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काव्य

जिन शिखरों को हो पिघलने से ऐतराज़ उन्हें कभी नदी-सा बहाव नहीं मिलता अनुभूति अनकही रहती हैं जब तक अक्षरों से उनका स्वभाव नहीं मिलता जोड़-तोड़ करने से कविता तो बनती है किन्तु ऐसी कविता में भाव नहीं मिलता काव्य तो है ऐसी पीड़ाओं की प्रतिध्वनि जहाँ टीस उठती है पर घाव नहीं...

सपना

मुझपे अब मेहरबान हो कोई मेरे सपनों की जान हो कोई मेरे मन में उतर-उतर जाए जैसे बन्सी की तान हो कोई ✍️ चिराग़...
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