न कोई ट्रिक है ना तकनीक पापा जादू से ही सब कुछ कर देते हैं ठीक दिन भर दुनिया भर के सब आघातों को सहते हैं रात ढले अपनी दुविधा बस अम्मा से कहते हैं इतने सीधे-सच्चे हैं हर छल से हिल जाते हैं जब अपने बच्चों से मिलते हैं तो खिल जाते हैं झट से ग़ायब हो जाती है चिंताओं की...
चल पड़ी ससुराल बिटिया सज-सँवर के मन बिलखकर रह गया इस पल अचानक देहरी की आँख नम होने लगी है मौन रहने लग गयी साँकल अचानक याद आता है अभी कल ही हमारी गोद में इक पाँखुरी सी आई थी तुम बस अभी कल ही कोई साड़ी पहनकर देखकर दर्पण बहुत इतराई थी तुम लांघकर बचपन, हुई थी तुम सयानी याद...
शादी का जोड़ा चढ़ा, सजे सोलहों साज इक छोटी-सी लाडली, बड़ी हुई है आज विदा समय बाबुल कहे, जोड़े दोनों हाथ मेरी लाज बंधी हुई, बिटिया तेरे साथ बिन कारण ताने सहे, बिन मतलब संत्रास पर उसने तोड़ा नहीं, बाबुल का विश्वास बाबुल तेरी देहरी, जब से छूटी हाय। तब से मन की बात बस, मन ही...
उससे नहीं मिलूँ तो मन में बेचैनी-सी रहती है उसकी आँखों में इक पावन देवनदी-सी बहती है उसके गोरे-नर्म गुलाबी पाँव बहुत ही सुंदर हैं उसकी बातें निश्छलता का ठहरा हुआ समुन्दर हैं उसकी वाणी मुझको सब वेदों से सच्ची लगती है उसकी मीठी-मीठी बातें कितनी अच्छी लगती हैं वो न जाने...