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दीवारों के कान

जो सुख की मंज़िल पर छोड़ें वो राहें आसान नहीं हैं शायद लफ़्ज़ों के ही पर हों दीवारों के कान नहीं हैं बस मेरी परवाह नहीं की वैसे वो नादान नहीं हैं उनको इस पर हैरानी है -हम बिल्कुल हैरान नहीं हैं ✍️ चिराग़...

देवता बहरा हुआ है

पूजने वाले का संकट और भी गहरा हुआ है जब से वेदी पर विराजा, देवता बहरा हुआ है हम अभागों के दुखों को देखकर रोया कभी जो क्रांति की ज्वाला जगा कर फिर नहीं सोया कभी जो ईश जाने उस हृदय पर कौन सा पहरा हुआ है जब से वेदी पर विराजा, देवता बहरा हुआ है आज तक जिसने सभी के पाँव से...

कविकर्म

कभी हिचकी, कभी आँसू, कभी मुस्कान बाँटेंगे अना, उम्मीद, नेकी, हिम्मत-ओ-अरमान बाँटेंगे कभी शब्दों का मरहम इश्क के घावों पे रखेंगे कभी नफरत को चैनो-अम्न का सामान बाँटेंगे ✍️ चिराग़...

बलात्कार

फिर से एक प्रश्न पर अटक गये हैं मिस्टर यक्ष; कि सामान्यतया बलात्कार के होते हैं दो पक्ष। एक बलात्कारी, जो बलात्कार करता है, और एक बलात्कृता जिसका बलात्कार होता है। पहला पक्ष यानि बलात्कारी एक से लेकर दस-बीस तक हो सकते हैं अपनी संख्या और बलात्कृता की लाचारी के अनुपात...

स्त्री-समर्पण

जब कभी अपनी परेशानी की लेकर आड़ मैं तुमको बहुत मजबूर करता हूँ कि तुम अपने सभी कष्टों को पल में भूल जाओ और मेरी हर समस्या को बड़ा समझो! हर बार झुंझला कर सही पर मान लेती हो मेरी हर बात ऐसा भला क्या खास है मुझमें भला हर बार ऐसे क्यों पिघल जाती हो तुम? जब कभी अपने किसी...
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