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घूमर की धुन पर बीहु

दो दिन प्रकृति की गोद में रहकर अब दिल्ली लौट रहा हूँ। ग्रीष्म ऋतु के जिस प्रकोप में दिल्ली से उड़ान भरी थी, उसके परिप्रेक्ष्य में डिब्रूगढ़ उतरते हुए स्वर्ग की अनुभूति हो रही थी।
पायलट ने लैंडिंग की घोषणा की और हमारा विमान घने बादलों के साम्राज्य में प्रविष्ट हो गया। खिड़की के बाहर बारिश की बूंदों ने अठखेलियाँ शुरू कर दी थी। वैभवशाली मेघों को पार कर ज्यों ही हमें धरती दिखाई दी तो ऐसा लगा ज्यों अचानक किसी ने आँखों में हरा रंग भर दिया हो। रिमझिम बरसात में पुलकता हुआ डिब्रूगढ़ शहर किसी सृजनशील चित्रकार की पेंटिंग जैसा जान पड़ता था।
जहाज के पहियों ने टच डाउन पॉइन्ट को स्पर्श किया तो गति से उत्पन्न उष्मा ने भीगी हुई धरती में समाकर पानी की फुहारों का एक धुआँ सा उत्पन्न कर दिया। ऐसा लगा ज्यों आसमान का कोई बादल जहाज के किसी पेंच में अटक गया हो, जो अचानक धरती पर गिरने के झटके से छुटकारा पा रहा हो।
हम भी भौतिक वायुयान से उतर कर मन को उड़न खाटोला बनाने के लिए हवाई अड्डे से बाहर आ गए। बाहर सुमित खेतान जी हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। एयरपोर्ट परिसर से बाहर निकलते ही चाय के बागान सड़क के दोनों ओर बिछने लगे। नहा-धोकर भीगी खड़ी चाय की हरियाली इतनी ख़ूबसूरत हो गयी थी कि बादल रह-रहकर बरखा का वेश बनाकर चाय की पत्तियों को चूमने का बहाना ढूंढता दिखा। प्रेम की इन पसीजी हुई शरारतों में सड़क शर्म से पानी-पानी हुई जाती थी। लहराती हुई सड़क पर हमारी गाड़ी किसी रोमांटिक स्पर्श की तरह दौड़ी चली जाती थी।
असमिया संस्कृति में साफ़-सफाई और सौंदर्यबोध को खासा स्थान प्राप्त है इसीलिए अनवरत हरे रंग के बीच जहाँ कहीं कोई घर दिखाई देता तो उसका रंग विधान बचपन के खिलौने जैसा आकर्षित करता था। रास्ते की इस ख़ूबसूरती को आँखों में भरते हुए हम तिनसुकिया पहुँच गए।
आयोजन मंडल के सदस्यों का व्यावहार कंचन में सुगंध का प्रतिमान बन रहा था। उत्तर भारत के शेष क्षेत्र की अपेक्षा इस क्षेत्र में सूर्य काफी पहले उग जाता है इसलिए सूरज की ड्यूटी के घण्टे भी शाम 4-5 बजे तक समाप्त होने लगते हैं। इस स्थिति के कारण कवि-सम्मेलन का समय भी जल्दी का ही था। शहर के एक शानदार हॉल में कवि-सम्मेलन हुआ। हम पाँच कवियों के लिए ढाई घण्टे का कार्यक्रम तय था लेकिन साढ़े तीन घण्टे बाद भी सायास कवि-सम्मेलन समाप्त करना पड़ा। श्रोताओं ने सेल्फियाँ खिंचवाते समय यह सुखद शिकायत की कि मन नहीं भरा!
सफल कार्यक्रम से ऊर्जा द्विगुणित करके भोजन आदि के बाद हम सो गए और अगली सुबह जब आँख खुली तो देखा कि कोई मेरे कमरे की खिड़की पर बूंदों से म्यूरल पैटर्न की चित्रकारी कर गया था। बादलों ने सूर्य की किरणों का रास्ता रोक रखा था लेकिन उजाला, शीशे पर बिखरी बूंदों को यह संदेश सुना रहा था कि दिन निकल आया है।
बिस्तर पर अलसाया हुआ मैं प्रकृति के इस संचार को भोग ही रहा था कि फोन की घंटी मुझे भौतिक जगत् में लौटा लाई।
मनोज मोदी जी का फोन था कि होटल से अशोक बाज़ारी
जी के घर नाश्ता करके, वहीं से घूमने निकलना है। मैं जल्दी से तैयार होकर लॉबी में आया तो दिनेश बावरा पहले से गाड़ी में बैठे थे। वे पर्यटन पर नहीं जा रहे थे ब्लकि नाश्ता करके सीधे एयरपोर्ट की ओर निकलने वाले थे। भुवन मोहिनी जी की फ्लाइट दोपहर में थी इसलिए वे भी थोड़ी देर घूम फिर कर प्रस्थान करने वाली थीं।
मैं पिछले दो महीने में तीसरी बार इस क्षेत्र में आया था और यहां के मौसम और सौंदर्य से आकृष्ट था इसलिए सोच-समझकर इस बार पर्यटन का प्लान बनाकर आया था।
अशोक जी के घर बेहतरीन मारवाड़ी नाश्ता करने के बाद मोदी जी मुझे, भुवन को और बाबू जी को अपने घर ले आए। मोदी जी का घर एक अच्छा ख़ासा बंगला है। बाहर गार्डन में सुपारी और आम जैसे वृक्षों के साथ एक मुकम्मल किचन गार्डन था। बरसात लगातार जारी थी सो मौसम और मौके का सम्मान करते हुए मोदी जी ने हमें अपने गार्डन के भुट्टे खिलाए। फिर हमने उनके ख़ूबसूरत बगीचे में खूब फोटोग्राफ़ी की।
यहाँ से हम एक चाय बागान की ओर चले। ढाई फुट के चाय के पौधों की सलीके से लगी हुई क्यारियों के बीच हमने ख़ूब मस्ती की। मैंने चाय की शायरी का प्रयोग करते हुए चाय के महत्व पर एक वीडियो बनाया। अनियोजित वीडियो में सद्य बोला गया वॉयस ओवर चाय पर एक बेहतरीन ललित निबंध जैसा बन गया।
घड़ी देखी तो भुवन मोहिनी जी को फ्लाइट का टाइम ध्यान आया। बेमन से उन्हें पर्यटन का सुख छोड़कर प्रस्थान करना पड़ा। उनके रवाना होने पर हम मनोज मोदी जी के साथ अरुणाचल प्रदेश के लिए निकल गए। तिनसुकिया से बाहर आते-आते हम एक ऐसी सड़क पकड़ चुके थे जिसके एक और रेल लाइन थी और दूसरी ओर जंगल। जहाँ कहीं बस्ती दिखाई देती वहां जंगल कुछ पीछे चला जाता था लेकिन रेल लाइन ने सड़क का साथ नहीं छोड़ा।
पचास किलोमीटर के करीब इस अलौकिक सौंदर्य को निहारते हुए हम अरुणाचल प्रदेश की सीमा पर पहुंच गए। अरुणाचल में देश के अन्य भागों की तरह फ्री एंट्री नहीं है। इस राज्य में प्रवेश करने के लिए अनुमति की कुछ औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ती हैं। मोदी जी गाड़ी से उतरकर यह प्रक्रिया पूरी करके आए और हम सूर्योदय के प्रदेश में प्रविष्ट हो गए। नाप-तोल कर बनाई गई सड़क के दोनों ओर शालीनता से खड़े पेड़ जब ऊपर ही ऊपर एक दूसरे से गले मिलते थे तो सड़क के ऊपर किसी गुफा जैसा दृश्य बन जाता था।
इस वर्णनातीत दृश्य से गुज़रते हुए हम गोल्डन पैगोडा पहुँचे। मोदी जी पार्किंग में गाड़ी लगा रहे थे और मैं स्वर्णद्वार के सम्मुख खड़े बौद्ध भिक्षुओं को निहार रहा था। छोटे-छोटे बालकों से लेकर कैशोर्य और यौवन की देहरी को छू रहे ये लामा गहरे लाल और गहरे पीले रंग के चोगे में दिव्य लग रहे थे। संन्यास के तेज और तथागत के पथ की शांति से इनका सौंदर्य दिव्य हो गया था। बुद्ध पूर्णिमा के दिन इस स्थान पर आने का संयोग आनंद में वृद्धि कर रहा था।
हमने टिकट लेकर तीर्थ परिसर में प्रवेश किया। बहुत करीने से संजोए गए बड़े से बगीचे के बीच चारों ओर से एक जैसा दिखने वाला एक विशाल मंदिर था जिसमें बुद्ध का भव्य स्वर्णबिम्ब विद्यमान था। मंदिर के चारों प्रवेश द्वार चीनी शैली के सिंह बिम्ब से अलंकृत थे। बाहर एक बड़े से तालाब में बुद्ध विराजित थे। बारिश की बूँदें जब तालाब के पानी में गिरती थीं तो एक गोल दायरा बनता जो बुद्ध की मूर्ति तक जाकर विलीन हो जाता था। यह दृश्य ‘ध्यान’ विधि के साकार कर रहा था। विचारों की तरह अनवरत उपजते दायरे निमीलित नयन युक्त ध्यानस्थ योगी तक पहुँच कर विलीन हो रहे थे। मैं अपलक इस दृश्य से बंधने लगा। क्षण भर के लिए बारिश की बूंदों की अनुभूति विस्मृत हो गई थी। क्षण भर के लिए मन विचारशून्य होकर तथागत के बिम्ब का स्पर्श कर आया था। नयन खुले थे किंतु दृश्य गौण हो रहे थे। कान उपस्थित थे किंतु ध्वनि शून्य हो गई थी। देह जिवित थी किंतु स्पर्श विलीन हो गया था… क्षण भर में असीमित ऊर्जा बटोरकर मेरी तन्द्रा टूट गई।
अनुभव की जिस वीथि में मैं क्षण भर विचरने लगा था, वह लिखने का समय सम्भवतः इस जीवन में मैं न जुटा सकूँगा। बस इतना कह सकता हूँ कि ध्यान के इस स्वर्णिम सम्मोहन ने क्षण भर में मुझसे मेरा मन ठग लिया था।
स्वयं को संयत करने के उद्देश्य से मैंने वहाँ से एक फेसबुक लाइव किया और इस परिसर को डिजिटल तकनीक में सहेजकर वापिस गाड़ी में आकर बैठ गया। भौगोलिक स्थिति के कारण दोपहर ढल चुकी थी और रात हुई नहीं थी। इतनी लंबी शाम का यह मेरा पहला अनुभव था। पूरा रास्ता शाम में ही बीता। रास्ते में मोदी जी ने अपनी चाय फैक्ट्री दिखाई। चाय बनने की प्रक्रिया जानकर बहुत अच्छा लगा। हरी पत्तियों के काले दानों में बदल जाने की पूरी प्रक्रिया देखकर विकास की आवश्यकता तथा साधना का अर्थ समझ आया।
तिनसुकिया पहुँचकर हमने सुमित खेतान जी, अशोक बाज़ारी जी और मनोज मोदी जी के साथ स्वादिष्ट भोजन किया, अपनी-अपनी अटैची की क्षमता के अनुसार चायपत्ती के पैकेट बटोरे और सो गए।
सुबह-सुबह हवाई अड्डे के लिए निकल लिए हैं। असम की संस्कृति, अरुणाचल का सौंदर्य और राजस्थानी लोगों के मीठे अपनत्व की संगत… ऐसा लग रहा है जैसे मेरा मन कालबेलिया की धुन पर बीहु नृत्य करके लौटा हो।

✍️ चिराग़ जैन

डिब्रूगढ़ की पहली यात्रा

दिल्ली से उड़कर डिब्रूगढ़ एयरपोर्ट पर लैंड किया तो जहाज की खिड़कियों पर पानी की बून्दों ने चित्रकारी कर दी थी। बाहर झाँकने पर एहसास हुआ कि यहाँ दिल्ली जैसी गर्मी का नामो-निशान नहीं है, बल्कि बादलों की मेहरबानी से मौसम गुलाबी नमी से महक उठा है।
हवाई अड्डे से बाहर निकलने तक हमें अगले ही दिन की वापसी के निर्णय पर पछतावा हो रहा था। द्वार पर आयोजकगण स्वागत के लिए तैयार खड़े थे। हवाई अड्डे से शहर की ओर बढ़े तो चाय के बागानों की ख़ूबसूरती और ख़ुशगवार मौसम की हरितिमा आँखों के रास्ते मन में आक्सीजन भर रही थी।
डिब्रूगढ़ शहर की मुख्य सड़क के बीचोबीच ट्रेनलाइन बिछी हुई है। लाइन के एक ओर ट्रैफिक चलता है और दूसरी ओर छोटे-छोटे लेकिन ख़ूबसूरत घर हैं। आम और रुद्राक्ष के पेड़ों पर आया हुआ बौर माहौल के हरेपन को और आकर्षक बना रहा है। हवा की आर्द्रता के कारण प्रत्येक वृक्ष के तने और शाखाओं पर छोटी लताओं जैसे कुछ शैवाल उग आए हैं, जिनसे हर पेड़ की लकड़ी ने हरी चूनरी से अपना तन ढँक लिया है। इस श्यामला प्रकृति को गाड़ी की खिड़की से अपनी आँखों में भरता हुआ मन अघाता ही न था कि गाड़ी अचानक मुख्य सड़क छोड़कर एक गली में मुड़ गयी और पार्किंग में खड़ी हो गयी।
आयोजक हमें गाड़ी से उतारकर एक बांध की सीढ़ियां चढ़ने लगा। ज्यों ही हमने अंतिम सीढ़ी पार की तो हम एक ऐसे स्थान पर पहुँच गये जहाँ से हमारे और क्षितिज के मध्य जल ही जल दिखाई देता था। यह ब्रह्मपुत्र का वैभव था। अथाह जलराशि का मार्ग बना यह महानद अब से पूर्व केवल चित्रों में ही देखा था। एकाध बार गुवाहाटी में इसके दर्शन हुए लेकिन हर बार शाम के धुंधलके में ही इसके दर्शन हुए इसलिए इसकी भव्यता का सही अनुमान न हो सका था। आज अनेक देशों से गुज़रने वाले ब्रह्मपुत्र के साक्षात्कार का सौभाग्य मिल रहा था। नदी के विशाल पाट को लेकर जितनी कल्पनाएँ की जा सकती थीं, सब छोटी पड़ रही थीं।
कुछ देर इस दृश्य का भोग करके हम वापस गंतव्य की ओर बढ़ चले। साथ चल रही ट्रेन लाइन का डेड एन्ड आ गया। आयोजक ने बताया कि इसके आगे रेलमार्ग समाप्त हो जाता है। ठीक इस डेड एन्ड के सामने डिब्रूगढ़ जिमखाना क्लब था।
चेकइन करने का बाद भोजन आदि करके हमने एक घण्टा विश्राम किया। बारिश की हल्की फुहारें अनवरत जारी थीं। शाम को तिनसुखिया से कुछ मित्र मिलने आ गये और फिर कवि-सम्मेलन के लिए बुलावा आया गया। सवा आठ बजे से सवा दस बजे तक लगातार ठहाकों और तालियों का लास्य हुआ। तकनीक का सुफल यह था कि जिस शहर में मैं पहली बार गया था, वहाँ भी श्रोतादीर्घा से कविताओं की फरमाइश आ रही थी। आयोजकों ने हमें बताया कि इस क्लब में इतनी बड़ी संख्या में श्रोता पहली बार आए हैं और इतनी देर तक पहली बार कोई कार्यक्रम चला है। हमने भी हँसते हुए उन्हें बताया कि हमने भी बहुत दिन बाद इतना लम्बा-लम्बा काव्यपाठ किया है।
एक ओर अरुण जी सेल्फियों से घिरे हुए थे, दूसरी ओर मेरे साथ भी फ़ोटो खिंचवाने वाले पर्याप्त संख्या में जुटे हुए थे। थोड़ी-सी देर का यह सेलिब्रिटिज़्म जीने के बाद हम अपने कमरे में आकर सोने की तैयारी करने लगे।
सामने खिड़की के शेड से टपकती पानी की बून्दों और शेड पर पड़ती बारिश के संगीत से माहौल रूमानी हो चला था। बरसाती रात के गहरे अंधेरे में दूर किसी हैलोजन पिलर पर झिलमिलाती बरखा से रूसी उपन्यासों की फीलिंग आ रही थी।
इस बरसाती ख़ुशबू को आँखों से भोगते हुए न जाने कब आँख लग गयी। सुबह अलार्म ने बताया कि हवाई अड्डे का जहाज हमारे मूड की परवाह किये बिना उड़ सकता है। अरुण जी ने नाश्ता ऑर्डर किया और हम दोनों जल्दी-जल्दी तैयार होकर हवाईअड्डे पहुँचे।
अभी अड़तीस हज़ार फीट की ऊँचाई पर मेरे दाहिनी ओर हिमालय का वैराट्य बाँहें फैलाए खड़ा है। सूर्य की किरणों ने हिमशिखरों को चूमकर गुलाबी कर दिया है। बादलों की अनेक परतों को पार कर हिमगिरि के उत्तुंग शिखर ऊपर निकल आए हैं। ऐसा जान पड़ता है, मानो कोई लजीला किशोर उचक-उचक कर अपनी प्रियतमा रश्मियों को देखने की कोशिश कर रहा है। प्रकृति की इस असीम अनुभूति में मैं इंडिगो के जहाज की खिड़की वाली सीट पर बैठा मनुष्य के बौने सामर्थ्य को अनुभूत करते हुए विज्ञान की कोशिशों का धन्यवाद कर रहा हूँ।

✍️ चिराग़ जैन

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