Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
परवानू से केबल कार में सवार होते ही रस्सियाँ हमें मोक्ष की ओर ले चलीं। मन आजकल अध्यात्म की यात्रा पर है, इसलिए ऐश्वर्य की वीथियों पर भी दृष्टि को दर्शन का योग मिल ही जाता है।
रूम चेक-इन करके बालकनी का दरवाज़ा खोला तो यकायक अपने आपको शिवालिक की पहाड़ियों से कुछ ऊँचा महसूस किया। सामने प्रकृति का विराट वैभव पसरा हुआ है। नीलाभ सौंदर्य के बीच श्वेत बादलों का अस्तित्व बड़े से कैनवास पर बेतरतीब किन्तु सार्थक ब्रश स्ट्रोक्स का आभास करा रहे हैं।
स्वयं को ऊंचाई पर देखकर अहंकार ने अंगड़ाई लेकर गर्दन ऊपर उठानी चाही ही थी, कि सूर्य की किरणों ने आँखों को छूकर सिर नीचा कर दिया।
मैं अपने बौनेपन से शर्मिंदा नहीं हुआ। बल्कि मन ही मन प्रकृति के गुरुत्व को प्रणाम किया।
अब हवाएं मेरे बालों में उंगलियां फिराती हुई मेरे साथ बालकनी में बैठी हैं। सामने एक प्याला चाय है। बादलों का अनवरत बदलता आकार कोई बिना स्क्रिप्ट का नाटक कर रहा है।
मैं ऊँची बालकनी में बैठकर विहंगम दृष्टि से विहंग विहार का सुख भोग रहा हूँ। सीढ़ीनुमा खेतों के बीच छिटकी हुई आबादी दिखाई दे रही है। एक सर्पिली सड़क एक पहाड़ को दूसरे पहाड़ से जोड़ती हुई सांप-सीढ़ी खेल रही है। दृष्टि एक क्षण में खेतों की सीढ़ियां चढ़ती है और दूसरे ही क्षण सड़क के घुमावदार फिसलाव पर फिसल जाती है।
सूरज की चमक अब शीतल होने लगी है। सामने अस्ताचल अपने यायावर का स्वागत करने को तैयार हो रहा है।
सन्नाटे में सुई की आवाज़ का तो नहीं पता लेकिन शांत मन में सांसों की आवाज भी स्पष्ट सुनाई दे रही है।
हवा की पालकी पर सवार अलग-अलग परिंदों के स्वर एक अलौकिक संगीत की सर्जना कर रहे हैं। तोतों और गौरैया के स्वर इस संगीत में अलग पहचाने जाते हैं।
एकाध टिटहरी और एक जंगली मुर्गा लगातार संगीत के बीच कुछ अलग राग अलाप रहे हैं।
और मैं एकांत में अपने अस्तित्व को भोग रहा हूँ!
हुआ एक मुद्दत के बाद आज तन्हा
लगा जैसे कोई बिछड़कर मिला है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
दिल ऊँचाई पर जाना भी चाहता है
और किसी से बतियाना भी चाहता है
दीवाना है, ज़िंदा है जिसकी खातिर
उसकी खातिर मर जाना भी चाहता है
दिल दे बैठा है जिसके भोलेपन को
उस पगली को समझाना भी चाहता है
मुश्किल है, अंधियारे को रौशन करना
जल जाना तो परवाना भी चाहता है
सूरज रब बन जाता है बरसातों में
हाज़िर भी है, छुप जाना भी चाहता है
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Do Misron Ke Beech, Ghazal, Poetry
हर दिन बढ़ता ही जाता है मेरे आंगन का वीराना
और अकेला कर जाता है हर दिन कोई यार मुझे
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जिसके चेहरे की पीड़ा को पढ़कर तुम बेचैन हुए थे
उसकी आँखों के आँसू से तुमने कैसे आँख चुरा ली
जिसकी हर इच्छा का बिरवा, तुमने साँसों से पोसा था
उसकी चाहत के झूले से कैसे तुमने शाख़ चुरा ली
सिसकी भरने से पहले ही, तुम दुलराने आ जाते थे
दुनिया से मन ऊब न जाए, प्यार जताने आ जाते थे
एकाकीपन की सर्दी से जब अंतर्मन काँप रहा था
तुमने भी उस ही मौसम में रिश्तों की पोशाक चुरा ली
उम्मीदों का साथ न हो तो, साँसें कुम्हलाने लगती हैं
मन में कोई आस न हो तो, आँखें पथराने लगती हैं
तुमसे ही उम्मीद बची है, उसको मत मर जाने देना
दुनिया ने बाक़ी उम्मीदें, सीना करके चाक चुरा लीं
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
जिन डेरों ने उत्सव पूरा था रैना के आँचल में
भोर उन्हीं डेरों पर इक वीराना पाती है
अंधियारे में जीवन सबका रंग-रंगीला लगता है
पहली किरण उदासी का अफ़साना पाती है
जिनके बिन हर महफ़िल का सिंगार अधूरा होता है
उन फूलों का गुच्छा सुबह केवल घूरा होता है
जिसके दम पर महफ़िल अपना सिर ऊँचा कर लेती है
वो सब कुछ सुबह होने तक चूरा-चूरा होता है
झूठे रंग उतर जाते हैं रात गुज़रने से पहले
भोर महज सच का बदरंग ख़ज़ाना पाती है
साज पड़े होते हैं लेकिन सुर थक कर सो जाते हैं
देह पड़ी रह जाती है और प्राण कहीं खो जाते हैं
जिनका आकर्षण था उनसे दिल घबराने लगता है
जश्न सुबह की क्यारी में इक सन्नाटा बो जाते हैं
रात जवानी की बाँहों में रास रचाती फिरती है
और सुबह रंगरलियों से उकताना पाती है
✍️ चिराग़ जैन