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विक्रम और बेताल

विक्रम तुम तो वर्तमान हो बल, विवेक, सामर्थ्य सभी कुछ मिला-जुलाकर आगत का सिंगार करो तुम ये क्या अपने कंधे पर तुम भूत लादकर घूम रहे हो क्या तुमको आभास नहीं है जब भी तुम उस प्रेतकाय के उलझे केशों से उलझे हो तब तब तुम अपने भविष्य को पीठ दिखाए खड़े रहे हो और कभी जब उसे...
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