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शब्द शक्ति

मंच पर दो शब्द कहने की विवशता भौंथरा करती रही है सैंकड़ों शब्दों की पैनी धार को, मार डाला है बनावट से सुसज्जित ग्रीटिंगों ने मौन अधरों पर थिरकते प्यार को। बात दिल से झूमकर निकले तो फिर बस ‘भाइयो-बहनो’ का सम्बोधन भरी महफ़िल को दीवाना बना दे, धमनियों से बह के आए शब्द हों...

संकोच

मुस्कानों ने सूर्य उगाया संकोचों ने अस्त कर दिया आशाओं का महल नवेला आशंका ने ध्वस्त कर दिया मर्यादा की डोरी थामे स्वीकृति का इंगित तो आया किन्तु झुकी पलकों का मतलब आशंकित मन समझ न पाया ख़ुद ही मैंने हिम्मत जोड़ी ख़ुद ही उसको नष्ट कर दिया हलकी सी मुस्काई भी थीं तुम दाँतों...

हमारी याद ताज़ा है

अगर फ़ुर्सत मिले तो झाँक भर लेना किताबों में हमारी याद ताज़ा है अभी सूखे गुलाबों में हमें डर था, कहीं इज़हारे-दिल तुमको ख़फ़ा कर दे तुम्हारी “हाँ” बिना सोचे चली आई जवाबों में ✍️ चिराग़...

माचना नदी के किनारे

सतपुड़ा के घने जंगलों में माचना नदी के किनारे; जहाँ मोबाइल नेटवर्क भी नहीं पहुँच पाया; वहाँ टिटहरी दल का कलरव और प्रकृति का अछूता स्वरूप देखा। जंगल के भीतर बेशक अनेक प्रकार के भय हों, किन्तु अकारण सताए जाने की आशंका कतई नहीं होती। नदी की धार भी जंगल के निष्पाप...
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