+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

मानव की तस्वीर

पंक्ति अक्षर-शरों भरी तूणीर दिखाई देती है दर्द भरे दिल में दुनिया की पीर दिखाई देती है हास्य कहो या व्यंग्य कहो, शृंगार कहो या शौर्य कहो हर कविता में मानव की तस्वीर दिखाई देती है ✍️ चिराग़...

दीपावली

अमावस के आकाश में रौशनी का खेल माटी के दीपकों में फुँकता हुआ तेल चौराहों पर बिखरी बंगाली मिठाई और आग में जलती देश की कमाई मेरे मन में कुछ प्रश्न भर जाती है और मुझे सोचने पर विवश कर जाती है क्या ग़रीब के घर से ज़्यादा अंधकारमय है आकाश? क्या निर्धनकाया से ज़्यादा रूखापन...

स्वार्थ

तीर कोरे स्वार्थ के जब तरकशों से जुड़ गए बाम पर बैठे कबूतर फड़फड़ाकर उड़ गए स्वार्थ शामिल हो गया जब से हमारी सोच में पग हमारे ख़ुद-ब-ख़ुद राहे-गुनाह पर मुड़ गए ✍️ चिराग़...
error: Content is protected !!