Chirag Jain Writings, Geet, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
ये हवा कल भी बही थी
ज़िन्दगी कल भी यही थी
कुछ कमी कल भी नहीं थी
पर तुम्हारे आगमन ने बीहड़ों में जान भर दी
संग अधरों के लगाकर बाँसुरी में तान भर दी
बिन तुम्हारे भी अधूरापन नहीं था ज़िन्दगी में
पर ख़ुषी का भी कोई कारण नहीं था ज़िन्दगी में
ये महक, ये बदलियाँ, ये बारिषंे कल भी यहीं थीं
कैसे मैं कह दूँ कोई सावन नहीं था ज़िन्दगी में
तुमने ही इन बारिषों को इक नई झनकार देकर
बदलियों को रंग, दिल को संग, मुझको प्यार देकर
मस्त मौसम में अचानक इक नई पहचान भर दी
संग अधरों के लगाकर बाँसुरी में तान भर दी
शब्द-सा बेकार था, तुम अर्थ बन मुझमें समाईं
आँसुओं का गीत था, तुम दर्द बनकर छलछलाईं
तुम समन्दर के हृदय पर लहर बनकर डोलती हो
आम्र-तरु की डालियों पर कोयलों-सी गुनगुनाईं
आपके आने से पहले मुस्कुराना भी कठिन था
खेलना, हँसना, मनाना, रूठ जाना भी कठिन था
तुमने अपनाकर ये मेरी ज़िन्दगी आसान कर दी
संग अधरों के लगाकर बाँसुरी में तान भर दी
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Ghazal, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
जब तक हमसे भाग्य हमारे खोटे होकर मिलते हैं
बस तब ही तक हम लोगों से छोटे होकर मिलते हैं
कोई कैसे सच बोले सबकी है अपनी लाचारी
अब तो दर्पण से भी लोग मुखोटे होकर मिलते हैं
जिनसे मतलब हो बस उनकी हाँ को हाँ कहते हैं जो
उनका क्या है; बिन पेंदी की लोटे होकर मिलते हैं
जब से ख़ुद्दारी गिरवी रख, हमने बेच दिया ईमान
तब से वही लिफ़ाफ़े हमको मोटे होकर मिलते हैं
हमरे कैसी करी तरक्क़ी, इमली, पीपल, बरगद सब
धरती से कट कर गमलों में छोटे होकर मिलते हैं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
ग़र वो मेरे हमसफ़र हो जाएंगे
चार दिन यूँ ही बसर हो जाएंगे
आज जो बनकर मरीज़ आए यहाँ
कल ये सारे चारागर हो जाएंगे
झूठ के सब दाँव सच के नाम पर
एक पल में बेअसर हो जाएंगे
चांद का मजहब नहीं पूछो जनाब
वरना दंगे चांद पर हो जाएंगे
हमने कब सोचा था सच्ची बात पर
आप रुसवा इस क़दर हो जाएंगे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Muktak, Poetry
अंधेरों की कहानी आफ़ताबों में नही मिलती
हक़ीक़त की निशानी चंद ख़्वाबों में नहीं मिलती
हमारे दर्द को महसूस करने की ज़रूरत है
हमारी ज़िंदगानी इन किताबों में नहीं मिलती
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Koi Yoon Hi Nahin Chubhta, Poetry
दो पल को प्यास मिटाकर तुम घंटों तड़पाया करती हो
कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो
जब जाड़े की सुबह में तन को धूप सुहाने लगती है
सबकी आँखों में जब अलसाई मस्ती छाने लगती है
जब उस मीठे-मीठे मौसम में नींद-सी आने लगती है
बस तभी अचानक हवा रंग में भंग मिलाने लगती है
ज्यों छोटी-छोटी सी बदली सूरज पर हावी हो जाएँ
ख़ुशियाँ भी जाते-जाते ज्यों यादों के काँटे बो जाएँ
बस ऐसा ही लगता है जब तुम घड़ी दिखाया करती हो
कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो
जैसे कटने से पहले ही फ़सलों पर पाला पड़ जाए
जैसे किसान के आंगन में मौसम का मूड बिगड़ जाए
जैसे सुन्दर सपने से जग जाना दिल को दुख देता है
जैसे घर के आंगन का बँट जाना आँखें भर देता है
जैसे मासूम परिंदों को सैयादों से डर लगता है
जैसे सजनी को साजन के बिन सूना-सा घर लगता है
बस ऐसा ही लगता है जब तुम पर्स उठाया करती हो
कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो
जैसे चकवे के बिन चकवी का जीना दूभर होता है
जैसे सीता का हृदय राम बिन सुबक-सुबक कर रोता है
जैसे रस-रंग-गंध के बिन हर पुष्प वृथा-सा लगता है
जैसे कन्हा का मुख राधा की करुण व्यथा-सा लगता है
जैसे लक्ष्मण की पत्नी के रोने पर भी पाबन्दी हों
जैसे सुग्रीवों की मुस्कानें बाली के घर बन्दी हों
बस ऐसा ही लगता है जब तुम हाथ हिलाया करती हो
कुछ देर मिलन के बाद प्रिये जब वापस जाया करती हो
✍️ चिराग़ जैन