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भारतीय संस्कृति में हास्य

हम हास्य को लेकर बेहद संवेदनशील दौर से गुज़र रहे हैं। एक तरफ वे लोग हैं जो स्वस्थ, पारंपरिक, पारिवारिक और सामाजिक ठट्ठे को भी ‘जातीय अपमान’, ‘आस्थाओं पर प्रहार’ तथा ‘राष्ट्र्रद्रोह’ सिद्ध करने पर तुला है। जो परिहास को भी ‘उपहास’ और ‘अपमान’ सिद्ध करने के षड्यंत्र रच रहा है, दूसरी ओर वे लोग हैं जो निरी अश्लीलता और वैभत्स्य को ‘हास्य’ घोषित कर देना चाहता है।
हमारी संस्कृति में उल्लास और उत्सव में देवी-देवताओं और यहां तक कि ईश्वर को भी सहभागी माना जाता है। परिवार के बड़े-बूढ़ों से लेकर बालकों तक सबके लिए परिहास तथा हंसी-ठट्ठा हमारे उत्सव-टेलों में सम्मिलित होता है। शादी-ब्याह में गाई जानेवाली ‘गारी’ और रतजगों में होनेवाला परिहास हमारी लोकसंस्कृति में रचे-बसे हास्यबोध का परिचायक है।
यही कारण है कि हमारी संस्कृति दुनिया की उन गिनी-चुनी संस्कृतियों में से एक है जिनके यहां हंसता हुआ ईश्वर उपलब्ध है। हमारे पौराणिक साहित्य में हास्य-विनोद के अनेक प्रसंग इस बात का प्रमाण हैं कि हंसने से ईश्वर अपमान नहीं होता, बल्कि अपनत्व बढ़ता है।
ऐसा नहीं है कि हंसने से अपमान हो नहीं सकता। और ऐसा भी नहीं है कि गंभीर रहनेवाला व्यक्ति जो करता है वह सम्मान ही है। यह सब धारणा पर निर्भर करता है। शिशुपाल गाम्भीर्य ओढ़कर भी नारायण का अपमान करने का प्रयास करता रहा। दुर्योधन हंसते हुए भी पाण्डवों के विरुद्ध लाक्षागृह का षड्यंत्र रच रहा था। कर्ण स्मितहीन जीवन जीकर भी द्रोण से लेकर कुंती तक पर व्यंग्यबाण छोड़ता रहा और राम, मुस्कुराते हुए अनेकानेक कष्टों से होकर गुज़र गए।
हंसना-मुस्कुराना अपराध है यह भी आधी-अधूरी विवेचना है और गाम्भीर्य शालीनता है, यह भी अर्द्धसत्य ही है।
जो मुस्कान सहजता में अभिवादन के काम आती है, विरोध में वही मुस्कान कटाक्ष बन जाती है। ऐसे में मुस्कान से धारणा का निर्णय करना बेहद बचकाना है।
महाभारत में मयसभा में सुयोधन को जो भ्रम हुआ था वह विशुद्ध हास्य का प्रसंग था। पानी और धरती में भेद न कर पाने के कारण सुयोधन जो आचरण कर रहे थे, उसे देखकर वहां उपस्थित सभी लोग हंस रहे थे। इस क्षण पांचाली ने हास्य की मर्यादा लांघकर जो कटाक्ष किया वह हास्य करनेवाले के लिए मर्यादा का श्रेष्ठ उदाहरण है तथा उस समय सुयोधन के मन में प्रतिशोध की जो अग्नि भड़की, वह हास्य-बोध न समझनेवालों के लिए सबक जैसा है।
यही नहीं महाभारत में ही विराटनगर के युवराज ‘उत्तर’ और वृहन्नला के मध्य हुआ संवाद हास्य की छटा प्रस्तुत करता है। नारदमुनि को कामदेवव पर विजय पाने के लिए ‘हरिमुख’ के नाम पर ‘वानरमुख’ देनेवाले नारायण ने परिहास से परहेज नहीं किया। शिवपुराण में भस्मासुर को अपने ही सिर पर हाथ रखने के लिए विवश करनेवाली मोहिनी का प्रकरण हास्यरस का प्रसंग है। हरिवंशपुराण में श्रीकृष्ण की बाललीलाओं में प्रचुर हास्य मिलता है। रामचरितमानस में जिस चातुर्य से हनुमान सुरसा को परास्त करते हैं, अशोक वाटिका में किलोल करते हैं… वह सब हास्य की ही श्रेणी में आता है। पंचवटी में शूर्पणखा का प्रसंग, लंका में कुम्भकर्ण का वर्णन तथा ऐसे ही अनेक प्रसंगों में हास्य की छटा दिखाई देती है। हमारी लोक-कहावतों तथा मुहावरों में भी पौराणिक संदर्भों के पर्याप्त उद्धरण मिलते हैं।
इससे यह तो स्पष्ट हो जाता है कि हमारी संस्कृति में हास्य को अछूत नहीं माना गया है। किंतु यह भी जानना आवश्यक है कि शस्त्र कौन सा चलाया गया से अधिक महत्वपूर्ण है कि शस्त्र किस विचार से चलाया गया।
धर्म का अपमान उन्होंने नहीं किया जिन्होंने अपने पूजितों को अपने उत्सवों में सम्मिलित किया। धर्म का अपमान उन्होंने किया है जिन्होंने अपने ईश्वर के नाम पर घृणा और विद्वेष बोने के कुचक्र रचे।
हमारा ईश्वर इतना सक्षम है कि वह जब चाहे अपने सम्मुख खड़े शिशुपाल की गर्दन उतार सकता है। हमारा ईश्वर इतना सक्षम है कि वह घृणित समझे गए गिद्ध के प्रति भी कृतज्ञ होने से नहीं कतराता। हमारा ईश्वर इतना सक्षम है कि वह लंका में रहनेवाले रावण और विभीषण की सोच के अंतर को समझ सकता है।
इसलिए ईश्वर की चिंता के नाम पर समाज में घृणा फैलाना छोड़ो। ईश्वर अपने समाज को हंसता-खेलता देखकर प्रसन्न होता है। लड़ता-भिड़ता देखकर तो उसे भी कष्ट ही होता है। इसलिए धर्म की रक्षा के नाम पर समाज को घृणा की अंधी खोह में धकेलनेवाले भी उतने ही पापी हैं जितने हास्य के नाम पर पैशाचिक वैभत्स्य तक उतरनेवाले लोग पापी हैं।

✍️ चिराग़ जैन

सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम् की अनुगूंज : पशुपतिनाथ मन्दिर

शिव, जहाँ जीवन और मृत्यु दोनों के लिए समभाव है। शिव, जहाँ मनुष्य, पशु, भूत, गण, स्त्री, पुरुष, देव, दैत्य, सुर, असुर, सृजन, ध्वंस… सब कुछ स्वीकार है। जहाँ कुछ हेय नहीं है। जहाँ किसी नकार के लिए कोई स्थान नहीं है। जहाँ सब स्वीकृत हैं। जो सबके हैं। जहाँ मानव तन पर गजमुख भी स्वीकृत है और जीवित देह पर चिता भस्म से भी परहेज नहीं है।
कण्ठ में हलाहल और भोग में धतूरा, आसन में मृगछौना और जटाओं में गंगा, भुज पर भुजंग और गले में विषधर, हाथ में त्रिशूल और मस्तक पर रजनीश… अहा क्या अकल्पनीय स्वरूप है यह। त्रिपुण्ड, त्रिनेत्र, डमरू… कुछ भी तो ऐसा नहीं जिसका किसी अन्य से कोई सीधा सम्बन्ध स्थापित हो सके। सब एक दूसरे के धुर विरुद्ध। लेकिन शिव पर आकर सब एक-दूसरे के पूरक हो जाते हैं।
क्रुद्ध हुए तो ताण्डव का सृजन हो गया। आवेश की राह पकड़ी तो उसके अंत में गणेश का निर्माण हो गया। शोकग्रस्त हुए तो शक्तिपीठ प्रतिष्ठापित हो गए। और प्रसन्न हुए तो देव-मनुष्य तो दूर, भूत-पिशाच तक आह्लादित हो उठे।
किसी का ‘स्वीकार’ इतना विराट हो जावे तो उसका ‘महादेव’ हो जाना तय हो जाता है। यह स्वीकार इतना विराट है कि विषपान के लिए भी नकार नहीं है। यह स्वीकार इतना दिव्य है कि चिताभस्म भी अपावन नहीं है। यह स्वीकार इतना महान है कि नन्दी बैल से लेकर कार्तिकेय तक सब एक परिवार के सदस्य हैं। यह स्वीकार इतना निडर है रुद्राक्ष के कंगन से लेकर मुण्डमाल तक कुछ भी अजीब नहीं लगता।
काठमांडू में पशुपतिनाथ मन्दिर में शिव के इसी वैराट्य को जी भर भोगा। बागमती नदी के तट पर चिता जल रही थी। जीवन के ध्वंस की घोषणा करता धुआं ऊपर उठा आता था और पशुपतिनाथ मंदिर के पूर्वी द्वार के सम्मुख किसी की दुआओं की अगरबत्ती से उठते धुएँ की लकीर चिता के धुएँ में जाकर विलीन हुए जा रहा था। आह… लोक और परलोक का ऐसा विलय मैंने पहली बार देखा।
दृश्य देखकर मन अवाक हो गया। न आह शेष थी न अहो! क्षणांश के लिए दृष्टि धूम्रविलय के इस महासत्य से सम्मोहित हो गयी थी। विचार और चिंतन का अनवरत उपक्रम यकायक स्थिर हो गया। क्षण भर के लिए ही सही, किन्तु मैं खुली आँखों से ध्यान की उस अवस्था पर पहुँच गया था जहाँ तक विचार का शोर-शराबा नहीं पहुँचता… जहाँ केवल साक्षीभाव शेष रह जाता है। चिता… दुआ… और धुआँ! पूरी सृष्टि का सार इस दृश्य में समाहित था।
पशुपतिनाथ मंदिर में विग्रह स्वरूप शिवलिंग के ऊपर चौमुखी शिव विद्यमान हैं। गर्भगृह की चारों दिशाओं में चार द्वार हैं। पूर्वी द्वार बागमती नदी की ओर खुलता है, जहाँ मसान में शवदाह होता है और नदी के पार पिण्डदान तथा इसी प्रकार के अन्य कर्मकाण्ड सम्पन्न किये जाते हैं। इस श्मशान में जहाँ दाह से पूर्व शवों को स्नान कराया जाता है उसके सामने मंदिर जैसे तीन शिखर बने हुए हैं। इन शिखरों का सबसे ऊँचा हिस्सा भी मंदिर की पूर्वी मुंडेर से बारह-पंद्रह फीट नीचे है। पशुपतिनाथ मंदिर के दर्शन करने के बाद जो श्रद्धालु इस मुंडेर तक आते हैं, उनका मानना है कि ये मंदिर-शिखर लक्ष्मीयन्त्र हैं। मंदिर की मुंडेर से इस यंत्र पर सिक्का फेंका जाए और वह यंत्र पर ही टिक जाए तो इसका अर्थ है कि लक्ष्मी ने आपकी भेंट स्वीकार कर ली है।
संपन्नता की आस में सैंकड़ों लोग सिक्का फेंकते हैं लेकिन अधिकतर सिक्के शिखर से टकराकर नीचे मसान में जा गिरते हैं। मुझे याद है एक बार शाम के समय नीचे मसान में स्नानोंपरांत एक शव रखा था और ऊपर से लक्ष्मी की आकांक्षा में फेंका गया सिक्का उस व्यक्ति के सिर पर लगा जिसने उस शव को मुखाग्नि देने के लिए सिर मुण्डवाया था। मैं ऊँचाई से उसके चेहरे पर आए भाव पूरी तरह तो नहीं पढ़ सका किन्तु उनमें घृणा के साथ कुछ नैराश्य अवश्य था। …इस दृश्य को देखकर मन विचलित हुआ। मृत्यु के सम्मुख लक्ष्मी की आकांक्षा रखकर सिक्का फेंकते लोग श्रद्धालु कम, निष्ठुर ज़्यादा लगे।
मंदिर के उत्तर में माँ अन्नपूर्णा विद्यमान हैं। पश्चिमी द्वार के सम्मुख नन्दी अपने भव्य रूप में विराज रहे हैं और दक्षिण द्वार पर उन्मत्त भैरव का मंदिर है। भैरव का इतना रौद्र रूप मैंने अन्यत्र नहीं देखा।
परिसर में अन्य भी छोटे-छोटे बिम्ब तथा मन्दिर हैं। केदारनाथ, वासुकी, महालक्ष्मी और न जाने कितने ही आराध्य पशुपतिनाथ के साहचर्य में उपस्थित हैं।
लम्बी-लम्बी लाइनें लगी थीं। शनिवार होने का कारण उस दिन मन्दिर में अपार भीड़ थी। अगरबत्ती, धूपबत्ती और दीपक बालकर लोग एक नियत स्थान पर नारियल फोड़ते और फूल व प्रसाद की टोकरी लेकर लम्बी प्रतीक्षा के बाद किसी न किसी द्वार तक पहुँचते थे। पुजारी उनका प्रसाद महादेव तक पहुँचाता था और दर्शनार्थी चेहरे पर एक विजय स्मित लिए लौट आते।
नेपाली काष्ठ शैली में बना भव्य मंदिर अपने वास्तु से भी मन मोह लेता है। मुख्य प्रांगण के बाहर संन्यासी बैठे मिल जाते हैं। कभी-कभी कुछ अघोरी भी दिखाई दे जाते हैं। शिव तो सबके हैं ना। निर्धन और धनवान सभी समान रूप से भोले के दर्शनों की प्यास लिए यहाँ पहुँचते हैं। एक बड़े से चौबारे में लोग कबूतरों को चुग्गा डालते हैं। सेल्फी, फोटोग्राफी, विडियोशूट जैसे कार्य भी यहीं सम्पन्न होते हैं।
इस परिसर से बाहर एक बड़ा-सा बाज़ार है, जहाँ रुद्राक्ष और शालिग्राम की अनेक दुकानें हैं। नेपाल में रुद्राक्ष ख़ूब होता है। और शालिग्राम तो विश्वभर में मिलता ही नेपाल की काली गण्डक नदी में है।
मैं बाज़ार में खड़ा था और मसान देखकर आया था। जीवन का अन्तिम सत्य मसान में पसरा हुआ था। परिसर के मध्य में स्वयं शिव विराजित थे। और पूरे परिसर में आस्था से लेकर मानुष तक सब सुंदर ही सुंदर था। आज मैं समझ सका कि सत्यं-शिवं-सुन्दरं का वास्तविक अर्थ क्या है।

✍️ चिराग़ जैन

सनातन धर्म और सहिष्णुता

सनातन संस्कृति की सबसे ख़ूबसूरत बात यही है कि यहाँ भक्त और भगवान के मध्य जो बातचीत होती है, वह केवल भक्तिरस तक ही सीमित नहीं है। बल्कि उसमें काव्य के अन्य सभी रसों की सृष्टि सम्भव है।
विश्व के अन्य किसी धर्म में यह चमत्कार सम्भव नहीं है। किसी अन्य धर्म के आराध्य की होली खेलते, रास रचाते, गोपियों के वस्त्र चुराते, जूठे बेर खाते आप कल्पना नहीं कर पाएंगे। किसी अन्य धर्म के पास ठिठोली करता ईश्वर नहीं मिलेगा। किसी अन्य धर्म का आराध्य हनुमान की तरह अशोक वाटिका उजाड़ कर किसी पेड़ से फल तोड़कर खाने लगे तो यह उसके व्यक्तित्व को सूट नहीं करेगा।
यह सब केवल सनातन परम्परा में संभव है। यहाँ ईश्वर को जीवन के प्रत्येक क्षण में सम्मिलित किया गया है। सनातन परम्परा ईश्वर को किसी धर्मस्थल विशेष तक सीमित करने की पक्षधर नहीं है। यहाँ तो ईश्वर को साथ लेकर घूमने का रिवाज़ है।
घर में विराजमान लड्डू गोपाल बाक़ायदा घर के सदस्य की तरह रहते हैं। वे परिवार के साथ उठते हैं, सोते हैं, खाते-पीते हैं, नहाते हैं और घूमने भी जाते हैं। वे नाराज़ भी होते हैं और मानते भी हैं। पारलौकिक से ऐसा लौकिक संबंध अन्यत्र कहीं सम्भव नहीं है।
यही कारण है कि हमारा ईश्वर हमारे साथ हँसता है। खिलखिलाकर हँसता हुआ ईश्वर अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। यह केवल हमारे पास सम्भव है।
माँ अनुसूया के पालने में त्रिदेव के खेलने की घटना इस बात की प्रमाण है कि सनातन परंपरा का ईश्वर वात्सल्य का सम्मान करता है। जसुमति मैया से झूठ बोलता कन्हैया ईश्वर के वात्सल्यबोध का परिचायक है। शबरी के जूठे बेर खाते राम और विदुरानी के हाथों से केले के छिलके खाते कृष्ण प्रेम की प्रतीति के उदाहरण हैं। रास रचाते कृष्ण संयोग सिंगार के प्रतिमान हैं और विकल होकर वन्य-वनस्पति से सीता का पता पूछते राम वियोग शृंगार के प्रतीक हैं। रुक्मणि के कृष्ण सदेह प्रेम की स्वीकारोक्ति हैं और मीरा के गिरिधर विदेह प्रेम के बिम्ब हैं। प्रह्लाद की आस्था पर खम्भ से उत्पन्न नृसिंह जब अपने नख से हिरण्यकश्यप का वध करते हैं तो भयानक रस साकार हो उठता है, और सती के आत्मदाह से क्रुद्ध शिव जब ताण्डव करते हैं तो रौद्र रस की सर्जना होती है। वामन अवतार में राजा बलि की समस्त सम्पदा नाप लेने वाले ईश्वर ने अद्भुत रस का उदाहरण प्रस्तुत किया। आँसुओं से सुदामा के चरण पखारते कृष्ण करुणरस का निमित्त हैं और नारद को हरिमुख देकर परिहास का पात्र बनाने वाले विष्णु हास्यरस की स्वीकृति हैं। युद्धक्षेत्र में भी उग्र न होकर संयत रहनेवाले राम शान्तरस का प्रमाण बन गए हैं।
सनातन परंपरा का ईश्वर जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में हमारे साथ हो सकता है। यही कारण है कि विवाह के लिए सजती दुल्हन को गौरी का स्वरूप मानकर उसकी पूजा की जाती है और बारातियों को शिव के गण मानकर गारी गायी जाती है। कन्या के पिता को जनक मानकर गीत गाने का चलन आज भी हमारे समाज में है।
हमने ईश्वर की अनुभूति के ताने को दिनचर्या के बाने के साथ ऐसे बुन दिया है कि गर्भाधान से लेकर अंतिम संस्कार तक हर जगह किसी न किसी पौराणिक सन्दर्भ का प्रतीक मानकर जीव को ईश्वर के समतुल्य मान लिया जाता है।
अन्य लगभग सभी धर्मों की कट्टरता या अदृश्य कट्टरता ने उनके ईश्वर को केवल धर्मस्थलों तक सीमित कर दिया है। यही कारण है कि उनके ईश्वर के साथ केवल भक्ति का सम्बंध बनता है। प्रेम, क्रोध, वात्सल्य और हास-परिहास के संबंध की कल्पना तक नहीं की जा सकती। ऐसा कुछ करते ही उनकी भावनाएँ आहत हो जाती हैं। ऐसा कुछ करते ही वे असहिष्णु हो जाते हैं।
लेकिन सनातन परम्परा में यह सब कुछ सम्भव था। इसीलिए हमारे यहाँ ईश्वर को प्रतीक मानकर ख़ूब काव्य रचा गया। यदि हमारे यहाँ भी कट्टरता का रोग होता तो कृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन करनेवाले सूरदास को सूली पर चढ़ा दिया गया होता। कृष्ण की प्रेम लीलाओं का चित्रण करनेवाले रसखान की गर्दन काट दी गयी होती। बिलखते हुए राम से परिचय करानेवाले तुलसी लोकनिंद्य हो चुके होते। शिव की बारात का बखान करनेवाले पुराण निषिद्ध हो चुके होते।
यह सनातन परम्परा का ही कनवास है कि यहाँ नारद मुनि के हास्यबोध और परशुराम तथा दुर्वासा सरीखे क्रोधित ऋषियों की कथा एक साथ स्वीकार्य है। जहाँ इंद्र तक को उसकी ग़लती का एहसास कराने के लिए कृष्ण गौवर्द्धन उठाने से नहीं हिचकते। गौवर्द्धन की घटना ईश्वर की ओर से मनुष्यता को यह संदेश देती है कि देवराज होने से ही कोई हमेशा सही सिद्ध होने का अधिकारी नहीं बन जाता।
शिशुपाल के सौ अपराध क्षमा करनेवाले कृष्ण जिस धर्म के पास हैं, उनको यदि ऐसा लगने लगे कि कोई बात, कोई परिहास, कोई उपालम्भ, कोई तर्क, कोई चर्चा उनके ईश्वर का अपमान कर सकती है तो यह उनकी नासमझी से अधिक कुछ नहीं है।
ईश्वर तो मान-अपमान से काफ़ी दूर निकल गया है। वह भक्त के निश्छल अपनत्व का छोर पकड़कर कठौती तक चला आता है। यह अपनत्व किसी भी भाव से पूर्ण हो सकता है। यहाँ तो शत्रुभाव से ईश्वर का स्मरण करने वाले रावण और कंस तक को तारने का रिवाज़ रहा है।
इसलिए इन दिनों जो लोग ईश्वर के सम्मान के ठेकेदार बने घूम रहे हैं, उनको स्मरण हो कि जब तक कट्टरता से बचा हुआ है तब तक सनातन धर्म का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता; और बाक़ी रही ईश्वर के सम्मान की बात तो उसकी चिंता ईश्वर पर छोड़ दें।

✍️ चिराग़ जैन

संस्कृति के विरुद्ध षड्यंत्र

पिछले कुछ वर्ष में भारतीय संस्कृति के विरुद्ध एक ऐसा डिजिटल षड्यंत्र प्रारम्भ हुआ है, जिसके शिकंजे में हमारे हज़ारों युवा फँसते जा रहे हैं। भारतीय संस्कृति अपनी आर्य परम्परा, सहिष्णुता, सौहार्द तथा वात्सल्य के दम पर पूरी दुनिया में शीर्ष पर रही।
इन मूल्यों के कारण ही यूनान, मिस्र, रोमा सब मिट गये जहाँ से लेकिन हमारी संस्कृति का बाल बांका न कर सके। मुग़लों ने भारत पर इतने लंबे समय शासन किया लेकिन सनातन परंपरा की गहरी जड़ों को हिला न सके। अंग्रेजों ने भौतिकवाद के तमाम अस्त्र छोड़े किन्तु विनम्रता और परस्पर उपकार करने की आदत के आगे उनका एक भी शस्त्र सफल न हो सका।
भयावह क्रोध में किसी के प्रति आक्रोश उमड़ता था तो भी घर की दीवार पर लगी मर्यादा पुरुषोत्तम की मुस्कान हमारे द्वेष को विगलित कर देती थी और हम उसकी नकारात्मकता से होड़ करने की बजाय अपनी सकारात्मकता की लकीर को बड़ा करने में जुट जाते थे।
हमने श्रीराम से सीखा है कि रावण से युद्ध जीतने के लिए रावण होना कोई उपाय नहीं है। स्वयं को राम बनाए रखते हुए अपनी सीता वापस लेने का नाम ही विजय है। यदि सामने वाले ने आपको अपने जैसा बनने के लिए विवश कर दिया तो फिर काहे की जीत?
यही आदर्श पूरी दुनिया को हमारे सामने घुटने टेकने पर विवश करता रहा है। इसीलिए मेरा ऐसा मत है कि दुनिया भर में सनातन संस्कृति से ईर्ष्या रखने वालों ने सोशल मीडिया पर ऐसी लाखों प्रोफाइल्स बनाई हैं, जिनके डीपी में या तो हिन्दू ध्वज होता है, या श्रीराम के उग्र स्वरूप का चित्र होता है या फिर ‘मैं कट्टर हिन्दू हूँ’ का उद्घोष होता है। इन प्रोफाइल्स पर आप नीचे तक स्क्रॉल करेंगे तो पाएंगे कि इनमें से अधिकतर में चार-पाँच बार डीपी चेंज करने के अलावा कुछ और नहीं होता। ऐसी कुछ प्रोफाइल्स में कट्टरता की पोस्ट्स भी कभी-कभार शेयर कर ली जाती हैं। कुल मिलाकर आप इन प्रोफाइल्स पर विचरण करेंगे तो आसानी से समझ सकते हैं कि यह किसी की ओरिजनल प्रोफ़ाइल नहीं है, बल्कि एक उद्देश्य विशेष के लिए बनवाई गयी फेक प्रोफाइल्स में से एक है।
ये सभी प्रोफाइल्स भारतीयता की बात करनेवालों को, लोकतंत्र की बात करनेवालों को, सद्भाव की बात करने वालों को और वर्तमान शासन की आलोचना करनेवालों की पोस्ट पर गंदी गालियाँ लिखकर आती हैं। इसमें सरकार की आलोचना करनेवालों को गालियाँ बककर वे यह सिद्ध करते हैं कि ये प्रोफाइल्स भाजपा सरकार ने बनवाई हैं। जबकि वास्तव में उनका उद्देश्य सनातन संस्कृति को बदनाम करना है।
जब कोई डीपी में भगवान राम का चित्र लगाकर माँ-बहन की गालियाँ बकेगा तो उससे साख तो श्रीराम की ही धूमिल होगी। जब कोई ‘मैं कट्टर हिंदू हूँ’ लिखकर अभद्र टिप्पणियाँ करेगा तो इससे बदनामी उसकी नहीं होगी, हिंदू धर्म की होगी।
ऐसे में मोदी सरकार के भोले-भाले समर्थक इनके झाँसे में आकर इनके जैसा आचरण करने को ही राष्ट्रवाद मान बैठे हैं। जबकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रार्थना में मातृभूमि के जिस गुण की सबसे पहले पूजा की गई है वह है ‘वात्सल्य’ (नमस्ते सदा ‘वत्सले’ मातृभूमे)। ऐसी विचारधारा के लोग भला कट्टरता और गाली-गलौज का समर्थन कैसे कर सकते हैं।
श्रीराम को आदर्श माननेवाली परम्परा भला बदले की भावना को कैसे भड़का सकती है? यदि बदला लेना ही उचित होता तो क्या श्रीराम सीता के अपहरण के बदले मंदोदरी का अपहरण न कर लेते! लेकिन श्रीराम ने हमें सिखाया कि उस युद्ध का उद्देश्य केवल अपनी सीता वापस लेना है। इस प्रयास में जो लंका उन्होंने जीती उस पर भी अधिकार नहीं किया।
‘हमने दुश्मन को गले मिल-मिल के शर्मिंदा किया है’ जैसे सूक्ति वाक्यों का अनुगमन करने वाली परम्परा को गाली-गलौज और वैभत्स्य के अखाड़े में खींचने का यह षड्यंत्र श्रद्धेय डॉ हेडगेवार और पूज्य गुरु गोलवलकर जी के सपनों को ध्वस्त करने का एक कुचक्र है।
आप स्वयं देखिए, जबसे ये प्रोफाइल्स बनी हैं तबसे हेडगेवार जी और गुरु गोलवलकर जी का कोई नाम भी उद्धृत नहीं करता। क्योंकि इनके विचारों पर विवाद नहीं किया जा सकता। सब लोग सावरकर के नाम को उछालते हैं, नाथूराम गोडसे का नाम लेते हैं क्योंकि इनके नाम पर विवाद करके हमारी संस्कृति, परम्परा और विचारधारा को विवादित सिद्ध किया जा सकता है।
श्रीराम के मुस्कुराते हुए चित्र, वन को जाते हुए श्रीराम के चित्र, हनुमान को गले लगाते हुए श्रीराम के चित्र, शबरी के बेर खाते हुए श्रीराम के चित्र हमारे जीवन से ग़ायब कर दिए गए हैं। क्योंकि इन सब चित्रों को देखकर श्रीराम उनके लिए भी पूज्यनीय हो जाते हैं, जो जन्मतः वैष्णव नहीं हैं। इसके स्थान पर आपको क्रोधित राम की पेंटिंग दी गयी है डीपी पर लगाने के लिए। ज़रा याद करके देखें कि आपने अपने बचपन में क्रोधित राम का चित्र कहाँ देखा था? आपको समझ आएगा कि ये पेंटिंग्स पिछले कुछ वर्षों में एक षड्यंत्र के तहत बनवाई गई हैं ताकि अपनी मुस्कान से सबका मन मोहनेवाले भगवान राम की उस छवि को बदला जा सके।
अपनी विनम्रता से पूरी दुनिया को दीवाना बना लेने वाले सनातन धर्म को लड़ाकों और कट्टरवादियों का धर्म सिद्ध किया जा सके। काश मेरे इस महान धर्म की युवा पीढ़ी इस षड्यंत्र से बच सके ताकि ‘मधुराधिपतेरखिलं मधुरं’ की इस अद्वितीय संस्कृति को बचाया जा सके।

✍️ चिराग़ जैन

रामसेतु

इन नासमझों का होगा नहीं रे कल्याण
रामधरा पर मांग रहे हैं रामलला के प्रमाण

श्रीराम बसे हैं आंगन में, पावन तुलसी की क्यारी में
श्री राम बसे हैं घर-घर में, आपस की दुनियादारी में
श्रीराम हमारी आँखों में, श्रीराम हमारे सपनों में
श्रीराम हैं सारे संबंधों में, सब रिश्तों में, अपनों में
बोलो कण-कण व्यापी का, कैसे करोगे परिमाण

मांगो प्रमाण रामायण के, इस भारत भू के कण-कण से
सरयू की निर्मल धारा से, और अवधपुरी के आंगन से
पूरब के उस मिथिलांचल से, पश्चिम के उस दंडक वन से
उत्तर के बृहत् हिमालय से, दक्षिण के उस भीषण रण से
देगा गवाही तुम्हें, सागर का थोथा अभिमान

ढूंढो शबरी के बेरों में, जंगल की दुर्गम राहों में
तिनकों की पावन कुटिया में, महलों की सिक्त निगाहों में
कब राम हुए थे ये पूछो, जंगल के हर इक वानर से
जिसने रावण को टक्कर दी, उस पंछी के टूटे पर से
भ्राता भरत से पूछो, पूजे थे जिसने पदत्राण

रामायण इस भारत भू के गौरव की अमर कहानी है
ये कथा हमारे पुरखों के पौरुष की एक निशानी है
रामायण केवल ग्रंथ नहीं, संस्कृति का ताना-बाना है
इस रामायण को झुठलाना, इस संस्कृति को झुठलाना है
इसमें बसा है अपने भारत का स्वर्णिम स्वाभिमान

जिनको पढ़ कर जीना सीखा, उनको मिथ्या बतलाते हैं
ये रावण के गोरे वंशज, राघव पर प्रश्न उठाते हैं
ये मैकाले के दूत भला तुलसी को क्योंकर मानेंगे
जो ख़ुद को जान नहीं पाए, रघुपति को क्या पहचानेंगे
आंखों पे पट्टी बांधे, करने चले हैं पहचान

✍️ चिराग़ जैन

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