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शब्दों की कुंजगलियाँ

‘ललित निबंध’ साहित्य की महत्वपूर्ण विधा है। वर्तमान में यह विधा विलुप्त सी होती जा रही है। लेकिन चिराग़ जैन ने अनेक ललित निबंध लिखे हैं। जीवन के एक अलग पक्ष को खूबसूरती से बयां करते ये निबंध आपको ज्ञान ही नहीं, आनंद भी देंगे। ‘शब्दों की कुंजगलियां’ शीर्षक से इन निबंधों को एक पुस्तक में संकलित किया जा रहा है। यह पुस्तक अभी प्रकाशनाधीन है।

अनुक्रम

मीडिया

देश की बौद्धिक सम्पदा, दो हिस्सों में बंट रही है। एक ओर वे लोग हैं जिन्होंने बहुत वर्षों से News Channels देखना बंद कर दिया है। ये लोग Social Media के माध्यम से देश का तापमान महसूस करने की कोशिश करते हैं। इनके लिए Trending Keywords ही Current Affairs बन जाते हैं। सोशल मीडिया के जिस Influencers के...

आधुनिक आंदोलन और पौराणिक सन्दर्भ

"जीवन का ऐसा कोई आयाम नहीं है, जिसका कोई पौराणिक सन्दर्भ न हो।" -इस धारणा पर चिंतन करते हुए मुझे आन्दोलनों तथा विरोध-प्रणालियों का विचार आया। अपने सीमित ज्ञान की हार्डडिस्क को स्कैन करने पर मुझे आश्वस्ति हुई कि आज के समय में जितने प्रकार के आंदोलन और विरोध प्रदर्शन किए जाते हैं, उनमें से बहुत सी...

मंच से मन तक कुछ अलग : डॉ. हरिओम पंवार

सृजन के आश्रमों में साधना करनेवाले साधक, अपने किसी पूर्ववर्ती का अनुसरण करें -यह सामान्य है। शैली, कहन और पठंत के आधार पर किसी वरिष्ठ से प्रेरणा लेना या प्रभावित हो जाना कविता और कवितापाठ की परम्परा ही है। किन्तु, इस परम्परा की स्वीकार्यता को जानते हुए भी अपनी अलग शैली गढ़ना, अपना अलग मुहावरा...

धैर्य बनाम कायरता

एकाएक देखने पर धैर्य भी कायरता जैसा ही लगता है। धैर्य की साधना वास्तव में शौर्य के उद्वेग को संयमित करने का पराक्रम ही है। क्रोध और आवेग का पर्याप्त कारण मिलने पर भी संयत रह पाना किसी पराक्रम से कम नहीं है। किन्तु यह पराक्रम सविवेक है। यह ओज की कुण्डलिनी जागृत करने की तपश्चर्या है। यह शौर्य का...

न्यूज़ीलैंड यात्रा : गंगाधर ही शक्तिमान था

प्रशांत महासागर के पश्चिमी छोर पर बसा ख़ूबसूरत देश है न्यूज़ीलैंड। मुस्कराते हुए लोगों का देश। चेहरे पर ज़िन्दगी जैसी ख़ूबसूरत ताज़गी लिए यहाँ के लोग तनाव और उन्माद से अछूते दिखाई देते हैं। इन दिनों यहाँ पतझड़ का मौसम है। 'मुहब्बतें' फिल्म वाले मेपल के पत्ते सड़कों का शृंगार करने में व्यस्त हैं।...

स्वावलंबी प्रकृति

हम तब तक किसी काम को टालने का प्रयास करते हैं, जब तक उस कार्य को करना अपरिहार्य न हो जाए। यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है। काम को टालने के हमारे पास अनगिनत उपाय हैं। और उचित अवसर की प्रतीक्षा, कार्य को टालने का सर्वाधिक प्रयुक्त बहाना है। जिसे कार्य करना होता है, वह कार्य कर देता है। किसी कार्य को...

उर्दू और भारत

अगर भाषाओं से धर्म की पहचान होती तो हिन्दी के पास रसखान और रहीम नहीं होते तथा उर्दू के पास फ़िराक़ और गुलज़ार नहीं होते। राजनीति को मुर्गे लड़ाने का चस्का हो, तो वह कहीं और जाए, भाषाएँ तो आश्रमों की संतति होती हैं। रामप्रसाद बिस्मिल और भगतसिंह की भाषा को पराया मानने की प्रवृत्ति हमें संस्कृति ही...

सौ साल नीरज के

हिंदी की कविता, जहाँ अपने सबसे सहज रूप में शास्त्रीय मर्यादा की लक्ष्मण रेखा के भीतर खड़ी दिखाई देती है, उस पंचवटी का नाम है, 'गोपालदास नीरज'। कवि-सम्मेलन की लोकप्रियता का कीर्ति स्तम्भ जहाँ तक पाखण्ड के मुलम्मे से अछूता दिखाई देता है, वहाँ तक नीरज की दमक साफ़ दिखाई देती है। लौकिक लोभ और पारलौकिक...

डॉ प्रवीण शुक्ल

सही और ग़लत के पैमाने से आगे यह बहुत महत्त्वपूर्ण होता है कि आप अपने विचारों को कितनी शिद्दत से अभिव्यक्त करते हैं। और इस पैमाने पर मुझे डॉ प्रवीण शुक्ल हमेशा अव्वल दिखाई देते हैं। ऊर्जा का न जाने कौन सा इंजेक्शन लगाकर आए हैं कि थकान और आलस्य पर हमेशा के लिए विजय प्राप्त किए बैठे हैं। स्मरण शक्ति...

आकलन और आलोचना

जो लोग कला फ़िल्मों के मापदण्ड से सी-ग्रेड सिनेमा का आकलन करने निकले हैं, उनकी बुद्धि किसी का आकलन करने के लिए सक्षम नहीं है। वे आलोचना करने के प्रयास में विद्रूपता को प्रचारित कर रहे होते हैं और उन्हें आभास भी नहीं होता कि वे क्या पाप कर रहे हैं। सिद्धांत तो यह है कि जिसे लुप्त करना हो उसकी चर्चा...

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