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आधुनिक आंदोलन और पौराणिक सन्दर्भ

“जीवन का ऐसा कोई आयाम नहीं है, जिसका कोई पौराणिक सन्दर्भ न हो।” -इस धारणा पर चिंतन करते हुए मुझे आन्दोलनों तथा विरोध-प्रणालियों का विचार आया।
अपने सीमित ज्ञान की हार्डडिस्क को स्कैन करने पर मुझे आश्वस्ति हुई कि आज के समय में जितने प्रकार के आंदोलन और विरोध प्रदर्शन किए जाते हैं, उनमें से बहुत सी प्रणालियों का उदाहरण हमारे पुराणों में मिल जाता है।
अपनी बात मनवाने के लिए किसी अधिकृत व्यक्ति पर दबाव बनाने का उपाय आंदोलन कहलाता है। यह प्रयास एकल भी हो सकता है और सामूहिक भी।
राजनैतिक, सामाजिक अथवा व्यवस्था संबंधी किसी परिवर्तन हेतु किया गया यह प्रयास आधिकारिक रूप से एक शक्तिसंपन्न व्यक्ति के कानों तक अपेक्षाकृत सामान्य व्यक्तियों की आवाज़ पहुँचाने हेतु किया जाता है।
सामन्यतः आंदोलन करनेवाला व्यक्ति व्यवस्था से निराश नहीं होता, अपितु वह व्यवस्था में थोड़ा परिवर्तन करके उसे और अधिक जनहितैषी बनाने का समर्थक होता है।
श्रीकृष्ण के आह्वान पर जब गोकुलवासियों ने कंस के सैनिकों को करस्वरूप मक्खन देने से स्पष्ट मना किया था तो सम्भवतः ‘हड़ताल’ या ‘तालाबंदी’ का प्रथम उदाहरण घटित हुआ। इसी प्रकार इंद्र की पूजा बंद करके, गोवर्द्धन पर्वत की पूजा करने का निर्णय एक स्थापित सत्ता का ‘बहिष्कार’ करते हुए ‘तख्ता पलट’ करने का उदाहरण हो सकता है।
रामकथा में अशोक वाटिका में बैठी माँ सीता, जब अन्न-जल त्यागकर अपनी काया को कृश कर लेती हैं तो यह ‘अनशन’ का प्रमाण है।
माता कैकेयी द्वारा अपने पुत्र को राजा बनाने के प्रयासों का भरत ने ‘इस्तीफा देकर विरोध’ दर्ज किया।
हिरण्यकशिपु के पुत्र प्रह्लाद ने पिता को भगवान मानने से इंकार करते हुए ‘सविनय अवज्ञा आंदोलन’ खड़ा कर दिया था।
सावित्री ने सत्यवान का जीवन लौटाने के लिए ‘सत्याग्रह’ का प्रयोग करके यमराज के निर्णय को बदल दिया था।
सागर मंथन ‘मानव शृंखला’ का उदाहरण है, तो समुद्र मंथन के समय हलाहल के निदान हेतु श्रीशिव को दिये गये ज्ञापन की प्रवृत्ति, ‘जनहितयाचिका’ जैसी मानी जा सकती है।
कठोपनिषद के नचिकेता ने अपने पिता के क्रोध के विरोध में तीन दिन तक यमराज के द्वार पर ‘धरना’ दिया।
द्रौपदी ने केश खोलकर पाण्डवों के सम्मुख ठीक वैसा ही विरोध प्रदर्शन किया था जैसे आजकल ‘काले झंडे’ अथवा ‘काली पट्टी’ बाँधकर किसी को शर्मिंदा किया जाता है।
गांधारी की आँखों पर पट्टी बांधने का प्रकरण ‘प्रतीकात्मक विरोध’ जैसा प्रतीत होता है और कर्ण के रथ को हाँकनेवाले मद्रराज शल्य ने ‘असहयोग आंदोलन’ का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया।
यहाँ तक कि माता दाक्षायिनी ने अपने पिता की हठधर्मिता के विरुद्ध योगाग्नि का आह्वान किया और स्वयं को भस्म कर लिया। यह घटना ‘आत्मदाह’ के ‘चरम विरोध’ का उदाहरण बन गई। श्री शिव का तांडव नृत्य तो स्पष्ट रूप से ‘उग्र विरोध प्रदर्शन’ है ही।
इसके अतिरिक्त भी लंकादहन, अशोक वाटिका ध्वंस, भीष्म प्रतिज्ञा, गंगावतरण और वामनावतार सरीखे अनगिनत पौराणिक प्रसंग इस बात के प्रमाण हैं कि व्यवस्था को जनकल्याणकारी बनाए रखने के लिए सत्ता की नीतियों का विरोध करना दरअस्ल सत्ता का विरोध नहीं होता।
घेराव, ज्ञापन, याचिका, धरना और रैलियों का उद्देश्य सत्ता को परेशान करने की बजाय समस्या पर ध्यान केंद्रित करना भी हो सकता है।
यदि शासन ने जनता के साथ अपनत्व का संबंध बिसार नहीं दिया हो तो उसे हर आंदोलनकारी एक तपस्वी प्रतीत होता है। और यदि शासन ने सत्तामद में जनता को तुच्छ समझना सीख लिया हो तो वह हर तपस्या को राजद्रोह घोषित करने का अभ्यस्त हो जाता है।

✍️ चिराग़ जैन

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