Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
जो रैली में पींग बढ़ाते नारों की
हालत देखो जाकर उन बेचारों की
इंसानों की बस्ती भूखी बैठी है
तुम बातें करते हो चाँद-सितारों की
आँसू की आवाज़ छुपाकर रख पाएँ
इतनी भी औक़ात कहाँ दीवारों की
लहरों से कश्ती का हाथ छुड़ाना है
हिम्मत बढ़ती जाती है पतवारों की
सिगरेट को इक बार बुझाना उंगली से
गर तासीर समझनी है अंगारों की
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
ईद के चांद अगर हो तो बस इतना कर दे
फिर से इस मुल्क के लहजे में मिठास आ जाए
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
नदी मीठी नहीं लगती तुम्हें अब
तुम्हारी प्यास जूठी हो गई है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
सदा तो सँग तलक दर-ब-दर नहीं होते
कहा ये किसने चिराग़ों के घर नहीं होते
अभी असर न दिखा हो तो इंतज़ार करो
हैं ऐसे दांव भी जो बेअसर नहीं होते
ग़मों की धूप में नाज़ुक बदन मुफ़ीद नहीं
गुलों के जिस्म नरम, सूखकर नहीं होते
खुद अपना बोझ उठाने में कोई हर्ज़ नहीं
पराये पाँव बहुत मोतबर नहीं होते
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
न जाने कितने ही लम्हों का अक्स है इसमें
ये मेरी शक़्ल एक दौर की झलक भर है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
कोई हमारे नसीब को इक नयी कहानी सुना रहा है
हथेलियों पर कई लकीरें बना रहा है, मिटा रहा है
बहुत दिनों से जिस एक खिड़की के पार किरणें न आ सकी थीं
अब एक उम्मीद का परिंदा उसी के पल्ले हिला रहा है
जिसे बचाने की कोशिशों में हरेक हसरत दबा ली हमने
उसी अना को सलाम करके कहीं कोई मुस्कुरा रहा है
अंधेरा आँखों में यूँ भरा था कि रौशनी की जगह नहीं थी
पर एक तारा हमारी पुतली में आजकल जगमगा रहा है
ग़ज़ब तो ये है कि हम मुक़द्दर की नींद पर हँस रहे थे अब तक
नसीब करवट बदल रहा है तो आज रोना क्यों आ रहा है
✍️ चिराग़ जैन