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छल का पल

आँखें पलकों की सीमा से बाहर आने को आतुर थीं कंधे ढूंढ रहे थे कोई एक हथेली धीर बँधाए रक्त शिराओं के तटबंधों की मर्यादा लांघ रहा था अपनेपन के छल से आहत दिल ख़ुद को कैसे समझाए मुट्ठी भींच नहीं सकता था, संबंधों का दम घुँट जाता और हथेली के खुलते ही भाग्य मुझे उपहास बनाता...

बचपन के किस्सों से पूछो

तुम खरगोशों के अनुयायी मैं हूँ कछुए का पथगामी बचपन के किस्सों से पूछो आख़िर में जय किसकी होगी जब सारस को आमंत्रित कर खीर परोसी थी थाली में लम्बी चोंच लिए बेचारा कैसे जल पीता प्याली में दृश्य मगर परिवर्तित होगा सारस का भी दिन आएगा शर्बत युक्त सुराही होगी धूर्त देख कर...

सृजन-पथ

मौन लम्हों को पकड़कर शब्द में साकार करना भावसागर से अमिय का घट जुटाने-सा कठिन है कल्पना में कौंधते लाखों विचारों से उलझना इक उफनती बाढ़ को काबू में लाने-सा कठिन है राम का दुःख तब कहा जब रह गए तुलसी अकेले मेघदूतम् के रचयिता ने विरह के कष्ट झेले कृष्ण की इक बावरी ने विष...

साम्प्रदायिक सद्भाव की बातें

युग बीत गए साम्प्रदायिक सद्भाव की बातें करते हुए। धार्मिक कट्टरता की अग्नि में मानवीय मूल्यों के संरक्षण की संभावनाएँ भस्म हो जाती हैं। पुरानी पुस्तकों के सफ़हे पीले पड़कर झड़ने लगे हैं। उन्हें पुनर्मुद्रित न कराया गया तो उनका नामोनिशान भी न बचेगा। मंदिरों-मस्जिदों ने...

भारत की पूर्णता

भारत की पूर्णता का भान करने के लिए वेद की ऋचाओं का सुज्ञान भी ज़रूरी है मंदिरों की संध्या आरती के सुर मुख्य हैं तो मस्जिदों से उठती अजान भी ज़रूरी है कातिक, असौज, माघ, सावन भी अहम हैं मीठी ईद वाला रमज़ान भी ज़रूरी है नानक, कबीर, बुद्ध, महावीर, ईसामसीह राम भी ज़रूरी, रहमान...
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