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मैं जी उठा

सूर्य जब-जब ले के अंगड़ाई उठा
पूजने सब चल पड़े थाली उठा

मुस्कुराकर आपने देखा मुझे
और कुछ ऐसा हुआ मैं जी उठा

क्या पता किस चांद के दीदार को
कब लहर की शक्ल में पानी उठा

सांझ ढलते ही हुआ सूरज निढाल
चांद पीकर रोशनी उसकी उठा

सोच अपनी सोच को कुछ इस तरह
लफ़्ज़ से हटकर नए मानी उठा

या तो तू सबकी तरह से बात कर
या फिर अपनी बात से आंधी उठा

✍️ चिराग़ जैन

सरस्वती वंदना

हम सरिता सम बन जाएँ
कविता-सरगम-ताल-राग के सागर में खो जाएँ

सात सुरों के रंगमहल में साधक बनकर घूमंे
नयनों से मलहार बहे माँ, दादर पर मन झूमे
भोर भैरवी संग बिताएँ, सांझहु दीपक गाएँ
हम सरिता सम बन जाएँ

हे वीणा की धरिणी, हमको वीणामयी बना दो
ज्ञानरूपिणी मेरे मन में ज्ञान की ज्योत जगा दो
कण्ठासन पर आन विराजो इतना ही वर चाहें
हम सरिता सम बन जाएँ

✍️ चिराग़ जैन

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