+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

संतोष

बूंद भर जल नहीं दो भले तुम मुझे दीखते ही रहो बस घड़ों की तरह क्या हुआ गर कभी प्यास बाकी रही ज़िन्दगी चुक गई आस बाकी रही जिन ज़मीनों की अरदास बाकी रही खोखली हो गई बीहड़ों की तरह मंडियों में सजाया हुआ नेह हूँ मैं शपथ में बसा एक संदेह हूँ वक़्त के हाथ जर्जर हुई देह हूँ बस...
error: Content is protected !!