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न्याय के मुँह पर जूता

भारतीय लोकतन्त्र लगभग उस मुकाम पर आ खड़ा हुआ है, जहाँ से ‘लोक’ और ‘तन्त्र’ के मध्य की खाई इतनी चौड़ी हो जाती है कि किसी के लिए भी दोनों ओर पैर रखकर टिके रहना असंभव हो जाए। एक ओर तन्त्र है, जो संविधान की मूल भावना से भटककर अपने-अपने वाद तथा अपने-अपने गुटों के साथ इस हद...

सभ्यता की सीमा

अराजकता किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती। स्थिति चाहे कोई भी हो, यदि सभ्यता की सीमा रेखा लांघकर उसका उपाय खोजा जाएगा तो यह पूरी सामाजिक व्यवस्था पर वज्रपात होगा। कोई राजनीतिज्ञ कितना भी भ्रष्ट क्यों न हो; यदि उस पर जूता या स्याही फेंकी जाए, यदि उसे थप्पड़ मारा जाए,...

असल मुद्दा क्या है

एक अभिनेत्री ने कुछ ऐसे बयान दिये हैं, जो तथ्यात्मक रूप से मिथ्या हो सकते हैं, लेकिन इन बयानों का विरोध करनेवालों की भाषा तथा तर्कशक्ति ने अभिनेत्री के मिथ्या भाषण से ध्यान भंग करने में महती भूमिका अदा की है। ‘कम कपड़े पहनकर फिल्मी पर्दे पर आनेवाली नचनिया हमें बताएगी...

अराजकता को साधुवाद

‘नो एफआईआर, नो इन्वेस्टिगेशन, नो चार्जशीट, फैसला ऑन द स्पॉट…’ -ऐसे संवाद फिल्मों में तो बहुत अच्छे लगते हैं, लेकिन असल ज़िन्दगी में इस डायलॉग पर काम करनेवाले कार्यपालक निरंकुश हो जाते हैं। यह सत्य है कि भारतीय न्याय प्रक्रिया की धीमी गति और लचर व्यवस्था का ही...

दल बदलू का कार्यकर्ता

कल तक जो थे दोस्त, कहा अब उनको दुश्मन मान हम पुतले हैं या इंसान कल तक जिनको गाली दी थी जुमला छाप जुगाली की थी अब कहते हो गाली छोड़ करें उनका गुणगान हम पुतले हैं या इंसान कल तक जिनके कपड़े फाड़े हमने जिनके टैंट उखाड़े अब तुम ख़ुद ही बैठ गये हो उनका तम्बू तान हम पुतले हैं या...
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