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सेना- गार्जियन ऑफ द नेशन

सेना के शौर्य पर बने अन्य चलचित्रों की भाँति ‘सेना- गार्जियन ऑफ द नेशन’ में भी सैनिकों की चुनौतियों, सैन्य जीवन की कठिन परिस्थितियों तथा उनके परिवारों के भावनात्मक पक्ष को प्रकाशित करने का एक और प्रयास किया गया है।
कार्तिक शर्मा की मुख्य भूमिका में विक्रम चौहान और दीनदयाल शर्मा की भूमिका में यशपाल शर्मा ने सर्वाधिक प्रभावित किया। आतंकी हमज़ा का पात्र बहुत नया है, जो आतंकवादियों की परंपरागत मूढ़ छवि से कुछ हटकर एक शातिर आदमी की शक़्ल पेश करता है। राहुल तिवारी ने इस भूमिका का निर्वाह भी बेहतरीन किया है।
नायक की माँ के किरदार में नीलू डोगरा ने भी एक संभ्रांत और समझदार गृहिणी का सच्चा चित्र प्रस्तुत किया है। उनके चेहरे के हाव-भाव हमारे घरों की महिलाओं की तरह सादा और कभी-कभी कटाक्ष-स्मित से अलंकृत हैं।
मेरा हमेशा से मानना रहा है कि हक़ीक़त और बॉर्डर जैसी फ़िल्मों ने इस विषय को लगभग निचोड़ लिया है लेकिन फिर भी मुझे यह कहने में संकोच नहीं है कि ‘सेना’ का कहानीकार इस निचुड़े हुए नींबू में से रस की कुछ बूँदों को हासिल करने में कामयाब हुआ है।
एक पिता के वात्सल्य को संघर्ष के समय की स्थितियों से जोड़ने के लिए नायक के बचपन का फ्लैशबैक जिस खूबसूरती से पटकथा में बुना गया है वह भय की रोमांचक मनोदशा को यकायक भावुक कर देता है।
यह मेरा पक्षपात हो सकता है किन्तु एक कवि होने के नाते मुझे व्यक्तिगत रूप से रश्मिरथी और पुष्प की अभिलाषा का प्रयोग तो अच्छा लगा ही, साथ ही हिंदी साहित्य में पिता की भावनाओं के दृष्टिकोण से किसी उपन्यास की कमी का जिस सलीके से उल्लेख किया गया है, वह दिल को छू गया।
एक पिता के वात्सल्य की महीन आवाज़ को कहानी में बेहद शानदार और दमदार ढंग से मुखर किया है। पिता को कंधे पर बैठानेवाले दृश्य में तो आँखें खारी हो गयी थीं।
यद्यपि कहानी की मांग के बहाने से रक्तपात और हिंसा के दृश्यों को न्यायसंगत ठहराया जा सकता है लेकिन मेरा मानना है कि वैभत्स्य को मंच पर प्रतीकात्मक ही रखा जाए तो अधिक नयनप्रिय रहता है। हालाँकि मैं इस बात की प्रशंसा करूंगा कि नायक के भीतर घुमड़ते भावुक क्रोध को पर्दे पर उतारने के लिए जिस उत्तेजना से सैंकड़ों गोलियां एक आतंकवादी के जिस्म में उतारी गईं, वह वास्तव में कहानी की मांग थी। यह गोलियों से भूनने और जिस्म को छलनी करने जैसी मिसालों को मूर्त करने का उत्कृष्ट उदाहरण है।
हमज़ा के बदले हुए चेहरे को दिखाने के लिए उसका रक्तरंजित घिनौना चेहरा भी मुहावरे को चरितार्थ करता हुआ लाजवाब शॉट है।
सिरीज़ कहीं भी अनावश्यक विस्तार करती नहीं दिखती और न ही ओढ़ी हुई भावुकता से दूषित है। सैनिकों के जीवन पर आधारित दर्जनों फ़िल्मों के बावजूद यह सिरीज़ जनमानस को सैन्य भावनाओं के और निकट से दर्शन कराने में सफल कही जाएगी।

✍️ चिराग़ जैन

कहाँ शुरू कहाँ ख़त्म

“मुझसे पूछा नहीं” – यह भाव किसी की भी नाराज़गी का सहज कारण हो सकता है। बल्कि यह कहा जाए कि दुनिया भर की सारी शिकायतों का अध्ययन किया जाए तो 70-80 प्रतिशत शिकायतों के मूल में यह भाव मिलेगा।
पहली बार इस भाव को सीधे-सीधे अभिव्यक्त करती हुई एक फिल्म आई है। पहली बार किसी फिल्म ने नारी-समानता के तमाम उपक्रमों को पुरुष के ठीक बराबर लाकर खड़ा कर दिया है।
“कहाँ शुरू कहाँ ख़त्म” को आपने अगर एक लाइट कॉमेडी की तरह देखकर ख़त्म कर दिया तो समझ लीजियेगा कि आप गंगा किनारे से सूखे लौट रहे हैं। सामने खड़े पति को छोड़कर परमेश्वर से बतियाती स्त्री उस पुरुषप्रधान समाज पर सबसे तीखा कटाक्ष है, जिसे स्त्री की संवेदना सुनाई ही नहीं देती।
फिल्म का कहानीकार केवल मसाला परोसने के लिए कहानी को हरियाणा से निकालकर बरसाने की ओर नहीं ले गया है, वह एक ही समाज के दो अलग-अलग रंग दिखाकर स्त्री की सामाजिक स्थिति का अन्तर रेखांकित कर रहा है। एक ओर गोलियाँ बरसानेवालों के यहाँ घूंघट में छिपी स्त्री है और दूसरी ओर बरसानेवालों के यहाँ लाठी थामकर खड़ी गृहस्वामिनी है, जिसके आँगन में कोई बिना पैर धोए आ जाए तो वह कुपित हो जाती है। यह सशक्त स्त्री यह संदेश देना नहीं भूलती कि उसका साम्राज्य उसके आँगन तक है किन्तु जहाँ तक उसका साम्राज्य है, वहाँ तक उसका एकछत्र राज है। फिल्म में नायक का भाई, अध्यात्म को बाज़ार बनाकर बेचने की प्रवृत्ति पर करारा व्यंग्य कर रहा है।
नायिका का भाई एक दृश्य में नायक को पीटता है। उसका कष्ट यह नहीं है कि नायक ने किसी लड़की को शादी से भगाया है, उसका कष्ट यह है कि नायक ने ‘उसकी बहन’ को भगाया है। समष्टि से चलनेवाले समाज मे व्यष्टि की यह व्याप्ति समाज की सोच पर प्रश्नचिह्न जड़ रही है।
और पुरुष प्रधान समाज के गाल पर सबसे करारा तमाचा फिल्म का वह दृश्य है जिसमें ऑडी की ड्राइविंग सीट पर बैठी नायिका से नायक कहता है कि मैंने गुंडों की बहन को भगा लिया है अब वो लोग मुझे नहीं छोड़ेंगे। इस पर नायिका बताती है कि तूने मुझे नहीं भगाया, मैंने तुझे भगाया है। पुरुष के कर्ताभाव के अहंकार पर इससे गहरा घाव शायद ही पहले कभी हुआ हो।
बहरहाल, व्यंग्य को इतने सलीके से परोसने वाली फिल्म बहुत समय बाद देखने को मिली है। हास्य का हल्का सा स्पर्श व्यंग्य की धार को कुंद किए बिना ही फिल्म की रोचकता में वृद्धि कर रहा है।
और भी अनेक दृश्य कटाक्ष की छुरी पर रखे, संदेश के शहद का आभास कराते हैं, लेकिन मैंने सब कुछ यहाँ लिख दिया तो आपको फिल्म देखने में मज़ा नहीं आएगा।
सो, जाइए फिल्म देखिए और कमेन्ट कर के बताइये कि कटाक्ष की यह चुभन कैसी लगी।

✍️ चिराग़ जैन

दादा लखमी : एक जीवन जो सांग बन गया

‘ये नाचणिये-गावणिये बावळे ही होवे सै।’ -फिल्म में यह संवाद दो बार प्रयोग किया गया और दोनों बार सिनेमा हॉल में ठहाका गूंज गया। लेकिन फ़िल्मकार ने यह संवाद चुटकुले की तरह नहीं बल्कि फलसफे की तरह प्रयोग किया है। यह फ़िल्मकार का कौशल है कि इससे फूटने वाले ठहाके में भी इसका फलसफा अपना पूरा प्रभाव छोड़ता है।
ये चमत्कार इस एक संवाद में ही नहीं, अपितु पूरी फिल्म में रह-रहकर उभरता है।
किसी के जीवन पर फिल्म बनाते समय पटकथा को स्तुतिगान बनने से बचाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है, और दादा लखमी का फ़िल्मकार इस चुनौती को साधने में काफ़ी हद तक सफल रहा है।
लगभग सवा सौ साल पहले का हरियाणा परदे पर उतारने के लिए कल्पना, अनुमान तथा शोध के बिल्कुल सही अनुपात के प्रमाण पूरी फिल्म में उपस्थित हैं।
जिन गांवों में दिन भर धूल उड़ती हो वहाँ पीले और सफेद रंग में ज़्यादा फर्क़ नहीं होता -यह बात फिल्म के कॉस्ट्यूम डिजाइनर से लेकर आर्ट डायरेक्टर तक सबको अच्छी तरह याद है। फ़िल्मकार जानता है कि थोड़ी ज़्यादा तपी हुई सुराही भी फेंकने की बजाय मंदिरों में प्रयोग कर ली जाती है। फ़िल्मकार अनुमान लगा सका है कि मसान के लिए अलग से ज़मीन अलॉट नहीं की जाती होगी इसलिए गांव की ओर आने वाली पगडंडी के पास ही एक संटी पर टँकी उल्टी हांडी गांव में उपलब्ध सुविधाओं का पूरा चित्र प्रस्तुत करने में सफल हुई है। सार्वजानिक सभाओं के बैनर सफेद कपड़े पर नील से लिखकर ही तैयार किए गए हैं और चारपाई बाण की ही बुनी हुई है। बायोस्कोप के विषय में उस समय की धारणा; गलियों में बीन बजाते जोगी; पोषमपा, खो-खो और पिट्ठू गरम जैसे खेल, चौपाल पर हुक्का गुड़गुड़ाता बुढ़ापा, गालियों में हुड़दंग करते बच्चे और ऐसी दर्जनों बारीकियों ने परदे पर हरियाणवी संस्कृति को जीवंत कर दिया है। बर्तन से लेकर रपट वाली जूतियों तक, कहीं भी किसी चूक की गुंजाइश नहीं दिखाई देती।
ग्रामीण जीवन का दर्द भी मसखरा होता है -यह तथ्य रात मे पति को खाना खिलाती निर्धन गृहिणी के ठहाके में पूरी ताक़त के साथ गूँजता महसूस हुआ। ग़रीबी ने जिसकी बोली का रस सोख लिया था, वो माँ भी जब अपने पति को अपने मनमौजी बेटे से नरमी से पेश आने को कहती है तो दर्शकों की आह, सिसक कर पूरे हॉल को नम कर देती है। गूंगे बाबा तक की फूली हुई साँसें फिल्म की कहानी में बड़े सलीके से पिरो दी गई हैं। किसी शिष्य का गुरु के प्रति समर्पण दिखाने के लिए ‘लाठी’ का जो इस्तेमाल किया गया है, वह संवेदना यह स्पष्ट करती है कि पण्डित लखमीचंद जैसे दार्शनिक कवि पर फिल्म बनाने के लिए ‘दादा लखमी’ फिल्म का फ़िल्मकार पूरी तरह सक्षम है।
फिल्म में सांग का संगीत अपनी पूरी भव्यता के साथ उतरा है। उत्साह में अत्याधुनिक वाद्य प्रयोग करने से एक सच्ची कहानी भी, बनावटी लग सकती थी -शायद यही सोचकर संगीत तैयार करते समय कहानी के काल और स्थान का पूरा ध्यान रखा गया है। और हाँ, ताशे भी बजे हैं तो उनका रूप-रंग वही है, एकदम ओरिजिनल! जिस रागणी का जहाँ प्रयोग किया गया है, वो ठीक उसी जगह के लिए रची गई महसूस होती हैं।
यशपाल शर्मा ने ‘मर-मर के हार गए’ गीत में जो अभिनय किया है, वह मन को आश्चर्य से और आँखों को आँसुओं से भर गया। मेघना मलिक ने हरियाणवी माँ की भूमिका के साथ शत प्रतिशत न्याय किया है। राजेंद्र गुप्ता ने भी अपने अभिनय के अनुभव को अपने किरदार में सलीके से प्रयोग किया है। किशोर लखमी जब गुरु की आवाज़ से बंधकर खिंचा चला जाता है, उस सीन में गूंगे फकीर का बेलौस नाच मन को घुँघरू कर गया।
थापा, सोहन, बेबे, वैद्य, दीपचंद, राजाराम, फेंकू -हर कलाकार ने अपने किरदार को पूरी शिद्दत से निभाया है। संवेदना, हास्य और करुणा की दीवारों पर फकीरी का छप्पर डालकर उस ढाँचे को जुनून और दीवानगी के रंग में रंगकर यशपाल शर्मा ने उस घरौंदे पर एक तख्ती लटका दी है, जिस पर स्वर्ण अक्षरों में लिखा है- “दादा लखमी”!

✍️ चिराग़ जैन

ख़ास अनुभूतियों की आम अभिव्यक्ति : चिनिया के पापा

स्त्री मन की बेलाग अभिव्यक्ति का दस्तावेज है कवयित्री संध्या यादव का सद्य प्रकाशित काव्य संग्रह “चिनिया के पापा”। कुल 147 कविताओं का यह संग्रह मूलतः नारी की उन अनुभूतियों का बयान है जिनमें पीड़ादायी परिस्थितियों की स्वीकारोक्ति को वरीयता दी गई है।
इन कविताओं में कवयित्री न तो नारी मुक्ति आंदोलन की रवायत निभाते हुए पीड़ा से आज़ाद होने को छटपटाती दिखाई देती है न ही नियति के द्वारा किये जा रहे दुर्व्यवहार से व्यथित होकर भाग्य को कोसती नज़र आती है। मन की कचहरी में अपने अनुभव और चिंतन की गवाही दर्ज कराने भर का उपक्रम है यह काव्य संग्रह। यह ऐसे ही है ज्यों चोट लग जाने पर एक आह अनायास ही मुँह से निकल जाए; ज्यों छले जाने पर एक सिसकी अनायास ही आँखों से बह निकले। इसमें प्रयास करके आँसू बहाने के परिश्रम की गुंजाइश नहीं है। इसमें स्वयं को दीन-हीन दिखाने का पाखण्ड नहीं है। यही कारण है कि पीड़ा से व्यथित होने के बावजूद कवयित्री की लेखनी स्वाभिमानी तो होती दीख पड़ती है किंतु विद्रोही नहीं।
अपने उत्तरदायित्वों से विमुख होकर परदेस में विलसमग्न पति को चिट्ठी लिखते समय गिड़गिड़ाहट और दोषारोपण के स्थान पर स्वाभिमान से उत्पन्न कटाक्ष की भाषा इन कविताओं की विशेषता है। बलात्कार की शिकार किसी लड़की के साथ सामाजिक व्यवहार की विद्रूपता से पूर्व उसके परिवार के व्यवहार का नश्तर इन कविताओं की विशेषता है। ससुराल की प्रताड़ना के घिसे-पिटे जुमलों से हटकर पीहर के वीभत्स सत्य का शब्दांकन इन कविताओं की विशेषता है।
बहुओं पर हो रहे ज़ुल्म की हज़ारों कहानियां हम लिख-पढ़-सुन चुके हैं। बेटियों के अनकहे मन की आवाज़ भी बहुधा कविता की शक्ल में हमारे सामने से गुज़री है। किंतु ब्याहता बेटी के सम्मुख पीहर के भावनात्मक शोषण के कारण जो चुनौतियां उत्पन्न होती हैं उनकी प्रतिध्वनि संभवतः पहली बार इन कविताओं में आकर ले पाई है।
पुरुष की आकांक्षाओं में दिखाई देती ‘केवल’ दैहिक सुख की कामना से स्त्री मन पर जो खरोंचें पड़ती हैं उनको बयान करते समय कवयित्री साफ़गोई की चौखट तक तो कई बार गई है किंतु उसने कभी भी अश्लीलता के आंगन में प्रवेश नहीं किया। संबंधों पर से जब अपनत्व का मुलम्मा उतर जाता है तो उसके माथे पर कभी न पिघलने वाले कुछ बल पड़ जाते है। इन त्यौरियों को भी कवयित्री ने कई कविताओं में स्वीकारोक्ति के साथ स्वीकार किया है।
इस सबके बावजूद कवयित्री किसी भी सीमा तक जाकर संबंधों को निभाने की पक्षधर है। वह संबंध को बंधन घोषित कर उससे आज़ाद हो जाने की वकालत नहीं करती। वह मर्यादा की लक्ष्मण रेखा को स्त्री अस्मिता पर प्रश्नचिन्ह मानकर उसका उल्लंघन करने का प्रयास नहीं करती।
शिल्प पक्ष की बात करें तो बिल्कुल आम बोलचाल की शब्दावली के साथ सहज प्रतीकों का प्रयोग इन कविताओं में दिखाई देता है। गांधारी की आँखों पर बंधी पट्टी को पुरुष के अहंकार का प्रतीक बनाकर प्रस्तुत करने में भी संध्या हिचकती नहीं हैं और गूगल पर अपने अभीष्ट की सर्फिंग से भी उन्हें कोई परहेज नहीं है। रसोईघर की सामग्री से भी वे अपनी अभिव्यक्ति के बिम्ब खोज लेती हैं और पेड़, जड़, फूल, पत्तियों से भी अपनी कविताओं की क्यारी सजा लेने में दक्ष हैं। इन कविताओं में अपने हिस्से के आधे चांद को कूरियर से भेजने की कल्पनाशीलता भी है और पुरुषवादी मानसिकता के मन में पल रही कुंठाओं का सच भी है।
किताब के सफ़हे पलटते हुए पीड़ा की साफ़गोई से उत्पन्न नकारात्मकता पाठकों को विचलित कर सकती है किन्तु इस विचलन से भी मन की परतों के उघड़ने का रोमांच कहीं कम नहीं होता। इक्कीसवीं सदी की कामकाजी महिलाओं के सामान्य जीवन में सम्मिलित विशेषता को जानने के लिए यह काव्य संग्रह कारगर सिद्ध होगा।
पुस्तक के प्रारम्भ में कवयित्री का आत्मकथ्य और प्रदीप जैन जी की भूमिका के साथ सुरेन्द्र शर्मा की विश्लेषणात्मक टिप्पणी पाठकों को पुस्तक की मूल सामग्री से जुड़ने में सहयोगी सिद्ध होगी।
कवयित्री ने अनुरोध किया है कि पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर इस पुस्तक के पृष्ठ पलटे जाएं। पाठक यदि इस अनुरोध को स्वीकार कर सकेंगे तो निश्चित रूप से इन कविताओं का सेतु उन्हें रचनाकार की मनःस्थिति का पर्यटन कराएगा।

✍️ चिराग़ जैन

स्त्री तुम कल आना

स्त्री की सामाजिक स्थिति पर एक प्रभावी कटाक्ष है, अमर कौशिक निर्देशित फिल्म “स्त्री”। नारी मुक्ति के तमाम चलताऊ नारों और मोर्चों से हटकर पुरुषवादी समाज की सोच का शानदार चलचित्र है “स्त्री”।
हालांकि फिल्म का प्रचार एक हॉरर-कॉमेडी की तरह किया जा रहा है, और फ़िल्म में ये दोनों रंग बख़ूबी भरे भी गए हैं, लेकिन फिल्मकार ने चुपके से स्त्री की वर्तमान परिस्थितियों का संदेश भी इन रंगों में मिला दिया है।
फ़िल्म में नायक राजकुमार राव ने एक संवाद बोला है- “हमारा सामना एक ऐसी चुड़ैल से है जो पढ़ी-लिखी है, और आज्ञाकारी भी है। हम अपनी पर आ जाएं तो इससे जो चाहे करा सकते हैं।” बस यही संवाद स्त्री की सामाजिक स्थिति का संपूर्ण ग्रंथ है। स्त्री की स्थिति आज भी ठीक पहले जैसी ही है। बस अंतर आया है तो सिर्फ़ इतना कि पहले जब वह पढ़ी लिखी नहीं थी तो पुरुष उसे मार-पीट कर अपनी मनमानी करता था और आज जब वह पढ़-लिख गई है तो हम सभ्यता से दीवार पर लिख देते हैं- “ओ स्त्री कल आना”; बस इसे पढ़कर सदियों से आज्ञाकारी रही स्त्री कल का इंतज़ार करने लगती है, और पुरुष उसे टरका कर अपने जश्न में मशगूल हो जाता है।
फ़िल्म के एक दृश्य में चौकीदार रात में पहरा देते हुए पुरुष प्रधान समाज पर एक और तीखा प्रहार करते हुए आवाज़ लगाता है -“ओ स्त्री, मत आना! इस शहर में कोई मर्द नहीं है।” यह एक वाक्य समाज की अंतरात्मा को झखझोरने वाला वाक्य है। पुरुष को मर्दानगी के वास्तविक मआनी बताने वाला महामंत्र है यह वाक्य। स्त्री की अपेक्षाओं के समक्ष पुरुष की दुर्बलता का तमाचा है यह एक वाक्य।
फ़िल्म में श्रद्धा कपूर स्त्री सशक्तिकरण के अभियानों पर व्यंग्य करते हुए कहती है कि- “स्त्री अपने घर में बहुत शक्तिशाली होती है, उसे घर से बाहर लाओ, फिर मारो।” अद्भुत कटाक्ष है यह। समाज में नारी को उसकी भूमिका निर्वाह करने से रोककर उसे अर्थोपार्जन की मशीन बना देने के कुत्सित षड्यंत्रों पर कुठाराघात किया है इस संवाद ने।
स्त्री के स्त्रीत्व को भी फिल्मकार ने बख़ूबी समाहित किया है। “स्त्री की शक्ति उसकी चोटी में है, चोटी काट दो तो वह मरेगी नहीं लेकिन कुछ कर नहीं पाएगी।” यह वाक्य स्त्री से उसका स्त्रीत्व छीन लेने की कहानी कहता है।
स्त्री के मन को स्वर देते हुए फ़िल्म कहती है कि “आज तक इस शहर ने उसे दो चीज़ें नहीं दी, एक प्यार और दूसरी इज़्ज़त। वह इन्हीं दो चीज़ों की भूखी है।” यह बात समझ कर फिल्मकार ने पुनः एक करारा कटाक्ष करते हुए दिखाया कि पुरुषों ने एक इबारत लिखकर आज की पढ़ी-लिखी स्त्री से अपनी मनमानी करवा ली और लिखवा दिया “ओ स्त्री रक्षा करो”। यहाँ यह फ़िल्म समाप्त हो जाती है क्योंकि समाज आश्वस्त है कि इस वाक्य को पढ़कर स्त्री समाज की रक्षा करने लगेगी।
फ़िल्म के निर्माता की सोच को प्रणाम करने का दिल करता है। साथ ही दर्शकों की समझ पर मन भर आता है कि जिन संवादों का ज़िक्र मैंने ऊपर किया था उन सब पर हॉल में ठहाके गूंज रहे थे।

✍️ चिराग़ जैन

संजू

आरोप को अपराध मानकर किसी के प्रति राय क़ायम कर लेने की हमारी सामान्य प्रवृत्ति किसी के जीवन को किस हद्द तक चुनौतियों से बेन्ध सकती है -इसी तथ्य की प्रामाणिक कथा है संजू। मीडिया इसी प्रवृत्ति का लाभ उठाकर जनमानस की मानसिक लतों का पोषण करता हुआ अपना गुजर-बसर कर रहा है।
हम कुछ परंपरागत अफवाहों को सच मानते हुए अपनी कई पीढ़ियाँ बर्बाद कर चुके हैं। अफवाहों के इसी हवनकुण्ड में कई महत्वपूर्ण जिंदगियां स्वाहा करने में हम कभी हिचकते भी नहीं हैं। संजय दत्त ऐसे ही हवन कुंड में भस्म हुई एक ऐसी प्रतिभा का नाम है जिसने उतार-चढ़ाव के अनेक आश्चर्यजनक दौर जिये।
संजू फ़िल्म हर उस ख़बर पर एक प्रश्नचिन्ह है जिसने डेढ़ मिनिट की सनसनी के चक्कर में एक मुकम्मल ज़िन्दगी तबाह कर डाली। सामाजिक जीवन जीने वालों के व्यक्तिगत चरित्र की पड़ताल करना और उसके विषय में कहानियों की फसलें बोने में हमे बड़ा मजा आता है। आश्चर्य यह है कि किसी पर आरोप लगाकर उसकी चरित्र-हत्या करने वाला मीडिया आज तक कभी किसी की ज़िंदगी बर्बाद करने के बाद क्षमायाचना करने भी प्रकट न हो सका।
अदालतों में चल रही सुनवाई को दरकिनार कर फैसले सुनाने वाले मीडिया की घिनौनी तस्वीर का पर्दाफाश किया गया है इस फ़िल्म ने। फ़िल्म को देखकर संजय दत्त के प्रति संवेदना जन्मती है और सुनील दत्त के प्रति सम्मान। चुनौतियों से जूझने की प्रवृत्ति और कभी न थकने का जज़्बा उनके व्यक्तित्व का वह पक्ष था जिसे अब से पहले न तो किसी न्यूज़ चैनल ने स्पेशल स्टोरी बनाकर दिखाया था न ही किसी गॉसिप मैगज़ीन ने। कमलेश उर्फ परेश जैसे किसी दोस्त का रिश्ता संजय दत्त की किस्मत से ईर्ष्या उत्पन्न करता है।
मज़े की बात यह है कि संजय दत्त के रोम-रोम पर नज़र रखने वाली मीडिया को उनके इस साए का कभी आभास न हुआ। ड्रग पेडलर्स कैसे काम करते हैं और बचपन पर अधिक अनुशासन कैसा असर डालता है -इन दोनों सवालों को बहुत करीने से फ़िल्म में पेश किया गया है। सिल्क स्मिता के बाद सम्भवतः पहली बार किसी भारतीय सिने स्टार की बायोपिक बनी है। बदनाम ज़िन्दगियों के अनकहे पहलुओं को उजागर करती ये दोनों ही फिल्में यह तो सिद्ध करती हैं कि अखबारों के समझाने पर जिसे हम बुरा आदमी कहकर छोड़ देते हैं उसके भीतर भी काफ़ी कुछ अच्छा छुपा होता है जिसे देखने के लिए उसके साथ कुछ वक़्त बिताने की दरकार होती है।

✍️ चिराग़ जैन

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