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सिलवटें कसमसाती रहीं

हम तरसते रहे रेशमी भोर को रात भर सिलवटें कसमसाती रहीं इक सुक़ूं के लम्हे की तमन्ना लिए साँस आती रही साँस जाती रही आँख में इक समंदर सँजोए हुए घाट का रोज़ अपमान करती चली प्यास की कोर पर अश्रु ठहरा रहा पर नदी सिर्फ़ मद में अकड़ती चली चाल भारी हुई, देह खारी हुई डूब कर देर तक...

भारत की तस्वीर

भारत की आज तस्वीर जो बनी हुई है उसमें पुरानी हर रीत का भी रंग है हल्दीघाटी वाली एक हार की कसक भी है पोरस की स्वाभिमानी जीत का भी रंग है चंद्रगुप्त मौर्य वाले साहस का नूर भी है चाणक्य शिखा की कूटनीति का भी रंग है झाँसी वाले शौर्य की कहानी तलवार पे है पीठ पर ममता की...

रेशम है कविता

रेशम है कविता झट से फिसल जाती है उंगलियों को चूमती हुई। थाम लेते हैं इसे जीवन के खुरदरे अनुभव। दर्द रिसता तो होगा। पीर बहती तो होगी। कौन जाने क्या ज़्यादा दुखदायी है दर्द का रिसना या रेशम का फिसलना? …डर लगता है गुलाबी छुअन से। रेशम का कसता फंदा सहला भर जाता है...

ख़ुशियाँ

आज डिनर टेबल पर गोल्डन एप्पल नहीं खाए माँ ने। बस कह भर दिया- “मुझे ना अच्छे लगते सेब-पेब।” और फिर हम सब चट कर गये सारे सेब हाथों-हाथ। …रात में तकिये पर सिर टिकाए छत पर चमकते रेडियम के सितारों में अचानक उभरकर याद आई माँ की बात- “सुन रे! सेब...

व्यस्तता

तुम आई थीं सुख की गगरिया लिए सुख लुटाने। पर मैं बैठा ही रह गया घात लगाए जीवन के अहाते में चुराने को दो पल सुख। अब सुख तो है पर चोरी का है तुम नहीं हो ना! गगरिया नहीं है मीठे सुख की। ✍️ चिराग़...
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