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बेग़ुनाही का दावा

कोई महज ईमान का जज्बा लिए जिया कोई फ़रेब-ओ-झूठ का मलबा लिए जिया टूटन, घुटन, ग़ुबार, अदावत, सफ़ाइयाँ इक शख्स सच के नाम पे क्या-क्या लिए जिया जब तक मुझे ग़ुनाह का मौक़ा न था नसीब तब तक मैं बेग़ुनाही का दावा लिए जिया था बेलिबास अपनी नज़र में हर एक शख्स दुनिया के दिखावे को लबादा...
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