मन और गंगा
सोचा था
मन को
गंगा जैसा पावन करके आएंगे
लेकिन
लौटे हैं
गंगा को
मन जैसा मैला करके!
✍️ चिराग़ जैन
सोचा था
मन को
गंगा जैसा पावन करके आएंगे
लेकिन
लौटे हैं
गंगा को
मन जैसा मैला करके!
✍️ चिराग़ जैन
हम तब तक किसी काम को टालने का प्रयास करते हैं, जब तक उस कार्य को करना अपरिहार्य न हो जाए। यह मनुष्य की सहज प्रवृत्ति है। काम को टालने के हमारे पास अनगिनत उपाय हैं। और उचित अवसर की प्रतीक्षा, कार्य को टालने का सर्वाधिक प्रयुक्त बहाना है।
जब सब पंछी मौन हो गए
कलरव के स्वर गौण हो गए
जीवन की रफ़्तार सो गई
दिन पर रात सवार हो गई
ऐसा एकाकी पल पाकर मन हमको झकझोर उठा
जब बाहर सन्नाटा पसरा, तब अन्तर में शोर उठा
कितनी इच्छाएँ प्यासी थीं, कितने काम अधूरे निकले
डुगडुगियों पर नाच रहे थे, हम तो एक जमूरे निकले
कर को कमल, पदों को पंकज मान रही थी दुनिया लेकिन
हमने अपनी शाख टटोली, उस पर सिर्फ़ धतूरे निकले
जब सारे पाखण्ड सो गए, तब भीतर का चोर उठा
जब बाहर सन्नाटा पसरा, तब अन्तर में शोर उठा
पिण्डलियों ने ताने मारे, रीढ़ दुखी, सिसकी-सी आई
ऐंठे-ऐंठे कन्धे देखे, अकड़ी-अकड़ी गर्दन पाई
आँखों में अंगार भरे थे, पलकों पर पर्वत लटके थे
माथे की नस ने भी उस पल शायद कोई गारी गाई
तन की अनदेखी का किस्सा होकर कुछ मुँहज़ोर, उठा
जब बाहर सन्नाटा पसरा, तब अन्तर में शोर उठा
दिन में फिर भी छिप सकते हैं, रातों में कुछ ओट नहीं है
रातें जिसको देख न पायें, ऐसा कोई खोट नहीं है
आँसू से आँखें धुल जायें तो शायद आराम मिले कुछ
वरना अंतर्मन के शब्दों से बढ़कर तो चोट नहीं है
मन हल्का होकर सोया तो, लेकर नयी हिलोर उठा
जब बाहर सन्नाटा पसरा, तब अन्तर में शोर उठा
✍️ चिराग़ जैन
3 मई को जामनगर स्थित रिलायंस टाउनशिप के कवि सम्मेलन के लिए घर से निकला। दिल्ली से राजकोट और राजकोट से जामनगर। इस यात्रा के सहयात्री बने प्रिय गजेन्द्र प्रियांशु।
गजेन्द्र के साथ बतियाते हुए अवधी बोली का सहज लालित्य रसवृद्धि कर देता है। व्यवहार में गाँव की ठसक और प्रवृत्ति में विद्यमान कबीर ने गजेन्द्र के व्यक्तित्व को सत्यप्रेमियों के लिए आकर्षक बना दिया है। प्रशंसा लोलुपों के लिए ऐसे मनुष्यों की संगत खीझकारक सिद्ध होती है।
साहित्य और साहित्यिकों की चर्चा का रसास्वादन करते हम दोनों के कूपे का द्वार दिल्ली कैंट पर बंद हुआ तो सीधे राजकोट जंक्शन पर खुला।
राजकोट में जलेबी और फाफड़े का कलेवा ग्रहण करते हुए हम दोनों जामनगर पहुँचे। आयोजन मंडल की ओर से दीपक दवे जी हमारे गेट पास लिए टाउनशिप के द्वार पर तैयार खड़े थे। उनका अनुकरण करते हुए हम उस परिसर में प्रविष्ट हुए जो पिछले दिनों अम्बानी परिवार के वैवाहिक उत्सव के सन्दर्भ में पूरी दुनिया मे वायरल हो चुका था। शानदार बागबानी, बेहतरीन साफ़- सफाई, आलीशान साज-सज्जा और अनुशासित बाशिंदों से वातावरण में सकारात्मकता पसरी हुई थी।
हमारे पहुँचने के लगभग दो घंटे के भीतर मुंबई से दिनेश बावरा जी और सूरत से सोनल जैन भी रिलायंस टाउनशिप स्थित गेस्ट हाउस पहुँच गए। गर्मी बहुत अधिक थी, सो चारों कवि दोपहर का भोजन करके विश्राम करने चले गए। शाम 6:00 बजे हम चारों तैयार होकर रिसेप्शन पर पहुँच गए। दीपक दवे जी ने अपने सुव्यवस्थित आतिथ्य के अंतर्गत हमें कार्यक्रम स्थल पर जाने से पूर्व टाउनशिप स्थित मंदिर परिसर के दर्शन का सुझाव दिया।
सोनल चहक कर बोलीं, अरे यहाँ तो वैली ऑफ गॉड भी बनाई है ना! दीपक जी ने शांत स्वर में उत्तर दिया, जी हाँ, वहीं चलने की बात कर रहा हूँ।
मन में कौतूहल और आँखों में चमक लिए हम गाड़ियों में सवार हो गए। दीपक जी बहुत मन से हमें टाउनशिप के विषय में बता रहे थे। गाड़ी के दाहिनी ओर इशारा करते हुए दीपक जी बोले, यह पक्षियों के लिए आरक्षित स्थान है। यहाँ एंट्री रेस्ट्रिक्टिड है। मैं खिड़की के उस पार उस दिशा में देखने लगा कि तभी हमारी गाड़ी बाएं हाथ पर मुड़कर एक पार्किंग एरिया में रुक गई। गाड़ी से उतरते ही कानों में मोर, कोयल और चिड़ियों के स्वर भर गए। मैंने दीपक जी से कहा, जिन पक्षियों के क्षेत्र में प्रवेश सीमित है उनका कलरव तो दीवारें लांघकर हमारे कानों में घुसा आ रहा है। दीपक जी ने ठहाका लगाकर कहा, इस पर तो कोई नियंत्रण नहीं किया जा सकता भाईसाहब।
अब बारी थी वैली ऑफ गॉड देखने की। सीढ़ियां चढ़कर मंदिर के सम्मुख उपस्थित हुए तो चारों ओर ईश्वर विद्यमान था। सामने मंदिर की वेदी में बाँसुरीवाले कन्हैया अपनी राधिका के साथ रासमुद्रा में सुशोभित थे तो बाहर प्रांगण के एक सिरे पर वक्रतुण्ड महाकाय गणपति विराजमान थे। सामने कन्हैया, दूसरे छोर पर बप्पा और इसके ठीक मध्य में बप्पा के पप्पा. काले रंग का विराट शिवलिंग और उसके सम्मुख पंचांग प्रणाम रत नन्दी महाराज।
पूरा परिसर विशालकाय वृक्षों से सजा हुआ है। लम्बी लम्बी शाखाएँ वृक्षों की भुजाओं का आभास करवाती हुई आसमान और धरती के मध्य छायादार हरियाली बिछा रही हैं। इन शाखाओं पर हज़ारों छोटी-बड़ी घंटियाँ, लाखों रुद्राक्ष और कौड़ी से बनी लम्बी-लम्बी लटकनें लगवाई गई हैं। किसी वृक्ष पर हज़ारों नारियल बंधे हैं तो किसी दरख्त ने हज़ारों मन्नत वाली चुन्नियाँ ओढ़ी हुई हैं। कहीं पूरा तना मोली-कलावे से सिंगर उठा है तो कहीं लाखों चूड़ियों ने शाखाओं की कलाइयों को लाद दिया है।
जिधर देखो उधर ही विराट की छवि उपस्थित है। फव्वारे, यज्ञशाला… सब कुछ बैकुण्ठ सरीखा। रास्ते के एक और एक विशाल वटवृक्ष नीचे काठ से बने गोपाल चैन की बंसी बजाते दिखते हैं। थोड़ी आगे बढ़ने पर रामभक्ति में लीन वज्र अंगी हनुमान मंझीरे बजा रहे हैं। जिधर देखो उधर ही कोई न कोई देवी या देवता उपस्थित हैं।
एक बरामदे जैसे ढांचे के ऊपर लगभग पंद्रह फीट लंबा मोर बनाया गया है, जिसका रूप इतना लावण्ययुक्त है कि वास्तव का मोर भी इससे ईर्ष्या कर उठे। मुख्य द्वार पर एक विशालकाय घंटा टँका हुआ है। यत्र-तत्र छोटे बड़े देवालय हैं।
वैकुण्ठ की परिकल्पना का अब तक बना शायद सर्वाधिक निकटतम अनुमान है यह वैली ऑफ गॉड।
घड़ी दौड़ रही थी और मन ठहर गया था। मैं इस अलौकिक वातावरण को आँखों में भर लेना चाहता था। दिन का साम्राज्य अब रात के आगोश में खो रहा था। मन्दिर परिसर में हज़ारों दीपक और बल्ब जगमगा उठे थे। मूल वेदी के सामने मंत्र, शंखध्वनि और आरती गूंज रही थी।
दीपक जी ने इस आध्यात्मिक मोहपाश से बाहर निकालने के लिए हमें याद दिलाया कि आयोजन स्थल पर श्रोता प्रतीक्षा कर रहे हैं।
हम ‘कर्म ही पूजा है’ के सिद्धांत का पालन करते हुए स्टेज पर पहुँचे। लगभग 1200-1500 श्रोताओं का हुजूम रात साढ़े दस बजे तक ठहाकों, तालियों और संवेदना की तरंगों में गोते लगाता रहा। 1 बजे हमें जामनगर से ट्रेन पकड़नी थी। शीघ्रता पूर्वक रात्रिभोज करके मेरी देह सौराष्ट्र एक्सप्रेस की एक बर्थ पर आ लेटी है। मन काष्ठ-कन्हैया के चरणों में कहीं छूट गया है।
ईश्वर ने चाहा तो फिर कभी लौटूंगा ईश्वर की घाटी से अपना मन वापिस लेने।
– चिराग़ जैन
आस मंज़िल की किसी को भी नहीं है
आदमी को खींचती है राह उसकी
प्यार का मतलब नहीं है प्यार केवल
प्यार का आधार है परवाह उसकी
मेघ से ऊबे तो इक सूरज बुलाया
सूर्य दहका, देह ने बरसात कर दी
रात से उकता गए तो दिन उगाया
थक गए दिन से तो फिर से रात कर दी
जो हमारे पास है उससे दु:खी हैं
जो हमारा है नहीं है चाह उसकी
आस मंज़िल की किसी को भी नहीं है
आदमी को खींचती है राह उसकी
प्रेम से ऊबे घृणा का हाथ थामा
वैर नस-नस में भरा तो दिल निचोड़ा
भोग से ऊबे, तो ये संसार त्यागा
और फिर संन्यास में जंजाल जोड़ा
ऊब जाने से नहीं ऊबा कभी मन
ऊब जाने की नहीं है थाह उसकी
आस मंज़िल की किसी को भी नहीं है
आदमी को खींचती है राह उसकी
राह में ही भोग लो संबंध सारे
द्वार के उस पार उच्चाटन मिलेगा
प्रेम है जिससे उसे दुर्लभ बना लो
प्राप्ति के पश्चात भारी मन मिलेगा
कल्पना ने आज आलिंगन भरा है
सत्य में चुभने लगेंगी बाँह उसकी
आस मंज़िल की किसी को भी नहीं है
आदमी को खींचती है राह उसकी
✍️ चिराग़ जैन