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आज़ाद हो गए हैं

कुछ इस तरह के अपने हालात हो गए हैं सपने सभी सुहाने, बर्बाद हो गए हैं आब-ओ-हवा है ऐसी, दम सबका घुट रहा है कुछ लोग कह रहे हैं- ‘आज़ाद हो गए हैं’ ✍️ चिराग़...

बाज़ारीकरण

किस क़दर हावी हुई हैं व्यस्तताएँ देखिए कसमसा कर रह गईं संवेदनाएँ देखिए स्वार्थ, बाज़ारीकरण और वासना की धुंध में खो चुकी हैं प्रेम की संभावनाएँ देखिए ✍️ चिराग़...

सही उत्तर

यूँ ही पूछ बैठी थीं तुम ‘मेरे बिना रह पाओगे?’ सुनकर मेरे मस्तिष्क में एकाएक कौंध गया एक और प्रष्न- ‘क्या तुम सही उत्तर सह पाओगी?’ …ख़ुद से उलझते-जूझते अनायास ही मेरे मुँह से निकल गया- ‘नहीं!’ …और तुमने इसे अपने प्रश्न का उत्तर समझ लिया। ✍️ चिराग़...

अनकहा

सदियों से तलाश रहा हूँ एक ऐसा श्रोता जो सुन सके मेरी कविताओं का वह अंश जो मैंने कहा ही नहीं क्योंकि ‘बहुत कुछ’ कह देने की संतुष्टि से कहीं बड़ी है बेचैनी ‘कुछ’ न कह पाने की ✍️ चिराग़...
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