+91 8090904560 chiragblog@gmail.com

सिस्टम है बड़ा मज़ाकिया

एक तरफ़ दहकाता भभका, दूसरी तरफ़ दहलाती ऊँचाई मदद के हाथ छोटे पड़ रहे थे और लपटों की भुजाएँ बढ़ती आ रही थीं। जिन्हें सहारा समझ कर थामा वो तप कर अंगारे हुए जाते थे। दमकल की लाल गाड़ियों को देख उम्मीद जाग गई होगी कि जैसे फिल्मों में होता है ऐसे ही हमारे कूदने पर व्यवस्था का कोई जाल मौत से पहले आगोश में ले लेगा। कूदने की हिम्मत देने वाला जाल नदारद था और सहारों पकड़ ढीली होती जा रही थी, उस पर भीतर का भभका धकेल देना चाहता था। दमकल की गाड़ियां दूर खड़ी होकर अपनी लाचारी पानी उछाल रही थीं। बच्चे बहुत देर तक मौत से ज़िन्दगी की ओर ले जाने वाली सीढ़ी का इंतज़ार करते रहे, बहुत देर तक उनकी आँखें उस जाल को तलाशती रही जो शायद व्यवस्था ने ऐसे ही किसी पल के लिए टेंडर मंगा मंगाकर ख़रीदा था। बहुत देर तक इन्तज़ार के बाद बच्चे कूद नहीं पाए, और सिस्टम पर टिकी किसी उम्मीद की तरह सिर के बल ज़मीन पर आ गिरे। आह! किताबों में रौशनी ढूंढने निकली ऊर्जा लापरवाहियों की भेंट चढ़ गई। साथ-साथ खिलखिलाने वाले कुछ ख़ूबसूरत फूल एक-एक कर लाशों में तब्दील हो गए। देश संवेदनाएं व्यक्त कर रहा है, और हर संवेदना पर आकाश में 20 जिंदगियां एक-दूसरे को ताली देकर हँस रही हैं कि यार अपना सिस्टम है बड़ा मज़ाकिया!

✍️ चिराग़ जैन

error: Content is protected !!