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फ़ुरसत

धूप इक रोज़ ढल ही जाती है उम्र सूरत बदल ही जाती है थोड़ी फ़ुरसत निकालकर देखो ज़िन्दगी तो निकल ही जाती है ✍️ चिराग़...

अतीत से सामना

सामने आ गए आज फिर हम आज फिर से संभलना पड़ेगा एक-दूजे से ख़तरा नहीं है ख़ुद से बच के निकलना पड़ेगा आँख से तुम बरसने न दो बदलियाँ काँपकर सब बयां कर न दें उंगलियाँ चल न आना मेरी ओर सब भूलकर बोलने लग न जाएँ कहीं पुतलियाँ नेह को कब दिखी कोई सीमा देह को ही समझना पड़ेगा...

याद का गीत

याद ने इक रेशमी-सा जाल फिर फैला लिया है मन ज़रूरी काम सारे छोड़कर है गुम याद फिर से आ रही हो तुम त्यौरियां चिन्ताओं का बोझा सम्भाले फिर रही हैं चेतना बरसों पुराने हर्ष में उलझी हुई है हाथ में तो ढेर सारे काम हैं आधे-अधूरे उंगलियाँ केवल तुम्हारे स्पर्श में उलझी हुई हैं...

या में दो न समाय

सीमित संसाधनों में असीमित सुख भोगने का साधन है- प्रेम। भौतिकता और नैतिकता; इन दोनों की कुण्डली से मुक्त होकर निस्पृह विचरण का निमित्त है- प्रेम। क्रोध, मान, माया और लोभ -इन चारों से रहित होकर निश्छल हो जाने की अनुभूति है- प्रेम। अमूर्त को देख लेने की कला है- प्रेम।...

चाहत

दिल ऊँचाई पर जाना भी चाहता है और किसी से बतियाना भी चाहता है दीवाना है, ज़िंदा है जिसकी खातिर उसकी खातिर मर जाना भी चाहता है दिल दे बैठा है जिसके भोलेपन को उस पगली को समझाना भी चाहता है मुश्किल है, अंधियारे को रौशन करना जल जाना तो परवाना भी चाहता है सूरज रब बन जाता है...
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