Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
आंधी के आघात सहे हैं
ये शाखों के साथ बहे हैं
सूखे हुए पड़े जो भू पर
इनके कोमल गात रहे हैं
हर मौसम से जूझे हैं ये, जूझे हैं, फिर टूट गए हैं
ये उपवन के वो साथी हैं, जो शाखों से छूट गए हैं
तूफानों का वेग सहा है, अब झोंकों से डरते हैं ये
अपनी पूरी देह कँपाकर, उपवन में स्वर भरते हैं ये
मिट्टी में मिलकर भी अपना, कण-कण उपवन को देते हैं
कोंपल को भोजन मिल पाए, इस कोशिश में मरते हैं ये
जिनको धूर्त समझते हो तुम
ये कल तक भोले-भाले थे
जो सूखे बदरंग हुए हैं
कल तक ये भी हरियाले थे
शुष्क हवा के हाथों छलकर, अब ये ख़ुद से रूठ गए हैं
ये उपवन के वो साथी हैं, जो शाखों से छूट गए हैं
जिनको पग-पग खोट मिला हो, वे जन खरे नहीं रह पाते
जो पत्ते अंधड़ से जूझे, फिर वो हरे नहीं रह पाते
आदर्शों के सपने छोड़ो, कड़वी मगर हकीकत ये है
जिनसे सबने प्यास बुझाई, वे घट भरे नहीं रह पाते
इतनी काली रात नहीं थी
ऐसी कठिन बिसात नहीं थी
डाली ने उकसाया वरना
आंधी की औकात नहीं थी
अंधड़ आया, डाली लचकी, ठूठ मुनाफा लूट गए हैं
ये उपवन के वो साथी हैं, जो शाखों से छूट गए हैं
साथी अवसरवादी निकले, बीच युद्ध में बात बदल ली
अड़ने की आदत थी उनकी, वह आदत उस रात बदल ली
तेज़ हवा ने वार किया तो डाली झूम-झूमकर नाची
तनकर खड़े तने ने झुककर, पल में अपनी जात बदल जी
जिसकी देह पड़ी धरती पर
उसने प्रण को पूजा होगा
लेकिन इतना तो निश्चित है
जो हारा, वो जूझा होगा
जिसने केवल जान बचाई, उसके दर्पण टूट गए हैं
ये उपवन के वो साथी हैं, जो शाखों से छूट गए हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
अभी घर से निकला। एक बुज़ुर्ग महिला सड़क किनारे एक ट्री-गार्ड को पकड़कर खड़ी थी। उन्हें शायद किसी सोसाइटी में जाना था लेकिन बिना सहारे के चलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थीं और ट्री-गार्ड को पकड़े हुए आते-जाते लोगों की ओर कातर दृष्टि से निहार रही थीं।
सोसाइटी के बाहर इस समय बहुत तो नहीं, लेकिन थोड़ी चहल-पहल भी थी। पर अपनी-अपनी व्यस्तता लादे वहाँ से गुज़रनेवाला कोई शख़्स रुककर उस वृद्धा की सहायता न कर सका।
मैं फोन पर ऊबरवाले से कॉर्डिनेट कर रहा था। एक बार मैं भी अपनी कैब पकड़ने के चक्कर में उस कातर दृष्टि को अनदेखा करने की हिम्मत जुटा गया, लेकिन दो-तीन क़दम ही बढ़कर मुझे पलटना पड़ा।
मैंने उनकी ओर हाथ बढाते हुए धीरे से पूछा- ‘आंटी, कहीं छोड़ दूँ?’
उन्होंने मेरा वाक्य पूरा होने से पहले ही मेरी हथेली थाम ली और ट्री-गार्ड छोड़कर मेरी ओर बढ़ आईं। सामनेवाली सोसाइटी के गेट पर गार्ड ने उनका हाथ मेरे हाथ से अपने हाथ में लिया और मुझे कहा कि मैं अम्मा को घर छोड़ दूंगा, आप जाइये।
मैंने वृद्धा की ओर देखा तो उनके चेहरे की घबराहट एक आश्वस्ति में तब्दील हो चुकी थी। मैं आकर अपनी कैब में बैठ गया और सोचने लगा कि क्या कभी वह दुनिया वापस आएगी जब बुजुर्गों को सहायता के लिए कातर दृष्टि की नहीं, आवाज़ के रुआब का प्रयोग करना होगा।
मैंने यह घटना इसलिए नहीं लिखी कि मुझे स्वयं को महान सिद्ध करना है, बल्कि मैं अपने उन दो क़दमों के लिए स्वयं से मुख़ातिब हूँ, जो मैं अपनी व्यस्तता का बहाना करके बढ़ा चुका था।
हम सब अपनी व्यस्तताएँ ओढ़े हुए मनुष्यता की कातर दृष्टि से दो क़दम आगे बढ़ चुके हैं। यदि यहाँ से हम नहीं पलटे तो मनुष्यता किसी सड़क किनारे यूँ ही खड़ी रह जाएगी!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
जब तुम चल दी राह बदल के
दो आँसू ना आँख से छलके
जब मैंने घर वापस आकर, ख़ुद घर का दरवाज़ा खोला
घर के भीतर घर ग़ायब है, ये घर का हर कोना बोला
जब तुमको आवाज़ लगाई
और न कोई उत्तर पाया
उस पल मुझको रोना आया
यादों के सौन्धे बिस्तर पर, मैं बिल्कुल एकाकी सोया
तब समझा, मैंने क्या खोया, तब मैं फफक-फफक कर रोया
पीठ दुखी तो बाम उठाकर
मेरा हाथ लेप ना पाया
उस पल मुझको रोना आया
जब मैंने अपना बोझा ख़ुद अपने ही कंधों पर ढोया
टूटा बटन लगाने को जब ख़ुद सूईं में धागा पोया
सुबह-सुबह भागादौड़ी में
बटुआ साथ नहीं ले पाया
उस पल मुझको रोना आया
देर रात घर वापिस आकर, जब-जब मैंने खाना खाया
फ्रिज से निकली दाल गर्म करने में मुझको आलस आया
जब भोजन के बाद किसी ने
जूठा बर्तन नहीं उठाया
उस पल मुझको रोना आया
जब इस जीवन से उकताकर, मरने की इच्छा हो आई
कहीं किसी ने आँखें पढ़कर मेरी थकन नहीं सहलाई
‘मरें तुम्हारे दुश्मन’ कहकर
मुझको ढांढस नहीं बंधाया
उस पल मुझको रोना आया
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished
जिसकी छाया में आँगन ने अपना हर त्यौहार मनाया
जब उस पर पतझर आया तो घर उससे नाराज़ रहा है
जिसके फूलों की ख़ुश्बू ने घर का हर कोना महकाया
उसके सूखे पत्तों पर झल्लाना एक रिवाज़ रहा है
जिस नदिया ने जीवन सींचा, वो बरसातों में अखरेगी
बारिश का मौसम बीता तो, छतरी हमको बोझ लगेगी
जिन अपनों के बिन जी पाना इक पल भी दूभर लगता है
जब वे अपने मर जाते हैं, तब उनसे ही डर लगता है
ऋतुओं के संग आँख बदलना, सबका सहज मिजाज़ रहा है
जब उस पर पतझर आया तो घर उससे नाराज़ रहा है
प्यास न हो तो पानी भूले, भूख न हो तो रोटी भूले
मन से बचपन बीत गया तो, व्यर्थ लगे सावन के झूले
बचपन में कुछ खेल-खिलौने, यौवन में दिल का नज़राना
फिर घर भर की ज़िम्मेदारी, फिर बिन कष्ट सहे मर जाना
जितनी देर ज़रूरत जिसकी, उतनी देर लिहाज रहा है
जब उस पर पतझर आया तो, घर उससे नाराज़ रहा है
मन के छोटे से झोले में सब कुछ ढोना नामुम्किन है
यादों की डोरी में सबके नाम पिरोना नामुम्किन है
जिससे जितनी साँसें महकी, उससे उतनी प्रीत रही है
रात अंधेरा, भोर उजाला, ये ही जग की रीत रही है
जैसा है अंजाम किसी का कब वैसा आगाज़ रहा है
जब उस पर पतझर आया तो घर उससे नाराज़ रहा है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Poetry, Unpublished
फूल, ख़ुश्बू, रंग तो मौसम चुरा ले जाएगा
कौन लेकिन बाग़बां का हौंसला ले जाएगा
हो गए बर्बाद तो फिर जश्न होना चाहिए
देखते हैं वक़्त हमसे और क्या ले जाएगा
जीतने की चाह छोड़ी, अब निभाकर दुश्मनी
हारने का डर मेरा दुश्मन लिवा ले जाएगा
दस्तख़त बेटे की ज़िद पे कर के बूढ़े ने कहा-
“क्या लुटा सकता था मैं, तू क्या लिखा ले जाएगा“
इल्म वाले बस तकल्लुफ़ में फँसे रह जाएंगे
ज़िन्दगी की मौज कोई सिरफिरा ले जाएगा
✍️ चिराग़ जैन