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अन्तर

अन्तस् की पावन भोगभूमि और मानस की पवित्र भावभूमि पर बसी अधरों की सौम्यता। लोचनयुगल में अनवरत प्रवाहमान विश्वास की पारदर्शी भागीरथी अनायास ही छलक पड़ती है सागरमुक्ता-सी दन्तपंक्ति के पार्श्व से प्रस्फुटित निश्छल खिलखिलाहट के साथ। और इस पल को शब्दों में बांधने के निरर्थक...

ज़ख़्म कौन धोएगा

भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा तेरे बँटते हुए आँचल में कौन सोएगा बम्बई ने जो धमाकों के ज़ख़्म खाए हैं भूखे बच्चे जो गोधरा में बिलबिलाए हैं मंदिरों में भी धमाकों की गूंज उठती हैं आज हिन्दोस्तां में अरथियाँ भी लुटती हैं किसी मासूम की जब आह सुनी जाती है तो ख़यालों में यही...

अहसास

मेरे गीतों में मेरे प्रेम का विश्वास बिखरा है कहीं पतझर ख़नकता है कहीं मधुमास बिखरा है मेरी बातें दिलों को इसलिए छूकर गुज़रती हैं कि इन बातों में कोई अनछुआ अहसास बिखरा है ✍️ चिराग़...

मानव की तस्वीर

पंक्ति अक्षर-शरों भरी तूणीर दिखाई देती है दर्द भरे दिल में दुनिया की पीर दिखाई देती है हास्य कहो या व्यंग्य कहो, शृंगार कहो या शौर्य कहो हर कविता में मानव की तस्वीर दिखाई देती है ✍️ चिराग़...

दीपावली

अमावस के आकाश में रौशनी का खेल माटी के दीपकों में फुँकता हुआ तेल चौराहों पर बिखरी बंगाली मिठाई और आग में जलती देश की कमाई मेरे मन में कुछ प्रश्न भर जाती है और मुझे सोचने पर विवश कर जाती है क्या ग़रीब के घर से ज़्यादा अंधकारमय है आकाश? क्या निर्धनकाया से ज़्यादा रूखापन...
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