वीराना पाती है
अंधियारे में जीवन सबका रंग-रंगीला लगता है
पहली किरण उदासी का अफ़साना पाती है
जिनके बिन हर महफ़िल का सिंगार अधूरा होता है
उन फूलों का गुच्छा सुबह केवल घूरा होता है
जिसके दम पर महफ़िल अपना सिर ऊँचा कर लेती है
वो सब कुछ सुबह होने तक चूरा-चूरा होता है
झूठे रंग उतर जाते हैं रात गुज़रने से पहले
भोर महज सच का बदरंग ख़ज़ाना पाती है
साज पड़े होते हैं लेकिन सुर थक कर सो जाते हैं
देह पड़ी रह जाती है और प्राण कहीं खो जाते हैं
जिनका आकर्षण था उनसे दिल घबराने लगता है
जश्न सुबह की क्यारी में इक सन्नाटा बो जाते हैं
रात जवानी की बाँहों में रास रचाती फिरती है
और सुबह रंगरलियों से उकताना पाती है
✍️ चिराग़ जैन
Chhookar Nikli Hai Bechaini, Chirag Jain Writings, Geet, Poetry
मेले में भी पहुँचे साथ झमेले लेकर
उत्सव किस सूरत तुमको आकर्षित करते
बाँहें फैलाते होंगे जब खेल-खिलौने
कंगाली के दंश तुम्हें बिलखाते होंगे
आकर्षण उभरा होगा जब मुस्कानों का
लाभ-बचत का तब तुम गणित लगाते होंगे
द्वन्द वहाँ था आशा और निराशाओं का
तुम बढ़कर आशाओं को अपराजित करते
रामकथा से इतनी सीख न पाई तुमने
ठीक दिशा का बाण, अधम का अंत करेगा
अडिग रहो तुम शांत तथागत जैसे बनकर
तेज तुम्हारा हर डाकू को संत करेगा
अभिनय से जीवन का सार ग्रहण करना था
उलझन से ख़ुद को कुछ देर विभाजित करते
सरगम की पहली कक्षा से ऊब गए तो
अनहद का संगीत नहीं साधा जाएगा
धरती के प्राणी को अवरोधक माना तो
ईश्वर सा मनमीत नहीं साधा जाएगा
हर झूले की पींग तुम्हें ही लेकर उछले
ऐसी इच्छाओं को क्षण भर विस्मृत करते
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
चलो, इस राह चलकर देखते हैं
कहाँ बदले मुकद्दर, देखते हैं
कहीं मुस्कान तो लब पर नहीं है
मेरे आँसू छलककर देखते हैं
हमें तो दिख रहा है कंठ नीला
यहाँ सब सिर्फ शंकर देखते हैं
हमारे हौसलों की थाह मत लो
कहाँ तक है समंदर, देखते हैं
अगर हँसता हुआ मिल जाऊँ उनको
तो जिगरी यार जलकर देखते हैं
अगर मुस्कान से परहेज रखूँ
तो फिर बच्चे सहम कर देखते हैं
अभी मजबूरियों की चल रही है
इरादे आह भरकर देखते हैं
यही एहसास दिल को खुश रखे है
वो हमको छुप-छुपाकर देखते हैं
✍️ चिराग़ जैन