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अपनेपन का स्वांग

यूं तो सारी राहें मैंने सोच समझ कर चुन रखी थीं चंद मुश्क़िलें अपनेपन का स्वांग रचाकर साथ आ गईं पथ में कोई वबेला कब था राही भला अकेला कब था किसको, कब, क्या कहना होगा -इन प्रश्नों का रेला कब था किस बीहड़ में, किस पोखर पर, कितना पानी, कब पीना है इन सारे प्रश्नों की चिंता...

भीगा मन

झमाझम बारिश दिल्ली यूनिवर्सिटी कैम्पस भीगते हुए लड़के-लड़कियाँ लटों से फिसल कर टपकती बूंदें फर्राटे से पानी उछालती गाड़ियाँ मस्ती में किलकारता यौवन मोटर-बाइक पर आलिंगनबद्ध प्रेम ग्वाॅयर हाॅल कैंटीन की मैगी चाय की चुस्कियाँ काॅलेज-डेज़ की यादें किसी पुराने परिचित से...

यकीन का धागा

या तो रिश्तों में सवालात को शुमार न कर या जवाबों की हक़ीक़त पे ऐतबार न कर पार ले जाएगा तुझको यकीन का धागा तू किसी और सफ़ीने का इंतज़ार न कर ✍️ चिराग़...

बंदिशें मुस्कान पर

लोग अब दौलत तिजोरी में कमाकर रख रहे हैं और कुछ हैं जो बाज़ारों में धमाके रख रहे हैं रख रही है जब सियासत बंदिशें मुस्कान पर तब यहाँ कुछ लोग जीवन में ठहाके रख रहे हैं ✍️ चिराग़...

मिलावट

ढाया है दरिंदों ने क्या कहर निवालों में बच्चों को परोसा है, कल ज़हर निवालों में क्या सोच के आया था, वो पहर निवालों में किस क़द्र ठगा सा है, इक शहर निवालों में ✍️ चिराग़...
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