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बेचैनियाँ

वक्त क़े हाथों मिलीं मायूसियाँ हैं किस क़दर रुत बिछड़ने की है और नज़दीकियाँ हैं किस क़दर एक ही पल में ख़ुशी भी है, तड़प भी, दर्द भी क्या बताएँ इस घड़ी बेचैनियाँ हैं किस क़दर ✍️ चिराग़...

अपना-अपना शऊर था

सरे-बज़्म मैं रुसवा हुआ, यही दौर का दस्तूर था मैं ये बाज़ियाँ न समझ सका, मिरी सादगी का क़ुसूर था तूने ग़म में ख़ुशियाँ तबाह कीं, मैंने हँस के दर्द भुला दिये ये तो अपना-अपना रिवाज़ था, ये तो अपना-अपना शऊर था तुझे जिस्म से ही गरज़ रही, मिरा जिस्म तेरी हदों में था मिरी रूह...

मुहब्बत हार जाती है

दिलों में पल रही चाहत सदा बेकार जाती है भला सोहनी कहाँ कच्चे घड़े पर पार जाती है वो लैला का फ़साना हो या फिर मेरी कहानी हो मुक़द्दर जीत जाता है, मुहब्बत हार जाती है ✍️ चिराग़...

काव्य के गहन सिध्दांत

साहित्य संस्कृति का दर्पण है। इसी सूक्ति को ध्यान में रखते हुए हिन्दी कविता हमेशा से ही हमारे सांस्कृतिक मूल्यों का अनुपालन करती रही है। यह और बात है कि इन सिध्दांतों की आड़ में काव्य के मूल सिध्दांत और स्वयं कविता भी बैकुण्ठवासी हो चली है। हमारी संस्कृति हमेशा से ही...
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