Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
प्रेम चलकर नित्य आता है हमारे द्वार अब भी
पर हमारी बाजुओं का पाश छोटा हो गया है
रोज़ सूरज रश्मियां अपनी लुटाता फिर रहा है
पर धरा की सोच का आकाश छोटा हो गया है
स्वप्न देखें रौशनी का, आँख पलकों में छिपाकर
कोसते हैं भाग्य को हम, अवसरों से मुँह चुराकर
साँस का सत्कार करने का नहीं है होश हमको
चाहते सौभाग्य हम, दुर्भाग्य पर नज़रें गड़ाकर
सामने खुशियाँ सुगंधित फूल चुनकर रख रही हैं
पर हमारी पुतलियों का व्यास छोटा हो गया है
उत्सवों में हम निजी एकांत लेकर जी रहे हैं
वास्तविकता त्याग दी, सिद्धांत लेकर जी रहे हैं
रोज़ करते फिर रहे पाखण्ड हम गंभीरता का
हम उदासी के लिए मुख क्लांत लेकर जी रहे हैं
हर गली, हर गाम पर, बिखरी पड़ी हैं खिलखिलाहट
पर हमारे प्राण में उल्लास छोटा हो गया है
अतिथियों को नाम से आवास घबराने लगा है
भूख इतनी बढ़ गई, उपवास भय खाने लगा है
हास्य को उपरांत यूँ संत्रास की चिंता बढ़ी है
क्रोध की कर कल्पना परिहास कतराने लगा है
कौन जाने किस घड़ी किसने छला है हम सभी को
आदमी का आपसी विश्वास छोटा हो गया है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
नभ तक वीराना पसरा है
हर मन में गहमागहमी है
गिद्धों में मुठभेड़ हुई है
पर चिड़िया सहमी-सहमी है
सबके मुँह पर ख़ून पुता है, नाखूनों में मांस भरा है
पर भोली चिड़िया के भीतर, दहशत का एहसास भरा है
इसने उसकी चिड़िया मारी, उसने इसकी चिड़िया खाई
खूब लड़े फिर समझौतों में, चिड़िया की ही दावत पाई
गिद्ध, चिरैया को सुख देंगे
ये इक झूठी खुशफहमी है
गिद्धों में मुठभेड़ हुई है
पर चिड़िया सहमी-सहमी है
किन-किन में संघर्ष हुआ था, पंख नुचे हैं किनके-किनके
उनके बीच तनी तलवारें, इनके घर हैं तिनके-तिनके
हर नन्हा पंछी घायल है, हर डाली आँसू गाती है
लेकिन गिद्धों के पंखों पर, कोई शिकन नहीं आती है
गिद्धों ने अचकन पहनी है
मासूमों पर बेरहमी है
गिद्धों में मुठभेड़ हुई है
पर चिड़िया सहमी-सहमी है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Poetry, Unpublished Geet
भय शत्रु पक्ष का गौण रहे
अरि की चर्चा जब मौन रहे
विश्वास स्वयं के शस्त्रों पर
योद्धा का गहरा होता है
तब विजय सुनिश्चित होती है
बस तभी दशहरा होता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
इस तपोवन में सृजन की साधनाएँ चल रही हैं
ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है
मन गहन संवेदना अनुभूत करने में जुटा है
तन अभी स्वर-व्यंजनों में प्राण भरने में जुटा है
भाव का उत्कर्ष छूकर नयन खारे हो रहे हैं
इस सृजन सुख में जगत् के डर किनारे हो रहे हैं
शब्द से सच का सहज चेहरा उकेरा जा रहा है
झूठ सुन ले, यह किसी षड्यंत्र की चौसर नहीं है
ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है
इस जगह पर कामना के पर कतरने का नियम है
लाभ से दामन छुड़ाकर कर्म करने का नियम है
कान सबके दूसरों के आँसुओं की आह पर हैं
ध्यान सबका सृष्टि भर के अप्रतिम उत्साह पर है
इस धरा पर स्वार्थ को पूरा निचोड़ा जा रहा है
वासनाओं के लिए यह धाम कुछ हितकर नहीं है
ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है
इस समय वात्सल्य का उल्लास-उत्सव चल रहा है
रच रहे हैं आज नटवर रास; उत्सव चल रहा है
कृष्ण के आनंद में सुख से भरी हैं कुंजगलियाँ
पीर की काया बड़ी है, संकरी हैं कुंजगलियाँ
द्वेष से मिलने कन्हैया आएंगे मथुरा स्वयं ही
कंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है
ध्वंस से कह दो यहाँ उसके लिए अवसर नहीं है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
उन्नत शिक्षा हेतु समर्पित
इस धरती का अभिनंदन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन
जननी-तनय सरीखे ही हैं, आवश्यकता-आविष्कार
अनुभव का अवलंबन थामे बढ़ता अधुनातन आचार
भौतिकता के चक्र, कल्पना-अश्व, साधना का स्यंदन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन
ज्ञान वही, जो मानवता हित सज्जन का निर्माण करे
शोध वही, जो जन-जन के हित सुविधा अनुसंधान करे
शिक्षा वह, जिससे बन पाये, सरल, सुगम, सुंदर जीवन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन
अर्जित कर, संरक्षित करना और प्रसारित करना ज्ञान
यही स्वप्न है, यही सोच है, यही हमारा लक्ष्य प्रधान
ऊर्जा के मस्तक पर चंदन तिलक लगाता अनुशासन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन
अलख तरंगों को लिखते हैं, अकथ स्वरों को सुनते हैं
प्राणहीन यंत्रों को समझें, हर स्पन्दन को गुनते हैं
एक साथ साधे हैं हमने जड़, चेतन और अवचेतन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन
उद्यमस्य सम किमपि न भवति, कर-कर इसी मंत्र का ध्यान
सुकर बनाकर सुगम सूचना, स्वप्न लिए जग का कल्याण
अभिनव शिक्षा, अभिनव जीवन, अभिनव दर्शन, अभिनव मन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन
संस्कृति की समृद्धि हमारी पृष्ठभूमि का तत्व प्रधान
मानव निर्मित बुद्धि, प्राकृतिक भाषा का करते संधान
आगत का स्वागत करते हैं और अतीत का आराधन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन
विश्वामित्री के तट पर वट की नगरी है सुन्दरतम
शिक्षा के नित-नूतन-नय को करती है यह हृदयंगम
संस्कृति और विज्ञान यहाँ करते दिखते हैं आलिंगन
इस परिसर से ज्ञान प्रसारित
इसके कण-कण का वंदन
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
सामने आ गए आज फिर हम
आज फिर से संभलना पड़ेगा
एक-दूजे से ख़तरा नहीं है
ख़ुद से बच के निकलना पड़ेगा
आँख से तुम बरसने न दो बदलियाँ
काँपकर सब बयां कर न दें उंगलियाँ
चल न आना मेरी ओर सब भूलकर
बोलने लग न जाएँ कहीं पुतलियाँ
नेह को कब दिखी कोई सीमा
देह को ही समझना पड़ेगा
एक-दूजे से ख़तरा नहीं है
ख़ुद से बच के निकलना पड़ेगा
उस घड़ी किस तरह से जिया जाएगा
तुमको परिचय हमारा दिया जाएगा
साँस की चाल कैसे रहेगी सहज
होंठ को किस तरह से सिया जाएगा
जब संभाले न संभलेंगे आँसू
उस घड़ी खूब हँसना पड़ेगा
एक-दूजे से ख़तरा नहीं है
ख़ुद से बच के निकलना पड़ेगा
अपनी चाहत से नज़रें चुराते हुए
जी रहे थे स्वयं को भुलाते हुए
भाग्य, जिसने हमें तब अलग कर दिया
आज हिचका न हमको मिलाते हुए
तब बिछड़कर सिसकते थे हम-तुम
आज मिलकर सिहरना पड़ेगा
✍️ चिराग़ जैन