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कश्मीर विलय

बड़बोलों को भी तो समझा लो
नकेल कोई डालो
इन्हें भी ज़रा टोक दीजिये

कोढ़ मिटा है लेकिन मद में बिल्कुल फूल नहीं जाना
जिसमें घृणा पढ़ाई जाए, उस स्कूल नहीं जाना
जश्न मनाना लेकिन हरगिज़ आउट ऑफ रूल नहीं जाना
उनकी इज़्ज़त, अपनी इज़्ज़त, इसको भूल नहीं जाना
अपने मन को भी कुछ तो खंगालो
घृणा है तो मिटा लो
प्यासों को अपनी ओक दीजिये

बिगड़े बच्चे घर आए हैं, उनको थोड़ा प्यार करो
ताने दे-देकर मत उनको, लड़ने को तैयार करो
जो झुकता है, वही फलेगा, इस सच का विस्तार करो
जो भी हैं, जैसे भी हैं, अपने हैं ये स्वीकार करो
छोटे भाइयों को गले से लगा लो
ओ फेसबुक वालो
ज़ुबानी जंग रोक दीजिये

✍️ चिराग़ जैन

उचक्कों की भाभी

छोरे उचक्कों से दिन-रात घर की रखवाली करते थे। घर का बूढ़ा उचक्कों के मुहल्ले से होकर गुज़रता था।
उचक्कों की भाभी बूढ़े को देखकर स्माइल पास करती थी। स्त्री की मुस्कुराहट से बूढ़े को थोड़ी-थोड़ी गुदगुदी होती लेकिन उचक्कों की हरकतें ध्यान आते ही वह तेज़ी से आगे बढ़ जाता। गर्मी का मौसम आया तो बूढ़ा कभी-कभी थकान मिटाने के लिए उचक्कों की भाभी के चबूतरे पर बैठ जाता। भाभी ने भी मौक़ा देखकर बूढ़े को बैठते ही ठंडा पानी पिलाना शुरू कर दिया। एक दिन शर्बत पिलाते हुए भाभी ने बूढ़े से कहा- “ए जी, आपके घर के बाहर जवान लौंडे पहरा देते हैं तो मेरे देवर घर में सेंध नहीं लगा पाते। आप उन्हें रोकते क्यों नहीं। कम से कम अगली दिवाली तक अपने छोरों को पहरेदारी से हटा लो ताकि बेचारे सेंधमार उचक्के आपके घर से कुछ बर्तन-भांडे चुरा कर दिवाली का जुआ खेल सकें।”
भाभी की बात सुनकर बूढ़े को अपने छोरों पर क्रोध आया और उचक्कों पर दया आई। घर लौटते ही तमतमाकर छोरों की क्लास लगाई, और बोला- “एक महीने बाद दिवाली है, अगर किसी उचक्के की धरपकड़ की तो मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। जाओ कुछ हिल्ला करो, आज से ये लठैती बंद!”

नोट : इस कहानी को कश्मीर से जोड़ कर मुझे शर्मिंदा न करें।

Ref : Military restrictions in Kashmir on Eid

✍️ चिराग़ जैन

ईद के अवसर पर कश्मीर में सेना पर प्रतिबंध

सुना है एक मदमस्त हाथी ने
बिल्ली के कहने पर
शेरों के हाथ बांध दिए
ताकि भेड़िये मेमनों की दावत उड़ा कर
ईद मना सकें।

शेरों को आदेश है
कि लकड़बग्घे उन्हें अपमानित करें तो हो लें
क्योंकि बेचारे लकड़बग्घों का रमज़ान है
उनसे अपमानित हो लोगे तो बेचारे ख़ुश हो जाएंगे।

✍️ चिराग़ जैन

राजनीति के दो चेहरे

दृश्य 1
एंकर : आप जीएसटी बिल पर कांग्रेस से क्या अपेक्षा करते हैं।
भाजपाई : कांग्रेस देशहित के लिए इस बिल का समर्थन करे।
कांग्रेसी : लेकिन 2013 में तो इसी बिल का भाजपा ने विरोध किया था।
भाजपाई : बीती ताहि बिसार के आगे की सुधि ले।

दृश्य 2
एंकर : आपकी सरकार कश्मीर समस्या का कोई समाधान क्यों नहीं निकाल पा रही?
भाजपाई : कश्मीर समस्या नेहरू जी की ग़लती का परिणाम है।
एंकर : आप आतंकवाद से नहीं निपट पा रहे हैं।
भाजपाई : आतंकवाद इंदिरा गांधी की देन है।
एंकर : भ्रष्टाचार और काला धन आपके नियंत्रण में नहीं आ रहा।
भाजपाई : कांग्रेस के साठ साल के शासन में भ्रष्टाचार व्याप्त हुआ है।
कांग्रेसी : लेकिन आप तो कहते हैं कि बीती ताहि बिसार के आगे की सुधि ले।
भाजपाई : नहीं रे, हर जगह एक सी कविता नहीं चलती रे।
एंकर : तो यहाँ के लिए कौन सी कविता है?
भाजपाई : लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई।

✍️ चिराग़ जैन

पटनीटाॅप : मुहब्बत के नशे में लिखी गई कविता

जम्मू आये हुए मुझे छह महीने बीत गये हैं, गर्मी की जनता एक्सप्रेस जा चुकी है और सर्दी की राजधानी एक्सप्रेस आउटर सिग्नल पर खड़ी है। इस खूबसूरत मौसम में अचानक पटनीटॉप जाने का कार्यक्रम बन गया। दोपहर करीब तीन बजे जम्मू से रवाना हुआ। जम्मू शहर पार करते ही वादियों ने सिर उठाना शुरू कर दिया।
पहली बार कश्मीर को करीब से देखा। लगा कि ऊपरवाले ने मुहब्बत के नशे में कोई कविता लिखी है, और उसका नाम रखा है कश्मीर। निगाह की हद्द से कहीं ज़्यादा बड़ी और ख़यालात की औक़ात से कहीं ज़्यादा ख़ूबसूरत वादियाँ ऐसी लगती हैं जैसे किसी सनकी चित्रकार ने बेतरतीबी से हरा, नीला, लाल, काला रंग आसमान के कॅनवास पर उंडेल दिया हो। इन रंगों ने धीरे-धीरे बहते हुए कॅनवास के निचले हिस्से में कुछ ऐसा आकार ले लिया है, जो पर्वतों के होने का तिलिस्म पैदा करता है। रंग कहीं-कहीं इतना अनोखा हो गया है कि उसको कोई नाम नहीं दिया जा सकता। वृक्षों की हरितिमा कब चिट्टी सफेदी में बदल जायेगी और कहाँ ये सफेदी पीला या गहरा लाल रंग ओढ़ लेगी, इसका कोई पैमाना नहीं बनाया जा सकता। सब कुछ बेतरतीब होता हुआ भी आश्चर्यजनक रूप से लयात्मक है। कहीं किसी पाँचवीं कक्षा के बच्चे की ‘सीनरी’ जैसा नज़ारा उभरा हुआ है, जिसमें स्केल की सहायता से पहाड़ बनाकर उसके पीछे से अर्द्धगोलाकार सूरज उगता दिखाई देता हो! कहीं-कहीं किसी मँझे हुए कलाकार की मॉडर्न आर्ट का कल्पनालोक साकार होता दिखाई देता है।
दूर किसी पहाड़ी से उठता धुआँ कहाँ बादल में मिल जाता है, अंदाजा लगाना मुश्किल है। देवदारु के वृक्षों की ऊँचाई देखकर एहसास होता है कि व्याकरणविदों ने ‘विराट’ शब्द की सृष्टि किस भाव को अभिव्यक्त करने के लिये की होगी। पहाड़ी रास्तों पर फर्राटे से दौड़ती हुई गाड़ी की खिड़की खोलकर इस भव्यता को कैमरे में कैद करने का प्रयास करता मैं अघाता ही न था। खिड़की के इस पार लग्ज़री गाड़ी की सीट पर मैं बैठा बेग़म अख़्तर की ग़ज़लें सुन रहा हूँ, और खिड़की के उस पार तीन-चार फुट की सड़क और फिर अथाह खाई। न जाने कौन सा आकर्षण था उस खूबसूरती में, कि मृत्यु का भय भी उसको अपलक निहारने की ललक को कम नहीं कर पा रहा।
खाई के उस पार पहाड़ के बीच से फूटता झरना नीचे लरजती हुई चेनाब के पानी को स्पर्श करता है तो नदी की धार की कशिश कई गुना बढ़ जाती है। प्रकृति के इस अनुपम दृश्य को शाम के सन्नाटे में अपलक निहारता हुआ मैं ऐसा महसूस कर रहा हूँ जैसे अपने कमरे के दरवाजे की चटकनी लगाकर, लाइट ऑफ करके कोई किशोर म्यूट मोड पर कोई अंग्रेजी फिल्म देख रहा हो।
खिड़की की झिरी से गाड़ी के भीतर आती हवा एहसास करा रही है कि हवा का ये झोंका अभी-अभी किसी बर्फीली पहाड़ी का चुंबन कर के आया है। शाम के धुंधलके में दूर किसी पहाड़ की चोटी पर जमी बर्फ, ढलते सूरज की रोशनी में ऐसे लाल हो गयी है मानो कोई गोरी-चिट्टी लड़की कनखियों से किसी लड़के को देखती हुई पकड़ी गयी हो।
हमारी गाड़ी, पहाड़ी रास्तों पर गोल-गोल घूमती हुई ऊँचाई पर चढ़ रही है, सूरज निढाल प्रेमी-सा बर्फीली पहाड़ियों के जिस्म पर फिसलता हुआ आँखों से ओझल हो रहा है। रात, सन्नाटा और ठंड लगातार बढ़ रही है। अनुभूति के चैतन्य मन पर धीरे-धीरे भोग का नशा चढ़ रहा है और खूबसूरती नज़र से ओझल होकर अंतर्मन के उस पर्दे पर उतर आई है, जहाँ शब्द मौन हो जाते हैं।

✍️ चिराग़ जैन

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