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शब्द शक्ति

मंच पर दो शब्द कहने की विवशता
भौंथरा करती रही है
सैंकड़ों शब्दों की पैनी धार को,
मार डाला है
बनावट से सुसज्जित ग्रीटिंगों ने
मौन अधरों पर थिरकते प्यार को।

बात दिल से झूमकर निकले
तो फिर
बस ‘भाइयो-बहनो’ का सम्बोधन
भरी महफ़िल को दीवाना बना दे,
धमनियों से बह के आए शब्द हों तो
एक ही विन्यास
बर्बर डाकुओं की क्रूरता को
आदमीयत का
(सभी को मान्य)
पैमाना बना दे।

किन्तु अब इस दौर में
भाषाओं के व्यापारियों से
मंच के भाषण लिखाए जा रहे हैं।
स्वार्थ की डाली पे बैठे
काग को कोयल बताकर
अब सियारी गीत गाए जा रहे हैं।

चापलूसी
ज्ञान का मांगा हुआ लहंगा पहनकर
मंच पर मुजरा करे तो
अब उसे मुजरा नहीं कहते।

शब्द के लच्छे बनाकर
वक़्त के महंगे लम्हे
बर्बाद करने की कला
श्रोताओं को पूर्णार्थ की ख़्वाहिश से
कोसों दूर रखती है।

प्रेम, मानवता, दया, करुणा
हमारी संस्कृति
माँ-बाप, हिन्दुस्तान
जनता, लोकसत्ता
न्याय और संघर्ष
अपनी सभ्यता
संवेदना, अध्यात्म
और ऐसे ही ढेरों शब्द
अपने अर्थ का बल क्षीण करके
अधमरे से हो गए हैं।

अब इन्हें सुनकर किसी के
रोंगटे उठते नहीं हैं।

हमने अपने मानसिक रनिवास में बैठी
प्रशंसा की सुरक्षा के लिए
जिन शब्दों का पहरा बिठाया है
उन्हें ख़ुद ही नपुंसक कर दिया है,
शांति के सब वाक्य
इतने खोखले शब्दों के मिलने से बने हैं
समझ लो
हमने अपने हाथ से
माहौल हिंसक कर दिया है।

शब्द ऐसे जी के बोले जाएँ
मदिरा बोल देने मात्र से
पूरी सभा मदहोश हो जाए।

✍️ चिराग़ जैन

संकोच

मुस्कानों ने सूर्य उगाया
संकोचों ने अस्त कर दिया
आशाओं का महल नवेला
आशंका ने ध्वस्त कर दिया

मर्यादा की डोरी थामे
स्वीकृति का इंगित तो आया
किन्तु झुकी पलकों का मतलब
आशंकित मन समझ न पाया
ख़ुद ही मैंने हिम्मत जोड़ी
ख़ुद ही उसको नष्ट कर दिया

हलकी सी मुस्काई भी थीं
तुम दाँतों में होंठ दबाकर
फिर मीठे गुस्से से तुमने
देखा था मुझको झुँझलाकर
बिन बोले ही तुमने मेरी
दुविधा को आश्वस्त कर दिया

साथसदा रहने की ज़िद में
संगत का सौभाग्य गँवाऊं
तुम मिल जाओ इस चाहत में
मिलने तक को तरस न जाऊँ
मैं तो पग-पग पर कतराया
तुमने मार्ग प्रशस्त कर दिया

✍️ चिराग़ जैन

हमारी याद ताज़ा है

अगर फ़ुर्सत मिले तो झाँक भर लेना किताबों में
हमारी याद ताज़ा है अभी सूखे गुलाबों में

हमें डर था, कहीं इज़हारे-दिल तुमको ख़फ़ा कर दे
तुम्हारी “हाँ” बिना सोचे चली आई जवाबों में

✍️ चिराग़ जैन

माचना नदी के किनारे

सतपुड़ा के घने जंगलों में माचना नदी के किनारे; जहाँ मोबाइल नेटवर्क भी नहीं पहुँच पाया; वहाँ टिटहरी दल का कलरव और प्रकृति का अछूता स्वरूप देखा। जंगल के भीतर बेशक अनेक प्रकार के भय हों, किन्तु अकारण सताए जाने की आशंका कतई नहीं होती। नदी की धार भी जंगल के निष्पाप आदिवासियों की तरह बहुत सुकून के साथ बह रही है। वृक्ष, नदी, जंतु, पंछी, हवा, बादल और कहीं-कहीं गोंड आदिवासियों के गाँव; सब कुछ एक दूसरे के साथ ऐसे सुरम्य हो जाते हैं, मानो किसी कुशल संगीतज्ञ ने सात सुरों को करीने से गूँथकर किसी आनंदराग की सरगम लिख दी हो। नीला आसमान नदी में झाँककर खिलखिला रहा है और नदी अपने रास्ते में अड़नेवाले पत्थरों की शिक़ायत करने को आसमान की ओर उछल रही है।
मैंने नदी के पानी में पैर डाला तो वह नाराज़ नहीं हुई, उल्टे उसने मेरे पैरों को पखारकर मेरे रोम-रोम को आनंदित कर दिया। नदी से निकला तो मिट्टी स्नेह से भरकर मेरे पैरों से लिपट गई। मैंने नदी के बीच एक छोटी शिला पर बैठकर अपना एक गीत रिकॉर्ड करवाया। गीत की धुन के साथ नदी, हवा, टिटहरी और धूप ने ऐसे तारतम्य बैठा लिया कि गीत ने इनको अलंकार की तरह सजाकर इतराना शुरू कर दिया। रिकॉर्डिंग के समय मैंने महसूस किया कि जंगल के विशाल वृक्ष टकटकी लगाकर बड़े ध्यान से गीत का वैभव देख रहे थे।
दोपहर और सांझ के मिलन का समय था। जंगल में शाम होने लगे तो माहौल शांति का चोगा उतारकर सन्नाटा ओढ़ लेता है। नदी के पानी में पड़नेवाले प्रतिबिम्बों का रंग गहराने लगा था। सूर्य अपना लश्कर समेटकर पश्चिम की ओर बढ़ रहा था। एक कारी बदरिया उसके बिछोह की बात सोच-सोचकर और काली हुई जा रही थी। बदरिया, मनौती करती हुई बार-बार सूरज के आगे अड़ती थी और सूरज, हर बार की तरह इस बार भी उसकी मनुहार को अनदेखा कर पश्चिम में डूबता जाता था।
लाचार बदली हारकर भावनाशून्य चेहरे से अपने प्रीतम को डूबते देखती रह गई। पूरे आसमान में सिंदूर बिखर गया। ऐसा लगा मानो माचना के पानी में बदली का उम्मीद भरा दिल बह निकला हो। बिरहन बदरिया की आँखों से दो बूंदें छलक पड़ीं। मौके का फायदा उठाकर पवन ने उसके आँसू पोंछे और उसका हाथ पकड़कर उसे अपने साथ बहा ले गया।
रात ने पश्चिम में बिखरे सिंदूर पर काली रजाई डाल दी और दूर आसमान से तारे उचक-उचक कर बदरी और सूरज को ढूंढते रह गये।
मैंने उस दिन माचना के किनारे जीवन के हज़ारों रंग, याद के एक ही फ्रेम में कैद कर लिए।
✍️ चिराग़ जैन

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