+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

आज जंतर-मंतर पर जो भीड़ जुटी है, वह कल क्या कर पाएगी, इस प्रश्न का उत्तर तो भविष्य की कुक्षि में छिपा है, लेकिन उसने आज-आज में भारतीय समाचार चैनल्स की चेहरे को जितना नंगा कर दिया है, वह पिछले दस-बारह वर्ष में कभी इतनी साफ़गोई से नहीं हो सका था।
आज के दिन की रिपोर्टिंग को देखकर यह साफ़ कहा जा सकता है कि भारतीय मीडिया सरकार की पीआर एजेंसी के रूप में कार्य करती है। और तथ्यों को न केवल छिपाती है बल्कि पीत पत्रकारिता करके, झूठ बोलकर सरकार के पक्ष में माहौल बनाने का हर संभव प्रयास करती है।
सरकार की पब्लिक इमेज को बनाए रखने के लिए समाचार चैनल्स को झूठ की जितनी घिनौनी तस्वीर पेश करनी पड़े, वह करेगी।
आज की रिपोर्टिंग के तीन स्तर हैं। प्रथम, दीपके की चरित्र हत्या। द्वितीय, समर्थकों को इस-उस दल का कार्यकर्ता सिद्ध करना। तृतीय, भीड़ के चित्रों से बचते हुए सौ-पचास लोगों की उपस्थिति रिपोर्ट करके यह सिद्ध करना कि आंदोलन फुस्स हो गया है।
मैं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से आंदोलन से नहीं जुड़ा हूं। किन्तु मैंने अपने जीवन के पांच साल तक पत्रकारिता तथा जनसंचार की पढ़ाई की है। मैंने भारतीय पत्रकारिता का जितना समृद्ध और प्रभावी इतिहास पढ़ा है, उसके झरोखे से जब मैं आज की पत्रकारिता को देखता हूं तो मुझे यह तस्वीर और भी अधिक कुत्सित नज़र आती है।
दिन को दिन और रात को रात कहने का दायित्वनिर्वहन करती हुई पत्रकारिता ने अपने इस कर्तव्य से मुंह मोड़ लिया है। यदि यह मान ही लिया जाए कि शासन के दबाव तथा व्यावसायिक घरानों के राजनैतिक हितों की मजबूरी में कई बार शाम को रात कहने वाली पत्रकारिता दरअस्ल विवश है। किन्तु भरी दोपहर को रात कहने में तो थोड़ी सी लज्जा चेहरे पर उतर ही आनी चाहिए थी।
जिन न्यूज़ प्रेज़ेंटर्स ने दस-पन्द्रह से सौ-पचास और चार-पांच सौ तक की संख्या बताकर देश के युवाओं के इस प्रयास का उपहास किया है। अगर यह ख़बर पढ़ते हुए उनकी नज़रें भी नीची हुई होतीं तो मैं उनकी विवशता को क्षम्य मान सकता था।
लेकिन जिस ढिठाई से आन्दोलन को विवश बताया गया। मेन स्ट्रीम रिपोर्टिंग से आंदोलन को नदारद किया गया, वह भारतीय पत्रकारिता के गौरवशाली इतिहास के मुख पर कालिख पोतने जैसा कृत्य है।
सुना है, कभी एक मशहूर एंकर शराब पीकर लड़खड़ाते हुए जनरल रावत के निधन का समाचार पढ़ते पाए गए थे। विश्वास मानिये, उस दिन भी पत्रकारिता इतनी शर्मिंदा नहीं हुई थी।
सुना है, एक पत्रकार बाकायदा खबरों की दलाली करते कैमरे में कैद हुए, बाकायदा जेल होकर आए। उस दिन भी पत्रकारिता इतनी शर्मिंदा नहीं हुई थी।
सुना है, नोटबंदी के दौर में नए नोट के पक्ष में माहौल बनाते हुए नए नोट में चिप होने की ख़बर प्रसारित हुई थी। उस दिन भी पत्रकारिता इतनी शर्मिंदा नहीं हुई थी।
लेकिन आज तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ ने गिरने की हर मार्यादा लांघकर बाकी के तीनों स्तंभों को धराशायी करने का कुचक्र रच दिया। आज हिंदी पत्रकारिता के जनक पंडित जुगल किशोर की आत्मा बहुत कष्ट में होगी।
अंग्रेज सरकार से डरे बिना भारतीय समाज को जागृत करने के प्रयास में जेल जानेवाले पत्रकारों को आज यह देखकर कैसा लग रहा होगा कि उनकी वंशबेल ऐसे क्लीवस्वभावी प्राणियों से जा लिपटी है, जिन्हें कोरा झूठ बोलने में लेशमात्र भी संकोच नहीं होता।
हालांकि निर्लज्जता के उत्कर्ष तक जा पहुंचे पत्रकारों से कोई उम्मीद तो नहीं है लेकिन यह याद दिलाने का दुस्साहस कर रहा हूं कि इस देश में उपहार सिनेमा की ख़बर पढ़ते समय सुरेन्द्र प्रताप सिंह की हृदयगति रुक गई थी। याद दिलाना चाहता हूं कि आपातकाल के विरोध में जनसत्ता ने पूरा पेज काला छापकर सरकार का मुखर विरोध किया था।
मैं यह अपेक्षा कतई नहीं करता कि आज की पत्रकारिता सरकार की किसी नीति का विरोध कर सकेगी। लेकिन इतनी अपेक्षा तो थी ही कि ये सच से ठीक 180 डिग्री मुंह फेरकर सफेद झूठ बोलते अपने आकाओं को ख़ुश करने में नहीं हिचकिचाएंगे।
मैं सोच नहीं पाता हूं कि इन लोगों का सामना जब अपने बच्चों से होता होगा, तो क्या इनका दिल दहल नहीं जाता होगा कि अपने नौनिहालों के लिए वे कैसे भारत का निर्माण कर रहे हैं।
सरकारी योजनाओं का विज्ञापन, सरकारी ईवेंट्स की ईवेंट कवरेज तक जिन पत्रकारों की पूरी क्षमता सिमटकर रह गई है, उन्हें अपने घरों में एक आईना ज़रूर रखना चाहिए, ताकि कभी गाहे-बगाहे उन्हें अपनी शक्ल दिखाई दे जाए तो याद कर सकें कि कभी उनकी आंखों में भी हया हुआ करती थी।

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!