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सर्दी : एक श्वेतवर्णा बूढ़ी दादी

कँपकँपाते शरीर को सफेद चादर में लपेटे हुए रोज़ सुबह एक बूढ़ी दादी ठंडे-ठंडे हाथों से गाल छूती है। मैं झल्लाकर सिर तक रजाई खींच लेता हूँ। दादी हँसकर रसोई में जाती है और सरसों के साग की ख़ुशबू से मेरे आलस्य में व्यवधान करती है। खेतों में हरी सब्ज़ियों की ताज़गी देखकर बूढ़ी दादी की क्यारियों से प्यार हो जाता है।
गाजर के हलवे की रंगत और ग़ज़क-रेवड़ी की झलक दिखाकर दादी मुझे रिझाती है। मैं रोज़ सुबह अंगड़ाइयों में टूटते आलस को भूलकर दादी की रसोई में घुस जाता हूँ। स्वाद और पेट को तृप्त करके मुझे दादी की शरारतों पर फिर से खीझ उठने लगती है। मैं टूटी हुई लकड़ियाँ जोड़कर अलाव जलाता हूँ और मूंगफलियों के आनंद में व्यस्त हो जाता हूँ।
मुझे अलाव की संगत में बैठा देखकर, दादी चुपचाप अपनी कोठरी में जा दुबकती है। थोड़ी देर बाद मूंगफलियों की संख्या कम होते-होते समाप्त होने लगती है। अलाव की रंगत फीकी पड़ जाती है। मैं दादी से छुपकर रजाई के आगोश में खो जाता हूँ। सुबह होते-होते; जब तक मैं दादी को भूलने लगता हूँ; हवा का एक झोंका गाल पर मीठी-सी चपत लगाकर कहता है- ‘उठ रे, दादी चाय के लिए अदरक कूट रही है।’
✍️ चिराग़ जैन

अस्तित्व का मापदंड

फेसबुक को अपने अस्तित्व का मापदंड माननेवाले लोगों का रक्तचाप मापने के लिए प्रति पोस्ट लाइक को प्रति पोस्ट शेयर से गुणा किया जाना चाहिए। इस डिजिटल संचार माध्यम ने एक ऐसी भ्रामक सृष्टि की सर्जना कर दी है कि किसी की चार दिन की निष्क्रियता उसके डिजिटल परिवार को ‘चिंतित महसूस कर रहा है’ वाली स्माइली चिपकाने पर विवश कर देती है।
इस गंभीर स्थिति में आधार कार्ड को फेसबुक से लिंक करने की बातें हो रही हैं। यह फ़रमान फेसबुकियों के लिए ऐसा वरदान सिद्ध हुआ कि मानो नास्तिकों की बस्ती में बने मंदिर के पुजारी को भगवान की माला के फूल मिल गए हों। सरकार की इस गंभीरता को देखते हुए फेसबुकजीवियों ने लॉगिन करते हुए और अधिक गंभीर होने का निर्णय किया है।
जो लोग अपनी पोस्ट पर टिप्पणियों की संख्या बढ़ाने के लिए इनबॉक्स तक दौड़-भाग करते थे, वे अब पोस्ट करने के उपरान्त 5000 लोगों को फोन मिलाने की सोचने लगे हैं। किसी के नकारात्मक कमेंट पढ़कर जिनकी भृकुटियाँ तन जाती थीं वे अब सिर पर ठंडे पानी की पट्टी रखकर एकाउंट लॉगिन करने लगे हैं।
फेसबुक पर कुकुरमुत्तों की तरह उग आए स्वयंभू साहित्यकारों में भी खासी हलचल है। मैं ऐसे कई कवियों को जानता हूँ जो ‘आत्मनिर्भरता ही सफलता की कुंजी है’ की सूक्ति को आत्मसात करते हुए पचास-साठ नक़ली फेसबुक खातों की बुनियाद पर अपनी प्रशंसाओं का विशाल भवन खड़ा कर रहे थे। एक पोस्ट करने के बाद बाक़ायदा पचास लॉगिन-लॉगआउट करना, फिर उन पचास खातों की आपसी लड़ाई करवाना और उस लड़ाई को सुलझाना… इतनी मेहनत-मशक्कत से अपने दम पर ज़िंदा ये मसिजीवी आधार लिंक करने के इस तुग़लकी फरमान से अचानक बेरोज़गार हो गए हैं।
नक़ली मुद्रा के बंद होने पर जो लोग सरकार की प्रशंसा में जुट गए थे, वे ही नक़ली खाते बन्द होने पर सरकार को कोस रहे हैं। महिला कोटे में बने खातों से लड़कियों से चुहलबाज़ चैटिंग करनेवाले संस्कारी युवा आधार लिंक करने के इस बेग़ैरत फैसले से सदमे में हैं।
सभ्यता का आधार कार्ड दिखाकर संस्कृति की दुहाई देनेवाले लोग मौब में तब्दील होते ही अशिष्ट हो जाते हैं। यदि पहचाने जाने का संकट न हो तो हम वे सब हरक़तें करेंगे जिनका हम आधार लिंक वाले खाते से विरोध करते हैं। सामाजिक नियमों की भौंडी सभ्यता की चुनरी कुण्ठाओं की सूरत पर एक आवरण डाल देती है।
फेसबुक के फेक एकाउंट्स बंद करवाने से पूर्व समाज को उन खातों से संचालित गतिविधियों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करना चाहिए। इन खातों में समाज का वह चेहरा उजागर होगा, जिसे सामने लाने के मार्ग में नियमों और नैतिकता के छद्म पहाड़ों का अवरोध सदैव दिखाई दिया है। इन नक़ली खातों के डिजिटल अखाड़े की अध्यक्षता में नियमों की पुनर्स्थापना की जानी चाहिए ताकि वर्जनाओं के टैबू से त्रस्त समाज राहत की साँस ले सके।
✍️ चिराग़ जैन

अलविदा 2017

दो हजार सत्रह भी बीता समय अनवरत दौड़ा जाय
क्या क्या छूट गया है हमसे आओ देखें नजर घुमाय
साल शुरू ही हुआ अभी था उत्सव का माहौल जवान
छोड़ गए संगत सितार की अब्दुल हामिद जाफर खान
अभी सिसकियों से बाहर भी नहीं आ सका था इक साज
मौन हो गई ओमपुरी की दानेदार अलभ आवाज
उधर राजनीति की गलियों में भी मातम ने दी दाब
बरनाला सुरजीत बिछड़ गए, बिलख उठा पूरा पंजाब
उसी दिवस इक उज्ज्वल तारा अंतरिक्ष का टूटा हाय
वैज्ञानिक विश्वेश्वरैया ब्लैक होल में गए समाय
हफ्ते भर के भीतर-भीतर गजल सुबक कर करी पुकार
नक्श ल्यालपुरी जी बिछुड़े आँसू भर रोए अशआर
माह फरवरी चढ़ते चढ़ते रोया लेखन का आकाश
उर्दू की सलमा सिद्दीकीय हिंदी शर्मा वेदप्रकाश
तमिल सिनेमा के आंगन का बूढा बरगद हुआ उदास
वर्ष एक सौ तीन जिए फिर गए एंटनी मित्रादास
व्यंग्य मृत्यु के हत्थे आया उल्टा चश्मा लीना तान
गुजराती साहित्य ने देखा तारक मेहता का अवसान
कैंसर की बीमारी बन गई एक सफल जीवन की सौत
बॉलीवुड के आँसू छलके हुई विनोद खन्ना की मौत
दिल की धड़कन थमी रह गई खड़े रह गए खाली हाथ
रीमा लागू विदा हो गईं दिल ने छोड़ दिया था साथ
ब्यूरोक्रेसी ने खो दी ईमान धर्म की एक मिसाल
आंखें मूंद गए केपीएस गिल भारत माता के लाल
हास्य व्यंग्य ने खोया अपना तारा तेंदुलकर मंगेश
प्रोफेसर यशपाल गए तो फिर से रोया भारत देश
दग्ध हृदय के अंतरिक्ष पर पुनः लगा इक गहरा घाव
शोध कार्य को छोड़ बीच में विदा हुए उडूपी राव
आसमान रोया अगस्त में फूट फूट कर कितनी बार
गोरखपुर में नन्हा बचपन अनदेखी का हुआ शिकार
उन्मादों के आरोहों में ऐसा लिपटा अपना देश
अभिव्यक्ति के आरोपों में चली गईं गौरी लंकेश
आसमान पर जिसने घेरा दुश्मन को फैला कर रिंग
विदा हो गए भारत भू से एअर मार्शल अर्जन सिंह
बॉलीवुड के अंग्रेजी तड़के का पिघल गया सब मोम
कुल सड़सठ की अल्पायु में चले गए जब आल्टर टॉम
अक्टूबर में बॉलीवुड ने पुनः भरी इक और कराह
जाने भी दो यारो कहकर विदा हो गए कुंदन शाह
ठुमरी की लहरी पर रोया काशी जी का महामसान
गिरिजा देवी ने जब छेड़ी काल राग वाली सुर-तान
कला जगत का काल देव ने छीन लिया नयनों का नूर
पंचतत्व में लीन हो गए जब अभिनेता शशि कपूर
इसी वर्ष में हिम ने खाए सेना के दर्जनों जवान
इसी साल में अमरनाथ के यात्री त्याग गए थे प्राण
बाढ़ लील गई लोगों के जीवन, पशुधन, खेत, मकान
पश्चिम के तट पर प्रलयंकर बना रहा ओखी तूफान
रोहिंग्या सीमा पर आए शरण मांगने लिए गुहार
एक फिल्म पर खून-खराबा देखा हमने कितनी बार
धर्म आस्था चबा रहे थे अपमानों के कड़वे नीम
शर्मिंदा कर गया धर्म को सिरसा वाला राम रहीम
रेलों ने पटरी को त्यागा, हवा हो गई विष की खान
जीएसटी ने व्यापारों पर इसी साल ली भृकुटि तान
कुछ खुशखबरी भी आई जिससे जख्मों ने पाया चैन
तीन तलाक प्रथा पर न्यायालय ने लगा दिया है बैन
सुंदरता ने लोहा माना मिला मानुषी को जब ताज
अंतरिक्ष अनुसंधानों में गूंजी भारत की आवाज
इसरो को यूँ अंतरिक्ष का मिला एक ऐसा आशीष
एक सौ चार उपग्रह धारी पीएसएलवी-सी सैंतीस
नया साल अब द्वार खड़ा है इतना सा है अब अरमान
अगले वर्ष मिले भारत को आँसू कम, ज्यादा मुस्कान

✍️ चिराग़ जैन

ओ विकलता!

ओ विकलता!
दो घड़ी मन को अकेला छोड़ दे तू!

नींद का तुझसे पुराना वैर है री!
श्वास ने लय खोई तेरे साथ चलकर
धड़कनों की ताल द्रुत होती अचानक
रह गई है शांति अपने हाथ मलकर
मान भी जा!
एक क्षण भीषण प्रतिज्ञा तोड़ दे तू!
दो घड़ी मन को अकेला छोड़ दे तू!

अनवरत मस्तिष्क में हलचल मची है
मौन के क्षण को कभी सम्मान तो दे!
तू समूची बुद्धि से मन तक बसी है
धैर्य टिक पाए कहीं पर स्थान तो दे!
या चली जा!
या हृदय को इक दफा झखझोर दे तू!
दो घड़ी मन को अकेला छोड़ दे तू!

दृष्टि को भीतर उतरने की गरज है
भंगिमा को सरल होने का समय दे!
मुस्कुराहट खिल उठे व्याकुल अधर पर
त्यौरियों को तरल होने का समय दे!
घूम-फिर आ!
भृकुटियों को सहजता से जोड़ दे तू!
दो घड़ी मन को अकेला छोड़ दे तू!

✍️ चिराग़ जैन

उत्सव का संयोग

कवि के आँगन में पीड़ा के उत्सव का संयोग हुआ है
निश्चित है अब इस ड्योढ़ी पर कोई अनुपम गीत सजेगा

आँसू ने पलकें धो दी हैं, मुस्कानों के आमंत्रण पर
सपने आँगन पूर रहे हैं, आशा सज आई तोरण पर
वीणा के सोए तारों को छूकर निकली है बेचैनी
कुछ पल ठहरो इन तारों पर पावनतम संगीत सजेगा
निश्चित है अब इस ड्योढ़ी पर कोई अनुपम गीत सजेगा

सब कुछ खो देने की पीड़ा एक दिलासा ढूंढ रही है
नदिया की धारा सागर की अमर पिपासा ढूंढ रही है
आलिंगन में बांध लिया है अपनेपन ने हारे मन को
तय है इस किस्से में इस पल एक नया मनमीत सजेगा
निश्चित है अब इस ड्योढ़ी पर कोई अनुपम गीत सजेगा

वरदानों की सिद्धि; तपस्या की क्षमता पर आधारित है
जिसने सब कुछ खोया उसका सब कुछ पाना निर्धारित है
मरने की सीमा तक यदि संग्राम किया है इक काया ने
तो अगले पल उस काया में जीवन आशातीत सजेगा
निश्चित है अब इस ड्योढ़ी पर कोई अनुपम गीत सजेगा
✍️ चिराग़ जैन

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