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मंथरा के कदाचार से राम की अयोध्या तब तक पतित नहीं हो सकती, जब तक राम अपना चरित्र छोड़कर मंथरा के स्तर तक उतरना स्वीकार न कर लें। यदि राम विनम्रता त्यागकर प्रतिशोध का मार्ग अपनाते तो अयोध्या को कुरुक्षेत्र बनने में देर न लगती।
जब दशरथ दुलार रहे हों तब राम जैसा आचरण करना कोई बड़ी बात नहीं है, किंतु जब कैकेयी वनवास जाने का आदेश दे तब राम बने रहना ही राम को पुरुषोत्तम बनाता है।
उस दिन श्रीराम के सम्मुख अनेक विकल्प थे। वे राजसभा के सम्मुख पिता के विवश निर्णय को लोकतांत्रिक चुनौती दे सकते थे। वे अपने पीछे चले आए नागरिकों के समर्थन की आड़ में सिंहासन पर दावा कर सकते थे। वे क्षात्रधर्म का पालन करते हुए वन की ओर न जाकर, युद्धभूमि में खड़े हो सकते थे।
लेकिन राम ने इनमें से कोई विकल्प नहीं चुना। उस दिन पूरे परिवार का भविष्य राम की भंगिमाओं की ओर देख रहा था। राम ने स्वार्थ की विषबेल को सींचने के स्थान पर अपने-आपको खाद बनाकर अयोध्या की मिट्टी में स्नेह बो दिया।
राम ने उस दिन अपने आचरण से यह सुनिश्चित कर दिया था कि जिन दो भाइयों में घृणा बोने का कुचक्र मंथरा ने रचा था, उनके भीतर लहलहाती अपनत्व की फसल पूरी सृष्टि देखेगी। राम ने उस दिन यह तय कर दिया था कि लोभ की नागफनियों को भी यदि त्याग के पानी से सींचा जाए तो कांटों की छाती में भी दूध उतर आता है।
कथा तो त्रेता में भी बनी थी। अच्छी-बुरी घटनाओं की ख़बर तो बिना पैरों के दुनिया भर में फैल ही जाती है। लेकिन रामजी ने अपनी भाव-भंगिमाओं को क्षोभ और विषाद से अक्षुण्ण रखा। इसका सुपरिणाम यह हुआ कि अयोध्या पर कोई कलंक न लगा। इसका सुपरिणाम यह हुआ कि कुचक्र रचनेवाले चरित्रों को भी हृदय परिवर्तन का अवसर मिल सका। अन्यथा प्रतिकार से जूझने में भीतर के अपनत्व के स्रोत सूख जाते और कैकेयी मैया कभी प्रायश्चित के सरोवर में स्नान करके शुद्ध न हुई होतीं।
इस बार स्थिति थोड़ी विचित्र है। घटना अयोध्या में घटी है, लेकिन प्रसंग अरण्य काण्ड का है। इस बार किसी मंथरा ने कोई कुचक्र नहीं रचा है। बल्कि रावण और मारीच जैसे मायावी चरित्रों ने वेश बदलकर रामजी की कुटिया से चोरी करने का पाप किया है। और त्रेता हो या कलयुग। राम के घर से चोरी करनेवाले चरित्रों की कुंडली में मारकेश सक्रिय हो जाते हैं।
अयोध्या में विवाद परिवार के भीतर पनप रहा था, इसलिए रामजी ने स्वयं को समिधा बनाना स्वीकार कर लिया। लेकिन पंचवटी में पाखण्ड ने घर पर आक्रमण किया था, इसलिए उसका समूल नाश आवश्यक था।
इन रावणों को पापाचरण से रोकने के लिए जिन जटायुओं के पर काटे गए, उनकी गवाही से पंचवटी बदनाम नहीं होती, बल्कि रावण के पाखण्ड पर से पर्दा उठता है।
एक बात तय है, जब भी कोई रामजी के घर चोरी करेगा तो सोने-चांदी के आभूषण धरती पर फेंककर सीता मैया रामजी को चोर का पता बता ही देंगी।
इस रामायण में कौन सुग्रीव की भूमिका निभाएगा और कौन कालनेमि बनेगा, यह तो भविष्य ही तय करेगा। लेकिन यह सुनिश्चित है कि रामजी के घर में चोरी करनेवाला पाखण्डी चाहे कितना ही बड़ा लंकापति क्यों न हो, उसने अपने विनाश के पथ पर कदम बढ़ा दिया है।
✍️ चिराग़ जैन
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हमारा समाज मुद्दतों से गालियों को यत्र-तत्र प्रयोग करके व्यर्थ करता रहा है। पहली बार एक पूरी पीढ़ी ने इन मूल्यवान शब्दों की कीमत समझकर इनका बाकायदा एक प्रोफेशन के रूप में सदुपयोग करना सीखा है। गालियों के बूते बाकायदा एक ऐसी विधा डेवलप हुई है, जिसमें छोटे-बड़े, लड़के-लड़की, अपने-पराये और सभ्य-असभ्य जैसे भेदभाव के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। इसे कहते हैं असली समानता का अधिकार।
इन महान कलाकारों को सरस्वती जी से तो आशीर्वाद मिल नहीं सकता, इसीलिए इन्होंने महाभारत के शिशुपाल को अपना ‘आराध्य’ मान लिया है। उसी के चरित्र का अनुसरण करते हुए ये लोग, न मौका देखते हैं न दस्तूर, बेहिचक जमकर गालियां बकते हैं। माइक हाथ में आते ही इन्हें लगता है कि यदि गालियां न बकी गईं तो शायद इनका आराध्य इनसे नाराज़ हो जाएगा।
पैसे देकर, टिकट ख़रीदकर इनके शो देखनेवाले श्रोतागण भी इनकी गालियां सुनकर खूब ठहाके लगाते हैं। कंटेंट पर तालियां बजें या न बजें लेकिन गालियों पर तो तालियां बजती ही बजती हैं।
श्रोतादीर्घा में बैठी पब्लिक अपने उपहास पर, अपने परिवारवालों के उपहास पर और अपने प्रोफेशन के उपहास पर इतने प्रसन्न होते हैं, जैसे किसी ने उन्हें नोबेल पुरस्कार दे दिया हो।
हम vulg पहुंच गए। सेंसरबोर्ड जैसे संस्थान भी इन्हें कुछ नहीं कहते, क्योंकि यदि इनकी स्क्रिप्ट में से उन्होंने कुछ एडिट करने की कोशिश की तो अंत में केवल विराम-चिन्ह ही शेष बचेंगे।
मैं इन आधुनिक स्टैंडअप कॉमेडियन्स को समाज-सुधारक मानता हूं। क्योंकि इन्होंने उन शब्दों का उद्धार किया है, जिन्हें असभ्य कहकर अभी तक समाज में तिरस्कृत समझा जाता था। इन्होंने लाज-शर्म और लिहाज के घूंघट में जी रहे विषयों को सार्वजनिक मंच पर ले आने का साहस किया है। और चूंकि चैरिटी बिगिन्स फ्रॉम होम, इसीलिए इन महान आत्माओं ने अपने माता-पिता, अपने भाई, अपने दोस्तों और अपनी बहन तक के नितांत निजी क्षणों को धड़ल्ले से सबके सामने सुनाया।
मर्यादा की लीक पर चलते हुए अभी तक भारतीय समाज बाप-बेटी और भाई-बहन के संबंधों को जीता रहा था, उन्हें लगभग निर्वस्त्र करते हुए तलियों और ठहाकों का विषय बनाया गया। जिस तरह की बातचीत को ‘शर्मनाक’ कहकर अभी तक समाज लानत भेजता रहा था, उन्हीं को ‘गर्व’ का विषय सिद्ध करनेवाले ये युगदृष्टा एक नये युग का सूत्रपात कर रहे हैं।
कविता से हास्य उत्पन्न करनेवाले हास्य कवि, चुटकुलों से हंसानेवाले हास्य कलाकार, मिमिक्री के बूते हंसी परोसनेवाले मिमिक्री आर्टिस्ट और हावभाव से लोगों का तनाव दूर करनेवाले हास्य अभिनेताओं ने अभी तक समाज को असली हंसी से दूर रखा। इन नए हास्य अवतारों ने हास्य का पूरा परिदृश्य बदलकर रख दिया।
अपने आपको आधुनिक कहनेवाले इन शिशुपाल-पुत्रों को याद रखना चाहिए कि जिस समाज को तुम कायर मान बैठे हो, वह दरअस्ल कृष्ण की तरह मौन रहकर तुम्हारे अपराधों की गिनती कर रहा है।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Poetry, Purushottam
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