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क्या-क्या बदलता है

कभी मुद्दा, कभी चेहरा, कभी पाला बदलता है सियासतदां सियासत के लिए क्या-क्या बदलता है न पूछो वक़्त अपने साथ में क्या-क्या बदलता है सुबह से शाम होने तक मेरा साया बदलता है यहाँ हर आदमी उस गाम पर चेहरा बदलता है जहाँ जाकर मेरे किरदार का ओहदा बदलता है हुनर का वो भी इक मैयार...

उससे पहले ख़ुद को गिनना

बस यूं कहिए ध्यान नहीं था वरना, मैं नादान नहीं था उससे पहले ख़ुद को गिनना ये इतना आसान नहीं था ✍️ चिराग़...

घुटने

जिनकी पहचान थी ख़ुद्दारी, उन्हीं लोगों के हाथ तो हाथ मेरे यार, जुड़े हैं घुटने बात जब अपने पे आती है बदलते हैं उसूल पेट की ओर ही हर बार मुड़े हैं घुटने ✍️ चिराग़...
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