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नियति

रोज़ नया अनुभव जुड़ता है रोज़ उमर घटती जाती है रोज़ नए बिरवे उगते हैं रोज़ फसल कटती जाती है जब यह तय है कुछ दिन पीछे हम सबको निश्चित मरना है फिर इतने सारे अनुभव का आख़िर हमको क्या करना है बिन मतलब के अनुभव से ही निश्छलता छँटती जाती है रोज़ नए बिरवे उगते हैं रोज़ फसल कटती जाती...

अस्तित्व का मापदंड

फेसबुक को अपने अस्तित्व का मापदंड माननेवाले लोगों का रक्तचाप मापने के लिए प्रति पोस्ट लाइक को प्रति पोस्ट शेयर से गुणा किया जाना चाहिए। इस डिजिटल संचार माध्यम ने एक ऐसी भ्रामक सृष्टि की सर्जना कर दी है कि किसी की चार दिन की निष्क्रियता उसके डिजिटल परिवार को ‘चिंतित...

सांस्कृतिक ह्रास

संस्कार अवरोही हो चुके हैं। मेरे पिता का संहनन मुझमें नहीं है। और मैं इस बात के लिए भी आश्वस्त हूँ कि मेरी संतति मेरे जीवन सिद्धान्तों को पुराना कहकर नकार देगी। पीढ़ियों का यह अनवरत संघर्ष हमें बैलगाड़ियों से अंतरिक्ष यान तक भी लाया है और नाड़ी विज्ञान से पैथोलॉजी लैब तक...

ख़ास लकीरें ग़ायब हैं

जब से कंधों पर कुछ भार पड़ा, तब से हाथ बंधे हैं और ज़जीरें ग़ायब हैं जिसने सख़्त ज़मीं पर चलकर देख लिया उसकी बातों से तहरीरें ग़ायब हैं जाने कैसे तुमने हाथ मिलाया है हाथों की कुछ ख़ास लकीरें ग़ायब हैं बस आईने लटके हैं दीवारों पर और आईनों से तस्वीरें ग़ायब हैं ✍️ चिराग़...

सवेरों का निरादर

यूँ तो हम युग के शिलालेखों पे अंकित हो गए जो जिए हमने वो सारे दिन अलंकृत हो गए किन्तु जब युग की टहनियों पर नई कोंपल उगी तो हरे पत्ते हवाओं से सशंकित हो गए जब हमारी श्वास में सरगम सजी आनन्द था हम उठे, जग ने गई रस्में तजीं आनन्द था जब हमारी गुनगुनाहट राग बनकर पुज गई...
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