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ढाक के तीन पात

आवेग बीत चुका है। भारतीय मानस में सुलग रहे शोलों पर रोज़मर्रा की ज़रूरतों के छींटें पड़ चुके हैं। मीडिया अगली बड़ी ख़बर आने तक पुलवामा को ब्रेकिंग न्यूज़ बनाए रखने के लिए विवश है। इसी कारण भारतीय गाली-गलौज से निचुड़ने वाली सारी टीआरपी बटोरने के बाद अब हमें पाकिस्तानी गालियाँ सुनवाई जा रही हैं। इमरान खान के बयान पर हर चैनल चर्चा कर रहा है। और हर चर्चा के अंत में एंकर भारतीय शौर्य की कोटिंग करके इमरान का प्रचार करने के पाप से मुक्ति पा रहा है। राजनैतिक पार्टियां अपने स्वभाव के अनुसार पुनः आरोप-प्रत्यारोप, छीछालेदर, गठबंधन, चरित्र हत्या, जोड़-तोड़, दल-बदल, रैली, भाषण और वोट-मैनेजमेंट जैसे महत्वपूर्ण कार्यों की ओर उन्मुख हो चुकी हैं। इन सबसे फ़ुर्सत पाकर बीच-बीच में “बदला लिया जाएगा” जैसे जुमले बोलकर यह भी जताया जा रहा है कि “न भूलेंगे न मुआफ़ करेंगे” हमें याद है। इससे भावुक देशभक्तों की वोट पक्की होती है। अनिल अंबानी से सुप्रीम कोर्ट ने कुछ करने को कहा है। और बात न मानने पर कारावास की चेतावनी भी दी है। किंतु हमारी मीडिया इतनी संवेदनशील है कि इस ख़बर को कुछ सेकेण्ड के लिए ही चलाया गया। क्योंकि मीडिया जानती है कि किसी मुआमले में फैसला आने से पहले आरोपी को अपराधी नहीं माना जा सकता। मीडिया यह भी जानती है कि न्यायालय अम्बानी जी को सज़ा बाद में देगा लेकिन अम्बानी सर की नेगेटिव न्यूज़ चलाने की सज़ा मीडिया को ज़रूर मिल जाएगी। सरकारी दफ्तर, बसें, नुक्कड़ और चौपालें अभी भी दो गुटों में बँटे हुए विश्वयुद्ध लड़ रहे हैं। एक गुट का मानना है कि मोदी जी कोई भगवान टाइप की आइटम हैं जो नोटबंदी की तरह एक दिन अचानक टीवी पर आकर बताएंगे कि हमारा पड़ोसी पाकिस्तान अब हमारे बीच नहीं रहा। दूसरे गुट की विचारधारा अधिक ड्यूरेबल है। उनकी हमेशा यही मान्यता रही है कि सब साले चोर हैं, सबको अपनी कुर्सी की चिंता है, देश की किसी को कोई फिक्र नहीं है। एक तीसरा पक्ष भी है, जिसे हम निर्गुट मानते हैं। उसका मानना है कि भैया हमें तो हड्डे कटाकर पेट भरना है, न कांग्रेस कुछ देगी न भाजपा। स्कूलों में लड़के रात के बुलेटिन और व्हाट्सएप्प से प्राप्त ज्ञान को इस आत्मविश्वास के साथ बाकी जमघट को सुनाते हैं जैसे रात भर मोदी जी के साथ भारतीय सेना के शस्त्रागार का मुआयना करके लौटे हों। राजनैतिक दलों की “वानर सेनाएँ” किसी कश्मीरी को पीट कर, किसी जगह पुतले जलाकर, किसी जगह देशभक्ति का अभिनय करके अपने ऊपर होने वाले ख़र्चे को जस्टिफाई कर रही हैं। सोशल मीडिया पर अफवाहें अभी भी फैलाई जा रही हैं। फोटोशॉप सेना अभी भी सक्रिय है। पुलवामा के सैनिकों की चिताओं से फूल चुने जा चुके हैं, अब राजनीति उस राख में से वोट चुनने का प्रयास कर रही है। जिन परिवारों के बेटे वीरगति को प्राप्त हो गए अब राजनैतिक अनदेखी के कारण वे परिवार भी दुर्गति को प्राप्त होने जा रहे हैं। भारत सरकार ने “सदा-ए-सरहद” (दिल्ली-लाहौर बस सेवा) को बंद कर दिया है ताकि सरहद के जवानों की चीख़-पुकार देश को विह्वल न करे। लेकिन “समझौता एक्सप्रेस” (अटारी-लाहौर रेल सेवा) को जारी रखा है ताकि आवश्यक कामकाज होता रहे। 1947 से अब तक ऐसे तनावग्रस्त अवसर कई बार आए हैं जब दोनों ही मुल्कों की आम जनता का खून खौला है। यही सब गाली-गलौज, प्रतिबंध, आक्रोश, बयानबाज़ी हर बार होती है और फिर कुछ दिन बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है। दोनों ही देशों की जनता को यह नहीं मालूम कि जब भी तनाव बढ़ता है तब सिर्फ क्रिकेट का खेल बन्द किया जाता है, सियासत का नहीं।

✍️ चिराग़ जैन

पुलवामा

तैने सोता शेर जगाया है
अब तू ख़ैर मनाइयो
पूरा भारत देश रुलाया है
अब तू ख़ैर मनाइयो

लड़ने के हालात नहीं थे
राही थे, तैनात नहीं थे
मौत उन्हें छू पाई क्योंकि
बंदूकों पर हाथ नहीं थे
उनको धोखे से मरवाया है
अब तू ख़ैर मनाइयो

अब तू देख, उपद्रव होगा
आग उगलता भैरव होगा
अब तक विष पीते आए हैं
अब छाती पर तांडव होगा
तैने तीजा नेत्र खुलाया है
अब तू ख़ैर मनाइयो

रग-रग में ज्वाला भड़की है
जन-जन की बाजू फड़की है
आँसू ने शोले उगले हैं
आँखों मे बिजली कड़की है
तैने अपना काल बुलाया है
अब तू ख़ैर मनाइयो

✍️ चिराग़ जैन

पुलवामा

आँसू भेजे हैं घाटी ने
चिथड़े बीने हैं माटी ने
फिर धोखे से घात किया है
कायरता की परिपाटी ने
अब पापी मतलब समझेगा, धोखे के परिणाम का
अंतिम पन्ना हम लिखेंगे, इस भीषण संग्राम का

छल का शीश नहीं कट पाया, तो यह रण आश्वस्त न होगा
जब तक न्याय नहीं हो जाता, तब तक सूरज अस्त न होगा
युग-युग का इतिहास खँगालो, पाप पराजित होता आया
लंका जलनी है रावण की, राघव का घर ध्वस्त न होगा
वीरों के तूणीर खुलेंगे
सोए शर ज्वाला उगलेंगे
दुःशासन का लोहू लेकर
पांचाली के केश धुलेंगे
तुमने मार्ग स्वयं खोला है, अपने पूर्णविराम का
अंतिम पन्ना हम लिखेंगे, इस भीषण संग्राम का

अनुनय की भाषा को शठ ने, रघुवर की दुर्बलता जाना
शिशुपालों ने मधुसूदन में, अपना काल नहीं पहचाना
इतने अवसर मिलने पर भी, हिंसा का पथ छोड़ न पाए
आदत से लाचार हुए हो, ज्यों कोढ़ी का कोढ़ खुजाना
फिर मस्तक पर बल उभरे हैं
कृष्ण सुदर्शन धार खड़े हैं
फिर अर्जुन के नैन झरे हैं
फिर से सारे घाव हरे हैं
फिर से बिलख-बिलख कर रोया, मंदिर अक्षरधाम का
अंतिम पन्ना हम लिखेंगे, इस भीषण संग्राम का

✍️ चिराग़ जैन

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