चल पड़ी ससुराल बिटिया सज-सँवर के मन बिलखकर रह गया इस पल अचानक देहरी की आँख नम होने लगी है मौन रहने लग गयी साँकल अचानक याद आता है अभी कल ही हमारी गोद में इक पाँखुरी सी आई थी तुम बस अभी कल ही कोई साड़ी पहनकर देखकर दर्पण बहुत इतराई थी तुम लांघकर बचपन, हुई थी तुम सयानी याद...
गाँव का पुराना मकान कच्चा-पक्का फ़र्श दीमक लगी जर्जर चौखट और देहरी के दोनों ओर चिकनाई के दो गोल निशान!मुद्दत हुई हर साल दीपावली पर दीपक जलाते थे दो हाथ। फिर अपने पल्लू की ओट में छिपाकर हवा के झोंके से बचाते हुए दीवार की आड़ में हौले से देहरी पर दो दीपक धर आते थे दो हाथ।...
ज़िन्दगी जब भी आज़माती है इक नया रास्ता दिखाती है न तो पिंजरे में चहचहाती है न ही अब पंख फड़फड़ाती है जब कभी माँ की याद आती है ये हवा लोरियाँ सुनाती है वो मरासिम को यूँ निभाती है मिरा हर काम भूल जाती है मेरे ख़्वाबों में यूँ वो आती है जैसे पाजेब छनछनाती है लफ़्ज़ मिल पाए तो...