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दादा लखमी : एक जीवन जो सांग बन गया

‘ये नाचणिये-गावणिये बावळे ही होवे सै।’ -फिल्म में यह संवाद दो बार प्रयोग किया गया और दोनों बार सिनेमा हॉल में ठहाका गूंज गया। लेकिन फ़िल्मकार ने यह संवाद चुटकुले की तरह नहीं बल्कि फलसफे की तरह प्रयोग किया है। यह फ़िल्मकार का कौशल है कि इससे फूटने वाले...

सीता की पाती

मुझको तो वन में रहने का काफ़ी है अभ्यास सुनो! लेकिन तुमने दे डाला है ख़़ुद को कितना त्रास सुनो! तुमने त्याग दिया है मुझको, पर मुझमें बाक़ी हो तुम मैं तुमको संग ले आयी हूँ, कितने एकाकी हो तुम मुझको बस वनवास दिया है, ख़़ुद को कारावास सुनो! मुझको तो वन में रहने का काफ़ी है...

कविता सुनने की तमीज़

शेर कहने का सलीक़ा तो ज़रूरी है मगर शेर सुनने के भी आदाब हुआ करते हैं कविता सुनने वाले अगर कविता की हर पंक्ति से प्रस्फुटित रश्मियों के पीछे दौड़कर अर्थ के असंख्य बिम्ब देख पाएं तो कविता-पाठ करने वाले को आनंद आ जाता है। कवि की भावभूमि का पर्यटन यदि श्रोता न कर पाए, तो...

याद का गीत

याद ने इक रेशमी-सा जाल फिर फैला लिया है मन ज़रूरी काम सारे छोड़कर है गुम याद फिर से आ रही हो तुम त्यौरियां चिन्ताओं का बोझा सम्भाले फिर रही हैं चेतना बरसों पुराने हर्ष में उलझी हुई है हाथ में तो ढेर सारे काम हैं आधे-अधूरे उंगलियाँ केवल तुम्हारे स्पर्श में उलझी हुई हैं...

देह और प्राण

देह के कष्ट से जिनको परहेज है प्राण का सुख उन्हें मिल सकेगा नहीं संकुचित ही रहेगी अगर पाँखुरी कोई गुल बाग में खिल सकेगा नहीं सत्य है, जो खिले वो सभी एक दिन पत्ती-पत्ती चमन में बिखर जाएंगे पर बिखरने के डर से जिन्होंने सुमन बंद करके रखा वो भी मर जाएंगे प्रेम पिंजरा अगर...
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