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सत्य

सत्य, जिसकी हम अभागे खोज करते फिर रहे हैं वो युगों से वैभवों का दास बनकर जी रहा है न्याय, जिसकी चाह में जीवन समर्पित कर चुके हैं वो किसी दरबार में उपहास बनकर जी रहा है पीर की सिसकी सुनी तो आँख का पानी पिलाया दर्द बेघर था, उसे अपने बड़े दिल में बसाया आह बेसुध थी, उसे...

ओ समय!

ओ समय! जब तू मेरे विपरीत चलकर थक चुकेगा तब तुझे कुछ देर मेरे साथ भी चलना पड़ेगा जिस दीये के भाग्य में घी और बाती आ गई है उस दीये को आज सारी रात भी जलना पड़ेगा सत्य के तप की परीक्षा जब कभी प्रारब्ध लेगा तब महाश्मशान तक प्रारब्ध ख़ुद भी जाएगा ही सत्य तो हर इक चुनौती झेल ही...

आईआईटी रुड़की का कवि सम्मेलन

आईआईटी रुड़की का कवि सम्मेलन था। सभागार में तिल रखने को जगह नहीं थी। मंच पर डॉ गोविंद व्यास, श्री मनोहर मनोज, श्री अरुण जैमिनी, श्री अंसार कम्बरी और मैं आमंत्रित कवियों के रूप में विराजमान थे। तीन कवि रुड़की स्थानीय कवियों के रूप में मंचासीन थे और दो युवक विद्यार्थी...

शब्द नहीं चुके, हम चूके हैं

हिंदी की वर्तनी में कई बार हम ऐसी चूक कर देते हैं, जिससे अर्थ का अनर्थ हो जाता है। लापरवाही के कारण कोई-कोई भूल परंपरा भी बन जाती है और फिर शब्दकोष पलटने के आलस्य के कारण समाचार पत्रों में विद्यमान “विद्वान” उसे प्रचलित प्रयोग का नाम देकर स्वीकार्य मान...

अपशकुनों का दोष

सागर खारा, नदिया सूखी ताल-तलैया में कीचड़ था लेकिन प्यास नहीं बुझने का, हर आरोप ओक ने झेला पेट अन्न को तरस रहा था और शिरा में रक्त नहीं था प्रेम व्यस्त था, प्रीत त्रस्त थी आलिंगन का वक़्त नहीं था चिंताओं की धूप धरा की उर्वरता को सोख चुकी थी पर फिर भी बंध्या जीवन का,...
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