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बिटिया की विदाई

चल पड़ी ससुराल बिटिया सज-सँवर के
मन बिलखकर रह गया इस पल अचानक
देहरी की आँख नम होने लगी है
मौन रहने लग गयी साँकल अचानक

याद आता है अभी कल ही हमारी
गोद में इक पाँखुरी सी आई थी तुम
बस अभी कल ही कोई साड़ी पहनकर
देखकर दर्पण बहुत इतराई थी तुम
लांघकर बचपन, हुई थी तुम सयानी
याद आने लग गया वो पल अचानक

जो चहकती थी सुबह से शाम घर में
आज वो चिड़िया पराई हो रही है
ख्वाहिशें घूंघट के नीचे छिप गयी हैं
नाज-नखरों की विदाई हो रही है
साध ली सिंदूर ने कलकल समूची
और गुमसुम हो गयी पायल अचानक

लाड़ इक विश्वास के आगे झुका है
भाग्य के हाथों तुम्हारा हाथ है अब
उम्र भर का पुण्य जो कुछ है हमारा
हर क़दम पर वह तुम्हारे साथ है अब
दिल बिना धड़कन, ठिठककर थम गया है
आँख से चोरी हुआ काजल अचानक

सात फेरों का सफ़र पूरा हुआ है
है पराया आज अपनापन हमारा
एक नग अधिकार पीछे रह गया है
घर तुम्हारा, बन गया पीहर तुम्हारा
याद की गठरी टटोले जा रहे हम
हो गई तुम आँख से ओझल अचानक

✍️ चिराग़ जैन

हौसला सलामत है

जब तलक़ ज़मीं से ये राब्ता सलामत है
फिर बहार लाने का हौसला सलामत है

घर उजड़ गया उसका, उम्र कट गई सारी
जिसके हक़ में मुंसिफ़ का फ़ैसला सलामत है

इल्म भी नहीं होगा उड़ चुके परिंदों को
एक ठूंठ पर उनका घोंसला सलामत है

काट ली सज़ा जिसकी, हो चुका बरी जिससे
आज भी मेरे दिल में वो ख़ता सलामत है

मुद्दतों से चूल्हे की रोटियाँ नहीं खाईं
पर अभी ज़ुबां पर वो ज़ायक़ा सलामत है

✍️ चिराग़ जैन

उजियारे के अवशेष

गाँव का
पुराना मकान
कच्चा-पक्का फ़र्श
दीमक लगी जर्जर चौखट
और
देहरी के दोनों ओर
चिकनाई के
दो गोल निशान!मुद्दत हुई
हर साल
दीपावली पर
दीपक जलाते थे दो हाथ।

फिर
अपने पल्लू की ओट में छिपाकर
हवा के झोंके से बचाते हुए
दीवार की आड़ में
हौले से
देहरी पर
दो दीपक
धर आते थे दो हाथ।

न जाने क्यों
आज फिर से
जीवंत हो उठी है माँ!

✍️ चिराग़ जैन
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