Chirag Jain Writings, Free Verse, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
अन्तस् की पावन भोगभूमि
और मानस की पवित्र भावभूमि पर बसी
अधरों की सौम्यता।
लोचनयुगल में अनवरत प्रवाहमान
विश्वास की पारदर्शी भागीरथी
अनायास ही छलक पड़ती है
सागरमुक्ता-सी
दन्तपंक्ति के पार्श्व से प्रस्फुटित
निश्छल खिलखिलाहट के साथ।
और इस पल को
शब्दों में बांधने के
निरर्थक प्रयास करके
कसमसाकर रह जाता है शब्दकोश।
अप्रासंगिक लगने लगती हैं
सृष्टि की समस्त लौकिक-पारलौकिक उपमाएँ
क्योंकि
बहुत अन्तर होता है
उपमान और उपमेय में!
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
तेरे बँटते हुए आँचल में कौन सोएगा
बम्बई ने जो धमाकों के ज़ख़्म खाए हैं
भूखे बच्चे जो गोधरा में बिलबिलाए हैं
मंदिरों में भी धमाकों की गूंज उठती हैं
आज हिन्दोस्तां में अरथियाँ भी लुटती हैं
किसी मासूम की जब आह सुनी जाती है
तो ख़यालों में यही बात सरसराती है
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
जब दरिंदों ने अयोध्या में ज़ुल्म ढाया था
जहाँ लाशों का समन्दर-सा लहलहाया था
काश इन्सान को इन्सान दिखाई देते
न तो हिन्दू न मुसलमान दिखाई देते
काश हिन्दोस्तां एक प्यार का क़स्बा होता
सबकी आँखों में एतबार का जज़्बा होता
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
जिसने इस देश की ख़ातिर लहू बहाया था
जिसकी ललकार से अंग्रेज कँपकँपाया था
जिनको दुश्मन ने कोल्हुओं के साथ पेला था
जिनकी पीठों ने चाबुकों का दर्द झेला था
उन शहीदों के भी अरमान पूछते होंगे
आज अल्लाह और राम पूछते होंगे
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
आज मरहम की ज़रूरत है तो मरहम बाँटें
क्या ज़रूरी है कि ख़ुशियों की जगह ग़म बाँटें
आओ हम इतने क़रीब आएँ कि दूरी न रहे
आओ ऐसे जिएँ कि मरना ज़रूरी न रहे
आओ इतने दिए जलाएँ कि ना रात आएँ
किसी के जे़ह्न में फिर ये न ख़यालात आएँ
भारती आज तेरे ज़ख़्म कौन धोएगा
तेरे बँटते हुए आँचल में कौन सोएगा
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Muktak, Poetry
मेरे गीतों में मेरे प्रेम का विश्वास बिखरा है
कहीं पतझर ख़नकता है कहीं मधुमास बिखरा है
मेरी बातें दिलों को इसलिए छूकर गुज़रती हैं
कि इन बातों में कोई अनछुआ अहसास बिखरा है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
पंक्ति अक्षर-शरों भरी तूणीर दिखाई देती है
दर्द भरे दिल में दुनिया की पीर दिखाई देती है
हास्य कहो या व्यंग्य कहो, शृंगार कहो या शौर्य कहो
हर कविता में मानव की तस्वीर दिखाई देती है
✍️ चिराग़ जैन
Blank Verse, Chirag Jain Writings, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
अमावस के आकाश में रौशनी का खेल
माटी के दीपकों में फुँकता हुआ तेल
चौराहों पर बिखरी बंगाली मिठाई
और आग में जलती देश की कमाई
मेरे मन में कुछ प्रश्न भर जाती है
और मुझे सोचने पर विवश कर जाती है
क्या ग़रीब के घर से ज़्यादा अंधकारमय है आकाश?
क्या निर्धनकाया से ज़्यादा रूखापन है दीपकों के पास?
क्या सड़क को भूखों से ज़्यादा भूख लगती है?
क्या मेरे देश में फूँकने के लिये भी कमाई बचती है?
काश,
ये सारे प्रश्न
हमारी राहों से सदा-सदा के लिये मिट जायें
इसी कामना के साथ संभव हैं
दीपावली की शुभकामनाएँ।
✍️ चिराग़ जैन