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चंद्रोदय

चन्द्रमा ठहरो ज़रा सूरज अभी डूबा कहाँ है तुम दमक का दंभ भरना बाद में। जब तुम्हारे चाटुकारों का जुगनवी दल फुदकने के लिए अंधियार पा ले और लाखों बून्द जैसी तारिकाएँ जब घड़ी भर टिमटिमा लें तब दिखना नूर अपनी चांदनी का रात में सोए हुओं को और रोते श्वान, गीदड़, उल्लुओं को। रात...

नेह का दर्प

प्रेम की धारा में तुम निर्बाध बह पाते काश मुझसे एक पल तुम सत्य कह पाते जब कोई अपनत्व था चरितार्थ तुममें जब कभी जागा हो कोई स्वार्थ तुममें क्यों मेरा संकोच बदला आग्रहों में कौन सा अधिकार था उनकी तहों में काश उस मनुहार का तुम अर्थ गह पाते जब किसी घटना से आहत हो गया मन...
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