Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
एक पत्रकार ने अध्यापकों की कौड़ी गिन दी और पूरा समाज उस पत्रकार के विरोध में खड़ा हो गया। एक प्रशासनिक अधिकारी ने ‘कॉकरोच’ शब्द का प्रयोग किया और युवाशक्ति ने रातोंरात एक डिजिटल क्रांति खड़ी कर दी।
शिक्षा के दोनों छोर एक साथ छेड़े गए और एक पूरे समाज के सिले हुए होंठ खुल गए। इस क्रांति का भविष्य क्या होगा यह तो कहना कठिन है, किन्तु इन दोनों प्रकरणों ने यह अवश्य सिद्ध कर दिया कि संभावनाएं और आशंकाएं क्षीण हो सकती हैं किन्तु समाप्त कभी नहीं होती।
सोशल मीडिया पर विचरण करते हुए पाता हूं कि देश में किसी क्रांति जैसा माहौल है। रवीश कुमार से लेकर खान सर तक कोई भी ऐसी बात नहीं कह रहा है, जो समाज जानता न हो, लेकिन फिर भी महत्वपूर्ण यह है कि बातें कही जाने लगी हैं। कब तक कह पाएंगे और कहां तक सुनी जाएंगी… यह कहना जल्दबाज़ी होगी।
इस दौर में अट्टालिकाओं के अहंकार से त्रस्त समाज से मैं यह अपेक्षा अवश्य करूंगा कि इस बार अपने विवेक से समझौता मत करना। सिस्टम का विरोध ही सही, लेकिन किसी के भी पीछे चलने से पहले यह समझ लेना कि कहीं हमारा नेतृत्व करनेवाला भी अपने किसी हितसाधन के लिए हमें भीड़ की तरह ‘इस्तेमाल’ तो नहीं कर रहा है।
कहीं श्वेत परिधानी बाबा का रिमोट किसी चालाक प्रशासनिक के हाथ में तो नहीं है। किसी के सुर में सुर मिलाने से पहले यह अच्छी तरह पड़ताल कर लेना कि कहीं इस सुरीले क्रांतिकारी के सुरों का कोई सप्तक किसी दूसरे आततायी के चरणों में जाकर विलीन तो नहीं हो रहा है।
‘जन’ एक महत्वपूर्ण शब्द है। दुनियाभर में अब राजनीति को इस ‘जन’ की आवश्यकता नहीं रह गई है। इस जन को एकत्रित करके शातिर लोगों ने जैसे-जैसे धोखे किए हैं, उनसे सबक लेकर इस बार कदम मिलाकर भी चलना आवश्यक है और कदम संभालकर भी…।
मुझे याद है कांग्रेस सरकार के समय राहुल गांधी ने एक बयान दिया था कि मध्यम वर्ग कैटल क्लास की तरह सफ़र करता है। इस बयान पर खूब हंगामा हुआ था। राहुल गांधी के विरुद्ध लोगों का गुस्सा फूटा था। उस समय कांग्रेस के सत्ताजनित अहंकार के परिणामस्वरूप प्रत्येक ख़बर लोगों की भावनाओं को आहत करती थी।
अब भी लगभग वही माहौल है। बस तब जनता बोलती थी, आज बोलने पर अनकही-सी मनाही है। पानी को अगर सही तरीके से निकलने का रास्ता न मिले तो वह पाइप फोड़कर निकलता है। हालांकि मैं फिर भी इस बात पर अडिग हूं कि किसी भी तरह की अराजकता अंततः हानिकारक ही सिद्ध होती है। यह बात सिस्टम को भी समझनी होगी और जनता को भी। सिस्टम को इस सोच से बाहर निकलना होगा कि अपेक्षा, बात और शिकायत दरअस्ल सिस्टम का विरोध ही हैं। ठीक इसी तरह जनता को भी यह समझना होगा कि प्रशासन चलाते समय कहा गया हर शब्द अभिधा नहीं होता।
एक और महत्वपूर्ण बात। यदि केवल अध्यापकों को राष्ट्रप्रेमी, ईश्वर के अवतार और ऐसे ही हाइपोथेटिकल विशेषणों से नवाज़ने का सिलसिला ज़ोर पकड़ गया तो मूल विषय धूमिल हो जाएगा। जैसे किसान आंदोलन के समय हुआ। जैसे डॉक्टरों की हड़ताल के समय हुआ। जैसे खिलाड़ियों के समय हुआ।
हमें यह स्वीकार करना होगा कि हर मनुष्य में कुछ खामी हो सकती है। जिस देश में डॉ. सर्वपल्लि राधाकृष्णन और डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसे अध्यापक हुए हैं उस देश में कोई अध्यापक भ्रष्ट हो ही नहीं सकता, इस सामान्यीकृत धारणा से अपने समाज को बचाना आवश्यक है। और जिस देश में एक पत्रकार दारू पीकर लड़खड़ाती हुई एंकरिंग करता हुआ रिकॉर्ड हुआ है, उस देश में सभी पत्रकार दारुड़िये हैं, यह धारणा भी अपरिपक्व है। मेरा तो मानना है कि जो पत्रकार दारू पीकर न्यूज़ पढ़ता हुआ मिला है, वही पत्रकार कभी सत्ता की आंखों में आंखें डालकर प्रश्न करता हुआ मिल जाए तो उसका उस विशेष साहस के लिए सम्मान किया जाना चाहिए। और फिर वही पत्रकार किसी दिन पीत पत्रकारिता करता पाया जाए तो उसी पत्रकार की आलोचना होनी चाहिए।
पत्रकारों को यह बात समझनी पड़ेगी कि जनता का जो गुस्सा इस समय पत्रकारिता के विरुद्ध आंधी की तरह फूट रहा है, वह किसी एक पत्रकार की एक स्टेटमंेट का परिणाम नहीं है। पत्रकारों को यह याद करना होगा कि इस देश ने सुरेन्द्र प्रताप सिंह और प्रभाष जोशी सरीखे पत्रकारों को देखा है। इस देश की पत्रकारिता ने साहस और नैतिकता के इतने बड़े प्रतिमान खड़े किए हैं कि व्यावसायिकता और सत्ता के दबाव से उत्पन्न आपकी कोई भी विवशता यह देश नहीं समझ सकेगा। इसलिए अपनी रिपोर्टिंग में दबाव का अनुपात आटे में नमक जितना ही रखें। इससे अधिक दबाव दिखा तो खानेवाला आपकी रसोई के कौर को थूक देगा।
✍️ चिराग़ जैन
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भारतीय लोकतन्त्र लगभग उस मुकाम पर आ खड़ा हुआ है, जहाँ से ‘लोक’ और ‘तन्त्र’ के मध्य की खाई इतनी चौड़ी हो जाती है कि किसी के लिए भी दोनों ओर पैर रखकर टिके रहना असंभव हो जाए। एक ओर तन्त्र है, जो संविधान की मूल भावना से भटककर अपने-अपने वाद तथा अपने-अपने गुटों के साथ इस हद तक छितरा गया है कि अब इस ताने-बाने का हर ताना अपने बाने पर प्रतिशोध तानकर खड़ा दिखाई देता है।
दूसरी ओर है लोक, जो तन्त्र से नाराज़ रहते हुए भी सदैव तन्त्र की ओर ही आशा भरी निगाहों से देखता है। यह लोक वर्तमान में अपने-अपने ‘सोशल मीडिया समूहों’ द्वारा प्रसारित विचारधाराओं तथा नैतिकताओं का अनुसरण करते-करते इतना अंधा हो गया है कि अराजकता की सीमा-रेखा इसे दिखाई देनी बंद हो गयी है।
एक शिष्ट तथा समृद्ध लोकतन्त्र में तन्त्र, लोक की भावनाओं का सम्मान करते हुए संविधान लागू करवाता है और लोक, तन्त्र की सीमाओं को समझते हुए संविधान लागू करने में सहयोग करता है। किन्तु वर्तमान स्थितियों में कम से कम अपने देश में लोकतन्त्र का यह सौहार्द लगभग धूमिल हो चुका है। न जनता के मन में तन्त्र के लिए कोई सम्मान शेष रह गया है, न ही तन्त्र के मन में जनता के लिए कोई सौहार्द।
विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका नामक तीन शक्तियाँ लोकतन्त्र के ब्रह्मा-विष्णु-महेश के रूप में लोकतन्त्र की समूची सृष्टि को सुचारू रूप से संचालित करती हैं। सृष्टि के संचालनार्थ कभी सुरों को तो कभी असुरों को वरदान दिये जाते रहे हैं। यदि किसी परिस्थितिवश कोई एक शक्ति किसी अयोग्य पात्र को अनुचित वरदान दे भी आई तो शेष दोनों शक्तियों ने अपनी बुद्धिमत्ता से उस वरदान का निदान खोजा और सृष्टि को विनाश से बचा लिया।
चूँकि मूल उद्देश्य सृष्टि का कल्याण ही है, इसलिए यदि किसी वरदान को निष्फल करने का उपाय ढूँढने में किसी शक्ति को विषपान भी करना पड़ा तो वह उससे कभी पीछे नहीं हटा। ऐसी किसी चूक का सुधार करने के लिए किसी शक्ति को अपमान भी झेलना पड़ा तो वह शक्ति उससे पीछे नहीं हटी।मैंने ‘पुरुषोत्तम’ में दो पंक्तियाँ लिखी हैं-
जब राजसभा पर राजा की निजता हावी हो जाती है
तब राजनीति की चाल अचानक मायावी हो जाती है
किन्तु वर्तमान संदर्भों में लोकतंत्र के इन त्रिदेवों के मध्य ऐसा ईगो-क्लैश जारी है कि देव और दानव अपनी समस्याएँ लेकर इनके पास जाने की बजाय अपने स्तर पर ही लड़-भिड़कर समाधान निकालने में विश्वास रखने लगे हैं।
यह परिस्थिति घातक ही नहीं, विध्वंसक भी है। यह परिस्थिति स्वीकार्य नहीं है। तन्त्र को चाहिए कि वह लोकतन्त्र के अस्तित्व को बचाने के लिए अपने-अपने वर्चस्व की लड़ाई से बाहर निकलें। और लोक को चाहिए कि स्वयं को सर्वशक्तिमान समझने की बजाय तन्त्र की विवशताओं का सम्मान करना सीखे।
हमने विधायिका के चेहरे पर स्याही फेंकी, हमने राजनीति के गाल पर तमाचे मारे, हमने कार्यपालिका के साथ धक्का-मुक्की की, हमने पुलिसवालों का अपमान किया …यह सब हमेशा से होता रहा है। यद्यपि मैं व्यक्तिगत रूप से इस आचरण को भी अराजकता ही मानता हूँ। किन्तु अब जब हमने न्यायपालिका पर जूता फेंकना सीख लिया है तब मैं अपने ‘लोक’ और ‘तन्त्र’ दोनों के सम्मुख यह निवेदन रखना चाहता हूँ कि अराजकता की आंधी जब आपका घर उजाड़ रही हो तो अपनी जान बचाना स्थिति-सम्मत है, किंतु अराजकता की आंधी के साथ मिलकर अपना घर उजाड़ने में सहयोग करना कोरा पागलपन है।
भारत एक सक्षम देश है। विचारधाराओं की कहासुनी इसके लोकतान्त्रितक स्वरूप को पुष्ट करती है किन्तु खरेपन और बदतमीज़ी के मध्य का अंतर करना यदि हमने अपने युवाओं को नहीं सिखाया तो हमारी यही युवापीढ़ी एक सुंदर देश को गृहयुद्ध की त्रासदी से ग्रस्त होते देखेगी।
✍️ चिराग़ जैन
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अराजकता किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकती। स्थिति चाहे कोई भी हो, यदि सभ्यता की सीमा रेखा लांघकर उसका उपाय खोजा जाएगा तो यह पूरी सामाजिक व्यवस्था पर वज्रपात होगा। कोई राजनीतिज्ञ कितना भी भ्रष्ट क्यों न हो; यदि उस पर जूता या स्याही फेंकी जाए, यदि उसे थप्पड़ मारा जाए, तो यह अपने समाज को वीभत्स बना डालने की पहल होगी।
कोई प्रत्याशी वोट मांगने जाए तो उसे वोट देना या न देना जनता का अधिकार है किन्तु उसे लतियाने या मारने-पीटने से जनता की शक्ति नहीं, असभ्यता उजागर होती है।
हिंसा या बर्बरता किसी के भी साथ स्वीकार्य नहीं हो सकती। किसी अपराध के घोषित अपराधी तक को दण्डित करने का अधिकार विधि द्वारा नियुक्त तंत्र को ही दिया जाता है। उसे जनता के बीच फेंक कर उसकी जनहत्या करने की वक़ालत जंगलराज में सम्भव है, सभ्य समाज में नहीं।
जंगलों को तराश कर नगरों का निर्माण करने वाले हमारे पुरखे उस समय अपमानित होते हैं जब हम तंत्र की अनदेखी करके किसी की हत्या या प्रताड़ना का समर्थन करते हैं।
न्याय व्यवस्था लचर है तो उसका उपचार किया जाए; कार्यपालिका में भ्रष्टाचार है तो उसकी सफाई के प्रयास किए जाएं; विधायिका में विद्रूपता है तो मताधिकार से उसे सत्ता से बाहर किया जाए; किंतु अराजक होकर इनमें से किसी भी विकृति का निदान असंभव है।
शांतिपूर्ण प्रदर्शन, सविनय अवज्ञा, धरना, असहयोग, आंदोलन, रैली और हड़ताल तक से तंत्र की शल्य चिकित्सा स्वीकार्य है किन्तु स्वयं नियमों की अवहेलना करके, स्वयं बर्बर होकर तंत्र को आँखें दिखाना समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
कांग्रेस को अभिमान है कि उसने बांध, व्यवसाय और तकनीकें निर्मित कीं। भाजपा को अभिमान है कि उसने मंदिर निर्माण किया, किसी को अभिमान है कि उसने एक जाति विशेष में अपना काडर निर्मित कर लिया, किसी को विश्वास है कि उसने एक वर्ग विशेष को अपना वोटर बनाया किन्तु कोई आज तक यह दावा नहीं कर सका कि उसने इस देश में ‘नागरिकों’ का निर्माण किया।
यह देश की पहली आवश्यकता है। और इसकी ओर किसी का ध्यान नहीं है। यदि सब विचाराधाराओं ने नागरिक निर्माण के इस कार्य को अनदेखा करके इसी प्रकार अपने-अपने वोटर, अपने अपने काडर, अपने अपने गुंडे, अपने अपने भक्त और अपने अपने चमचे बनाने पर ही ज़ोर दिया तो फिर न तो किसी के सीढ़ियों पर लड़खड़ाने पर सम्वेदनशीलता देखने को मिलेगी और न ही किसी के स्कूटी से गिरकर अस्थिभंग होने पर कोई शालीनता दिखाई देगी।
हम सब एक दूसरे के कष्ट पर ठहाका लगा रहे होंगे और पूरा विश्व हमारे इस तीतरबाज़ समाज की खिल्ली उड़ा रहा होगा।
✍️ चिराग़ जैन
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एक अभिनेत्री ने कुछ ऐसे बयान दिये हैं, जो तथ्यात्मक रूप से मिथ्या हो सकते हैं, लेकिन इन बयानों का विरोध करनेवालों की भाषा तथा तर्कशक्ति ने अभिनेत्री के मिथ्या भाषण से ध्यान भंग करने में महती भूमिका अदा की है। ‘कम कपड़े पहनकर फिल्मी पर्दे पर आनेवाली नचनिया हमें बताएगी कि आज़ादी क्या होती है!’ -यह वाक्य पढ़कर मुझे लगा कि कुतर्क तथा तर्कहीनता इस देश की किसी भी बहस का अंग बन चुका है। क्यों भाई, यदि किसी अभिनेता/अभिनेत्री ने किसी फिल्म में नकारात्मक भूमिका निर्वाह की है तो क्या इससे उसका चरित्र आंका जाएगा? क्या कम कपड़े पहननेवाले इस देश के नागरिक नहीं हैं?
कोई ‘क्या’ कह रहा है -इस मुद्दे पर बहस को केंद्रित करने की बजाय हम उसके परिधान, उसकी जाति, उसके धर्म, उसके व्यवसाय, उसकी पारिवारिक स्थिति और उसकी निजता को क्यों टटोलने लगते हैं?
आज़ादी भीख में मिलनेवाली बात कोई साड़ी-ब्लाउज़ या सूट-शलवार पहनकर कहे तो क्या यह सत्य हो जाएगी? हमें लम्बे समय से मूल मुद्दे को भटकाने के संस्कार दिए गए हैं। टीवी पर होने वाली बहसें यह ट्रेनिंग देने में सफल हुई हैं।
प्रश्न पूर्व का पूछा जाएगा तो उत्तरदाता उसे उठाकर दक्षिण में पटक देगा और फिर दक्षिणवाले उस प्रश्न को अनर्गल साबित कर देंगे। इतना हो हल्ला होगा कि कुछ घड़ी बाद ख़ुद प्रश्न भी यह भूल चुका होगा कि मेरा जन्म क्यों हुआ था।
कोई वर्तमान का प्रश्न करे, तो उसे इतिहास दिखाने लगो। कोई इतिहास पर तुम्हारी ज़ुबान पकड़ ले तो उसे धर्म-जाति के मेले में ग़ुम कर दो। कोई धर्म-जाति पर प्रश्न लेकर खड़ा हो तो उसे आस्था आहत करने के आरोप में राष्ट्रद्रोही और धर्मद्रोही करार दे दो। और यहाँ से भी वह बच जाए तो उसके निजी जीवन, उसके पहनावे, उसके भाषाई उच्चारण दोष, उसके खानपान जैसे विषयों पर बिना बात की बहस छेड़ दो।
नरेंद्र मोदी चलते-चलते संसद की सीढ़ियों पर लड़खड़ा गये और हम इस घटना से उनको नालायक साबित करने लगे। नरेंद्र मोदी बेध्यानी में राष्ट्रगान की धुन पर सावधान न हुए और हम उस क्लिप को लेकर ठट्ठा करने लगे। नरेंद्र मोदी ने बताया कि उनका सीना छप्पन इंच का है और हम इस आधार पर उन्हें महान मानने लगे। चुनाव रैली में राहुल गांधी ने कुर्ते की फटी जेब दिखाई और हम राहुल गांधी को मूर्ख कहने लगे। किसी बयान में योगी आदित्यनाथ के मुँह से लक्ष्मण की जगह भरत निकल गया और हमने हंगामा उठा लिया।
क्यों भाई? हमें राजनेताओं से देश चलवाना है या भागवत सुननी है? किसी की जेब फटी होगी तो उससे उसके राजनैतिक निर्णय पर क्या फर्क पड़ जाएगा? हमें नरेंद्र मोदी से देश चलवाना है या भारोत्तोलन करवाना है? राष्ट्रगान पर सावधान खड़े रहना चाहिए, यह बात तो प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ा दी जाती है। लेकिन अगर कभी किसी से कोई चूक हो जाए तो उसे उसकी राष्ट्रभक्ति से जोड़कर क्यों देखा जाए?
कोई राजनेता अपनी पत्नी से अलग रह रहा है तो यह उसका व्यक्तिगत मुआमला है। इस पर प्रश्न उठाने का अधिकार उसकी पत्नी के अतिरिक्त किसी को भी क्यों हो? कोई राजनेता विवाह नहीं कर रहा तो यह भी उसका निजी निर्णय है? इससे उसके राजनैतिक निर्णयों के आकलन कैसे किया जा सकता है?
कभी विचार करके देखें तो हम पाएंगे कि अपने राजनीतिज्ञों को यह बात हमने ही सिखाई है कि असल राजनीति को छोड़कर इधर-उधर के ड्रामे करते रहो तो जनता ज़्यादा वोट देगी। अन्यथा हर काम वोट के लिए करनेवाले लोग ऐसे कार्यों का प्रोपेगैंडा क्यों करते, जिनका ‘राज्य की नीतियों’ से कोई लेना-देना नहीं हो।
कोई वैष्णोदेवी जाए तो जाने दो। कोई केदारनाथ जाए तो यह उसकी निजी आस्था है। कोई अजमेर में चादर चढ़ाए तो उस उसका पर्सनल मुआमला है। कोई मंदिर में झाड़ू लगाए तो यह उसकी मर्ज़ी है। कोई राममंदिर में दीये जलाए तो यह उसका अपना मत है। हम इन सब कार्यों को उनकी राजनैतिक स्थिति का मापदण्ड क्यों बनाते हैं? हम ऐसा क्यों मान बैठे हैं कि धर्मस्थल पर जानेवाला व्यक्ति भ्रष्टाचारी हो हो नहीं सकता; वह भी तब जब हमारे देश के न्यायालयों में धर्मस्थलों पर हुए कदाचार के सैंकड़ो मुआमले लम्बित हैं।
हम निजी जीवन और सार्वजनिक जीवन को अलग-अलग करके क्यों नहीं देख पाते।
सीता का परित्याग करने वाले राम आदर्श राजा हैं। राधा को बिरह देने वाले कृष्ण सर्वश्रेष्ठ राजनीतिज्ञ हैं। यशोधरा और राहुल को सोता छोड़कर जानेवाले तथागत सर्वाेत्कृष्ट ज्ञानी हैं। क्या इन कथाओं से भी हम यह नहीं सीख सकते कि जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक प्रश्नों के सटीक उत्तर दे रहा हो तो उस समय उसे निजता के कठघरे में घसीटकर प्रश्नावली नहीं बदलनी चाहिए।
✍️ चिराग़ जैन
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‘नो एफआईआर, नो इन्वेस्टिगेशन, नो चार्जशीट, फैसला ऑन द स्पॉट…’ -ऐसे संवाद फिल्मों में तो बहुत अच्छे लगते हैं, लेकिन असल ज़िन्दगी में इस डायलॉग पर काम करनेवाले कार्यपालक निरंकुश हो जाते हैं।
यह सत्य है कि भारतीय न्याय प्रक्रिया की धीमी गति और लचर व्यवस्था का ही दुष्प्रभाव है कि ‘फ़ैसला ऑन द स्पॉट’ जैसे अराजक संवाद इस देश में ‘लोकप्रिय’ हो जाते हैं। पुलिस की वर्दी पहनकर भी क़ानून को ताक पर रखनेवाले पुलिसवालों को हमने ‘दबंग’; ‘सिंघम’; ‘सिमबा’ और ‘पुलिसगिरी’ जैसी फिल्मों में अराजक होते देखा तो हमने यह कहकर स्वयं को संतुष्ट कर लिया कि इस देश में अपराधियों का यही इलाज है।
यदि डॉक्टर अयोग्य होगा तो कंपाउंडर के हाथ में सर्जिकल नाइफ़ सौंप देंगे क्या? डॉक्टर को कर्मठ और सक्षम बनाने की बजाय हम कंपाउंडर के ऑपरेशन करने को तो जस्टिफाई नहीं किया जा सकता ना! निरंतर डॉक्टरों के साथ रहने का कारण, ऑपरेशन थियेटर में आने-जाने के कारण वार्ड बॉय भी शल्य चिकित्सा की शब्दावली सीख जाता है, लेकिन उसे किसी की सर्जरी करने को तो नहीं कहा जा सकता ना!
न्यायालय किसी लोकतंत्र के शल्य चिकित्सक हैं और पुलिसकर्मी इस अस्पताल का नॉन मेडिकल और पैरा मेडिकल स्टाफ। अस्पताल की व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए यह स्टाफ बहुत आवश्यक है, किन्तु सामान्य बुखार में भी कोई टेबलेट लिखने की छूट इस स्टाफ को नहीं दी जा सकती।
हैदराबाद में जब पुलिस ने बलात्कार के आरोपियों का एनकाउंटर किया था तो लोगों को तालियाँ पीटते देखकर मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ था। मैं यह नहीं जानता कि वह एनकाउंटर झूठा था या बनावटी। लेकिन उस घटना पर पुलिस की पीठ थपथपाने वाले यह ज़रूर मानते थे कि पुलिस ने एनकाउंटर का नाटक करके आरोपियों की हत्या की है। यदि वह एनकाउंटर सत्य भी रहा हो तो भी इलाज के लिए वार्ड से ऑपरेशन थियेटर में ले जाते समय यदि किसी मरीज़ की मौत हो जाए तो उसका श्रेय अथवा दोष वार्ड बॉय को कैसे दिया जा सकता है?
उस दिन हैदराबाद की घटना पर जो सोशल मीडिया ट्रोलिंग हुई थी वह इस देश की संवैधानिक तथा न्यायिक व्यवस्था पर सबसे बड़ा कुठाराघात था। उसके बाद विकास दुबे प्रकरण, फिर मृतका के घरवालों को घर में बंद करके आधी रात को पेट्रोल डालकर शवदाह करने की घटना या कोई भी अन्य नागरिक… ये सब घटनाएँ उस अराजकता का एक झरोखा है, जो हमारे समाज में मूर्खतापूर्ण महत्वाकांक्षाओं के हाथों बोई जा रही है।
मरनेवाले को हिन्दू अथवा मुस्लिम के स्थान पर इस देश के एक नागरिक के रूप में देखेंगे तो आप स्वीकार कर सकेंगे कि उसे अदालत में अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए था। जिन फिल्मों में हमने पुलिसिया गुंडागर्दी पर तालियाँ बजाई हैं, उन्हीं फिल्मों से यह भी सीखा जा सकता है कि कई बार परिस्थितियाँ और इत्तेफ़ाक किसी निर्दाेष को संदेह के घेरे में लाकर खड़ा कर देते हैं। अदालतें इसी संदेह की पड़ताल करने का माध्यम हैं।
मैं फिर दोहरा रहा हूँ कि न्याय व्यवस्था को आत्मावलोकन करके अपनी गति तथा कार्यप्रणाली को सुधारने की सख़्त ज़रूरत है। लेकिन जब तक यह काम न हो तब तक भी न्यायालय का विकल्प थाना नहीं हो सकता।
भारतीय लोकतंत्र की एक इकाई होने के नाते प्रत्येक नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि वह व्यवस्था का सम्मान करे। अराजकता किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। व्यवस्था में कोई ख़ामी आई तो उसे सुधारा जा सकता है किंतु अराजकता का चेहरा समाजसेवा, राष्ट्रहित और समाजहित से हू-ब-हू भी मिलता हो तो भी उसके निरंकुश होने की शत-प्रतिशत गारंटी होती है।
आशा है कि भविष्य में किसी कम्पाउंडर को सर्जरी करते देखेंगे तो कम से कम हम तालियाँ तो नहीं पीटेंगे; क्योंकि अगली बार ऑपरेशन टेबल पर हम भी हो सकते हैं।
✍️ चिराग़ जैन