परिपक्व
परिपक्वता एक सिद्धि है जो थोड़े नैष्ठुर्य, थोड़ी कायरता और थोड़ी निर्लज्जता की साधना से प्राप्त होती है।
✍️ चिराग़ जैन
परिपक्वता एक सिद्धि है जो थोड़े नैष्ठुर्य, थोड़ी कायरता और थोड़ी निर्लज्जता की साधना से प्राप्त होती है।
✍️ चिराग़ जैन
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‘भैया, दिल्ली वाला गीत अभी क्यों रिलीज़ किया। यूक्रेन युद्ध पर कुछ इमोशनल-सा वीडियो बना दो। ग़ज़ब वायरल होगा। दिल्ली-विल्ली तो कभी भी चल जाएगा, इस टाइम वॉर के पोटेंशियल को कैश करो।’ -यह सलाह देनेवाला शख़्स मेरा हितचिंतक है, यह तय है। डिजिटल मार्केटिंग और आधुनिक बाज़ारों के मापदंड पर यह सलाह सही भी हो सकती है लेकिन मेरे भीतर का कबीर इस सलाह को सुनकर प्रसन्न होने की बजाय भयभीत हो गया है।
युद्ध बाज़ार में खींच लाया गया है और अब बाज़ार इससे लाभ उठाने के लिए युद्धरत है। यह मानवीय संवेदना की मृत्यु की घोषणा है।
पत्रकारिता का काम है कि भूख से पीड़ित व्यक्ति की सूचना समाज तक पहुँचाए। कविता का दायित्व है कि वह उस भूखे तन की न्यूनतम आवश्यकता पूर्ण करने योग्य संवेदना समाज में प्रसारित करे और राजनीति की प्रवृत्ति है कि वह उस भूखे को रोटी देते हुए फ़ोटो खिंचाकर उसका श्रेय लेने का श्रम करे। किन्तु लाइक्स और शेयर्स की अंधी दौड़ में संलग्न समाज उस भूखे तन को नोच-नोच कर वायरल होने का उपाय ढूंढ रहा है।
लाइक्स और शेयर्स की यह होड़ इतनी वीभत्स है कि घर परिवार में मृत्यु होने पर ‘शव’ के चित्र और ‘शवदाह’ के वीडियो लाइव करने से भी हमें संकोच नहीं होता। चुम्बन से लेकर गर्भावस्था तक सब कुछ केवल लाइक्स बटोरने का ज़रिया हो चला है।
अमानुष होने का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि किसी की आह सुनकर हमारी आँख में आँसू आने की बजाय, उस आह को बेचने के विचार से हमारी आँखों में चमक आ जाती है। युद्ध के सभी वीडियो बाज़ार ही वायरल करा रहा है यह सत्य नहीं है किन्तु हर वायरल होती वीडियो की संवेदना का बाज़ार भाव टटोला जा रहा है यह भयावह है।
अपने समाज के युवक-युवतियों को जब ‘अश्लील’ और ‘लगभग अश्लील’ रील्स तथा शॉट्स बनाते देखता हूँ तो एहसास होता है कि ‘समाज’ नामक जिस किले में हमने अपने परिवारों को सुरक्षित कर दिया था उसकी दीवारों में दरार पड़ गयी है। टीन-एजर्स को जब सार्वजनिक वीडियो में ‘गालियाँ’ बकते देखता हूँ तो साफ़ दिखाई देता है कि आँखों की हया और बड़े-बुजुर्गों के लिहाज का जो छप्पर हमने समाज पर डाल रखा था वह तार-तार हो गया है और हमारा समाज खुले आसमान के नीचे लगभग नंगा बैठा है।
इसके तन पर जो कुछ कतरनें बची हैं, उन्हें संवेदना की सीवन से न सीया गया तो आश्चर्य न करना कि बाज़ार में मातम की डिमांड होने पर पड़ोसी के घर का मातम बेचनेवाला यूट्यूबर अपने घर में ही प्रोडक्शन करने का जुगाड़ कर ले। अपराध का वीडियो आसानी से वायरल होता है, इस वीडियो को बनाने के लिए आपका नौनिहाल अपराध की राह पर किस दूरी तक जा सकता है, इसका अनुमान बहुत आवश्यक हो चला है। थोड़ी-सी उघाड़ करने से लाइक्स तेज़ी से आने लगे तो आपकी बेटियाँ लोभ के इस अंधकूप में जल्दी ‘सेलिब्रिटी’ बनने के लिए क्या कुछ कर जाएंगी इसका आभास बेहद ज़रूरी है।
हर आँसू, हर संवेदना, हर पीड़ा और हर रिश्ते को वायरल होने का एक अवसर मानना इन कर्णधारों को कितना बर्बर कर देगा… यह यथाशीघ्र अनुभूत कर लीजिए क्योंकि यदि ये शोर एक प्वाइंट और बढ़ गया तो फिर किसी भी तरह से आपकी बात इनके कानों तक नहीं पहुँच सकेगी। ‘कुछ भी’ करके वायरल होने की दौड़ लगाते इन होनहारों को रोक लो, वरना ये वायरल होने के लिए ‘कुछ भी’ कर जाएंगे…!
✍️ चिराग़ जैन