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मन और गंगा

सोचा था मन को गंगा जैसा पावन करके आएंगे लेकिन लौटे हैं गंगा को मन जैसा मैला करके! ✍️ चिराग़...

स्वावलंबी प्रकृति

हम तब तक किसी काम को टालने का प्रयास करते हैं, जब तक उस कार्य को करना अपरिहार्य न हो जाए। यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है। काम को टालने के हमारे पास अनगिनत उपाय हैं। और उचित अवसर की प्रतीक्षा, कार्य को टालने का सर्वाधिक प्रयुक्त बहाना है। जिसे कार्य करना होता है, वह...

मन बोलता है

जब सब पंछी मौन हो गए कलरव के स्वर गौण हो गए जीवन की रफ़्तार सो गई दिन पर रात सवार हो गई ऐसा एकाकी पल पाकर मन हमको झकझोर उठा जब बाहर सन्नाटा पसरा, तब अन्तर में शोर उठा कितनी इच्छाएँ प्यासी थीं, कितने काम अधूरे निकले डुगडुगियों पर नाच रहे थे, हम तो एक जमूरे निकले कर को...

जामनगर में कुछ छूट गया है…

3 मई को जामनगर स्थित रिलायंस टाउनशिप के कवि सम्मेलन के लिए घर से निकला। दिल्ली से राजकोट और राजकोट से जामनगर। इस यात्रा के सहयात्री बने प्रिय गजेन्द्र प्रियांशु। गजेन्द्र के साथ बतियाते हुए अवधी बोली का सहज लालित्य रसवृद्धि कर देता है। व्यवहार में गाँव की ठसक और...

ऊब का गीत

आस मंज़िल की किसी को भी नहीं है आदमी को खींचती है राह उसकी प्यार का मतलब नहीं है प्यार केवल प्यार का आधार है परवाह उसकी मेघ से ऊबे तो इक सूरज बुलाया सूर्य दहका, देह ने बरसात कर दी रात से उकता गए तो दिन उगाया थक गए दिन से तो फिर से रात कर दी जो हमारे पास है उससे दु:खी...
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