Article, Chirag Jain Writings, Kohra Ghanaa Hai, Prose
20 जुलाई 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ, वह भारतीय लोकतंत्र की मनोदशा का वास्तविक चित्र प्रस्तुत करता है। जून 2026 में आरंभ हुए कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन को जनता का कितना समर्थन मिला, कितना नहीं मिला -यह सही-सही कह पाना तो मेरे लिए संभव नहीं है। किन्तु सोनम वांगचुक को धरनास्थल से उठाए जाने की घटना ने जनता को कितना उद्वेलित किया, यह पूरी दुनिया ने साफ-साफ देखा।
जिस युवापीढ़ी में लोकप्रिय होने की होड़, पूरी दुनिया की राजनीति का प्रमुख लक्ष्य बन चुका है, उसी युवापीढ़ी की आवाज़ को अनसुना करने की भूल राजनीति को नहीं करनी चाहिए थी। स्कूल-कॉलेजों में पढ़नेवाली जिन ऊर्जारश्मियों के बूते देश की आंखों में भविष्य के स्वप्न झिलमिलाते हैं, उन्हीं पर आंसूगैस के गोले छोड़ते समय प्रशासन की कोरें भीग जानी चाहिए थीं।
जिन सुकोमल पीढ़ियों को पोषित करके देश को अपने बुढ़ापे की लाठी तैयार करनी थी, उन्हीं पर लाठीचार्ज करते हुए प्रशासन की टांगें कांप जानी चाहिए थीं।
सोशल मीडिया के वीडियो गवाह हैं कि जब नीली वर्दीधारी पांच-छह सशस्त्र जवान अभद्रभाषा बोलते हुए एक अकेले नौजवान पर बलप्रयोग कर रहे थे, तब उस नौजवान ने प्रतिहिंसा नहीं की। उल्टे उसने गांधी की राह पकड़ी और सचमुच दूसरा गाल आगे करके उन लाठी बरसानेवालों को शर्मिंदा कर दिया। यह दृश्य गवाह है कि गांधी इस देश की शिराओं में आज भी ज़िन्दा हैं।
20 जुलाई 2026 के तमाम दृश्यों को आप ध्यान से देखेंगे तो आपको पुलिस की आंखों में आंखें डालकर चुनौती देते हुए ‘भगतसिंह’ दिखाई देंगे। 20 जुलाई 2026 के वीडियो दोबारा खंगालेंगे तो आपको वह भारत फिर से दिखाई देगा, जो किसी भी तरह के अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना अपना नैतिक कर्तव्य समझता है।
20 जुलाई 2026 को क्नॉट प्लेस की सड़कों ने लाला लाजपतराय को भी याद किया और बटुकेश्वर दत्त को भी। चीत्कार के स्वर में पुलिसवालों को लताड़ती लक्ष्मीबाई भी दिखीं। ‘हम क्या आपके बच्चे नहीं हैं’ -बिलखकर ऐसे मासूम प्रश्नों से पुलिस की वर्दी में खड़ी महिलाओं को नज़रें छुपाने पर विवश करती बेटियां भी दिखीं।
दुनिया ने चाहे जो कुछ देखा हो, लेकिन बर्बर प्रशासनिक आदेशों का पालन करने पर विवश पुलिसकर्मियों के चेहरे पर अनेक बार मुझे मनुष्यता के पदचिन्ह दिखे।
20 जुलाई 2026 का प्रदर्शन देश के लिए इन अर्थों में भी विशेष था कि इसमें आनेवाले किसी भी ‘स्टार’को कल अपने-आपको अपनी ख़ुद की नज़रों में स्टार बनाए रखने के लिए उन हज़ारों-लाखों ‘ट्विंकल लिटिल स्टारों’ की ज़रूरत थी, जो जंतर-मंतर पर पुलिस की लाठियां और झिड़कियां खा रहे थे।
20 जुलाई 2026 का प्रदर्शन मेरे लिए इसलिए पूर्ण सफल है कि युवा पीढ़ी का नाम आते ही अराजकता की आशंका जतानेवाले प्रशासन के पास कल इस पीढ़ी को अराजक सिद्ध करने का कोई उपाय न मिल सका। न कोई नेता, न कोई संगठन, न कोई स्पांसर, न कोई व्यवस्था… केवल एक जुनून। केवल एक जज़्बा। केवल एक अपनत्व। केवल एक देश।
जब-जब सत्ता ने विरोध के स्वर को दुश्मन मानने की भूल की है, तब-तब जनता को सड़क की राह पकड़नी पड़ी है। मैं इस देश का एक नागरिक होने के नाते अपनी विधायिका से यह अनुरोध करना चाहूंगा कि यह जनता आपको प्यार करती है, इसीलिए अपने भविष्य का नियामन आपके हाथों में सौंपकर निश्चिंत होना चाहती है। सब जानते हैं कि ये देश बहुत बड़ा है। सब जानते हैं कि डेढ़ सौ करोड़ लोगों के भविष्य की नीतियां बनाने में आपसे कुछ चूक हो सकती है।
इस चूक की ओर ध्यान आकृष्ट करने के जनप्रयासों को कान देकर सुनने की ज़रूरत है। विरोध के स्वर कर्कश ज़रूर होते हैं लेकिन उनके अंत से सौहार्द और समर्थन का महानाद खोज लेनेवाला ही महानायक होता है।
✍️ चिराग़ जैन
Article, Chirag Jain Writings, Prose, Seriously Funny
चूंकि हमें लीक पर चलना अच्छा नहीं लगता, इसलिए हम पेपर लीक कराने में कीर्तिमान बनाने लगे हैं। हम उस सिस्टम के ख़िलाफ़ हैं, जिसमें परीक्षाओं की घोषणा होते ही विद्यार्थियों की नींद उड़ जाए और अध्यापक तथा अधिकारी मज़े की नींद सोते रहें।
हमने अनवरत मेहनत और लगन से एक ऐसी व्यवस्था तैयार की है जिसमें परीक्षा की तिथि घोषित होते ही अधिकारी जागने लगते हैं। कुछ अधिकारी इस चिंता में जागते हैं कि कहीं पेपर लीक न हो जाएं। और कुछ अधिकारी इस जुगाड़ में जागते हैं कि पेपर लीक हो जाए।
जैसे ‘रस्सी के आने-जाने से सिल पर निशान पड़ जाते हैं’ वैसे ही हमारे विद्यार्थियों को भी व्यवस्था ने यह विश्वास दिलाया है कि परीक्षा हो या न हो, पेपर ज़रूर लीक होगा। मानसून के आने में देरी हो सकती है, गर्मी-सर्दी-बरसात के शिड्यूल में परिवर्तन हो सकता है। लेकिन पेपर के लीक होने का मौसम किसी सूरत नहीं टल सकता। परीक्षा टल सकती है पर लीकेज नहीं टलेगी।
परीक्षा घोषित होते ही परीक्षार्थियों में शर्त लगती है, ‘बताओ पेपर ठीक होगा या लीक होगा?’ सट्टा बाज़ार में ‘ठीक होगा’ मुफ़्त में भी कोई दांव नहीं लगा रहा है और ‘लीक होगा’ के दांव की कीमत आसमान छूने लगी है।
हमें याद है, हमारे समय में परीक्षाएं किसी युद्ध से कम नहीं होती थीं। परीक्षा की तैयारियों के लिए छात्र-छात्राएं अपने घर-परिवार के ब्याह-शादियों का मोह छोड़कर मन-मसोसकर किताबों से चिपके रहते थे। सड़ी गर्मी में दूर-दूर पड़नेवाले परीक्षा केन्द्रों पर जैसे-तैसे पहुंचते थे। और उसके बाद परीक्षा केन्द्र पर इतनी सघन चैकिंग होती थी, मानो पूरी दुनिया के राष्ट्राध्यक्ष हमारे परीक्षा केन्द्र में घुसे बैठे हों। जेब से चूरण की पुड़िया तक निकलवा ली जाती थी।
इतनी सघन सुरक्षा के बीच पेपर लीक करानेवाले धुरंधरों को अंडरकवर एजेंट बनाकर पाकिस्तान भेज देना चाहिए। ये लोग देश की धरोहर हैं। इनकी प्रतिभा का सही उपयोग करने की ज़रूरत है।
पूरी धरती को काग़ज़ बनाकर, सातों समुद्रों को स्याही बना लिया जाए तो भी इन हुनरमंद लोगों के हुनर का बखान करना मुमकिन नहीं होगा। इसलिए मैं आजकल सीधे मोबाइल पर टाइप करने लगा हूं। कौन काग़ज़ और स्याही का टंटा पाले।
डिजिटल क्रांति से याद आया। हमारे यहां परीक्षा का फॉर्म भरते समय वेबसाइटों का सर्वर हांफने लगता है। तीन घंटे की फिल्म सवा दो मिनिट में डाउनलोड करनेवाले वाईफाई को भी दो पेज का फॉर्म भरने में तीन बार हार्टअटैक आ जाता है। पेमेंट गेटवे की कुशलता ऐसी है कि पेमेंट कटने के बाद नेटवर्क प्रॉब्लम उत्पन्न होती है और ट्रांज़िक्शन फेल हो जाती है। फिर कैप्चा कोड डालकर यह सिद्ध करना होता है कि हम रोबोट नहीं हैं।
फॉर्म भरने का किला फ़तह करने के बाद परीक्षार्थी फिंगर क्रॉस करके भगवान से मनाते हैं कि हे भगवान इस बार पेपर लीक न हो। परीक्षा करानेवाली एजेंसियां पेपर को किसी अनजान टापू पर किसी अंधेरी गुफ़ा में रखकर निश्चिंत हो जाती हैं। लेकिन परीक्षा के एक दिन पहले ही यह गोपनीय दस्तावेज, व्हाट्सएप्प पर फ्री डिलीवरी की तरह विचरण करने लगता है।
जिस देश में दूध की डिलीवरी फेल हो जाती है। रिटेल एप्लीकेशन्स की डिलीवरी लेट हो जाती है। लेकिन ‘पेपर लीक वॉरियर्स’ समय के इतने पाबन्द हैं कि आंधी आए या तूफ़ान इनके नेटवर्क कभी फेल नहीं होते। इसे कहते हैं डिजिटल क्रांति का सही उपयोग।
पेपर लीक होने के बाद जांच समितियों का गठन होता है। प्रभावित छात्र-छात्राएं बिलखते हुए प्रदर्शन करते हैं। अखबारों में बेरोज़गारी के आंकड़े छापे जाते हैं। टेलीविज़न पर बहस होती हैं कि कांग्रेस के शासन में ज़्यादा पेपर लीक हुए या भाजपा के ज़माने में। शोर-शराबा होता है। हंगामा मचने लगता है। लेकिन हमारी योग्य जांच समितियां बड़े सलीके से इस हंगामे को ठण्डे बस्ते में डाल देती हैं।
कुछ दिनों में परीक्षा में पूछे जानेवाले प्रश्न बदलने लगेंगे।
प्रश्न 1. वर्ष 2025 मे कुल कितने राज्यों में पेपर लीक हो पाया?
प्रश्न 2. यदि एक पेपर 10 लाख रुपये में लीक हुआ है, तो नीचेवाले बिचौलियों और उपरवाले साहबों के कमीशन के बाद मुख्य कर्मवीर को कितना मुनाफ़ा होगा?
प्रश्न 3. क्या महाभारत काल में पितामह भीष्म ने अर्जुन को अपनी मृत्यु का रहस्य बताकर पेपरलीक की महान परंपरा का प्रादुर्भाव किया था?
प्रश्न 4. जब पेपरलीक की प्रक्रिया कुछ दिनों में सम्पन्न हो जाती है, तो इसके दोषियों को सज़ा मिलने में दस-बीस साल क्यों लग जाते हैं?
वह दिन दूर नहीं जब परीक्षा की तैयारी करते परीक्षार्थी से उसका बेटा कहेगा, ‘इतनी टेंशन न लो यार पापा, भरोसा रखो, इस बार फिर पेपर लीक होगा।’
चिराग़ जैन
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जो समाज अपनी भाषा के प्रति लापरवाह होता है, उसके हाथों से उसकी संस्कृति फिसल जाती है। भारत में, वह भी उत्तर भारत में, उस पर भी उत्तर प्रदेश में हिंदी भाषा की परीक्षा के परिणाम आश्चर्य से अधिक क्षोभ से भर देते हैं।
राष्ट्रवाद और भारतीय संस्कृति की महानता का ढोल पीटने वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी तो आशा जगी कि अब संस्कृत और हिंदी भाषा का उद्धार हो जाएगा। लेकिन इसी सरकार के कार्यकाल में संस्कृत की पढ़ाई के औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लग गए। विश्विद्यालयों में हिंदी भाषा और संस्कृत भाषा की स्थिति दयनीय हो गई।
कलाओं के संवर्द्धन के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक पूरा प्रकल्प ‘संस्कार भारती’ के नाम से चलता है। इस प्रकल्प की स्थापना के पीछे भी यही सोच थी कि कविता, नृत्य, संगीत और लोककलाओं की इम्यूनिटी बढ़ाई जाए तो सांस्कृतिक प्रदूषण से देश की सेहत बची रहेगी। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य पुरस्कारों की सूची में से कविता और साहित्य को बाहर करने में मिनिट नहीं लगाया। सूर, तुलसी, निराला, प्रसाद, महादेवी, बच्चन जैसे कवियों का उत्तर प्रदेश कवियों को सम्मानित करने से पल्ला झाड़ गया।
वामपंथी सरकार में हों तो उनका भारतीय कलाओं और भारतीय संस्कृति से विशेष वैर है ही। कविता के नाम पर जो कुछ वे पढ़ाते हैं उससे अच्छे-ख़ासे कवियों का मोहभंग हो जाए। हाँ, मानवतावाद का उनका दृष्टिकोण स्तुत्य है किंतु वे उस समस्या के दूसरे चरम पर खड़े हो जाते हैं, जिसके एक छोर पर राष्ट्रवाद खड़ा है।
वामपंथियों की सत्ता विश्विद्यालयों में रही तो उन्होंने लालित्य से हीन भाषा और संस्कृति से हीन कलाओं को थोपकर भाषा और कलाओं का बेड़ा गर्क किया। समाजवादियों और सेक्यूलरों के पास भी राजनीति की व्यस्तताएँ इतनी अधिक हैं कि इन्होंने भी भाषा और शिक्षा के प्रति कोई विशेष गंभीरता नहीं दिखाई, लेकिन इन दोनों ने शिक्षा में भाषा की स्थिति को दयनीय बनाने का भी कोई उपक्रम नहीं किया। अब ये आए तो इन्होंने स्वयं को इतना महान मान लिया कि मीरा, सूर, कबीर को पाठ्यक्रम से नदारद करने में भी संकोच नहीं किया क्योंकि उन पृष्ठों पर विचारधारा को पोषित करनेवाली सामग्री प्रकाशित करनी आवश्यक लगी होगी।
जिस ज़मीन को कविता की जुताई नसीब न हो, उस पर न तो संस्कार बोए जा सकते हैं, न ही संस्कृति। एक समय में उत्तर प्रदेश का हिंदी पाठ्यक्रम सर्वश्रेष्ठ होता था। डॉ मुरली मनोहर जोशी ने विज्ञान का शोध हिंदी भाषा में इसी प्रदेश से किया। यहाँ की बोलियों का लालित्य, यहाँ की भाषा, यहाँ का उच्चारण, यहाँ का लोक साहित्य… यह सब छिन गया तो संस्कृति का नाम संग्रहालयों में भी नहीं मिलेगा।
विचारधाराओं के इस नाटक में भाषाएँ नेपथ्य में जा रही हैं और कलाएँ बेचारगी के साथ कोने में पड़ी कुम्हला रही हैं। कलाकार का नाम जानने से पहले उसकी वैचारिक जाति पूछी जाती है। कविताओं से उनका गोत्र और सहित्य से उसका आधार कार्ड मांगा जा रहा है। विमर्शों की महामारी से ग्रस्त हिंदी साहित्य पहले ही जर्जर हुआ जाता है, ऐसे में प्रतिभा से उसकी जाति पूछकर सरकारी तंत्र करेले की बेल को नीम पर चढ़ाने का काम कर रहा है। इन हालों आप समाज से उसकी भाषा छीन लेंगे, और गूंगा समाज अपने नेताओं के जयकारे भी नहीं लगा पाता।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Diary, Ek Adad Kirdar, Prose
जब हम शिक्षा ग्रहण कर रहे होते हैं, तब शिक्षकों का ख़ूब उपहास करते हैं। कोई ऐसा शिक्षित न मिलेगा जिसने अपने शिक्षकों के विकृत नामकरण न किये हों। किन्तु जब हम संघर्ष की वीथियों पर चलते हैं, तब उन्हीं शिक्षकों के सामान्य व्यवहार में उच्चरित वाक्य हमारी समस्याओं का समाधान बन जाते हैं। यही कारण है कि उद्दण्ड से उद्दण्ड बालक भी जब परिपक्व होता है तो उसके हृदय में अपने शिक्षकों के प्रति सम्मान अवश्य उपजता है।
मुझे अपने शिक्षकों से अपार दुलार मिला। अनेक शिक्षक ऐसे रहे जो मित्र बनकर मेरे जीवन के अभिन्न अंग बन गए। मेरे समवयस्कों में मेरे मित्र बहुत कम रहे, इसीलिए मुझे अपनी आयु से दस-बीस-तीस वर्ष अधिक के मित्र भरपूर मिले।
मैंने नवमीं कक्षा में दरियागंज के जैन स्कूल में प्रवेश लिया। वहाँ मुझे ऐसे-ऐसे शिक्षक मिले जिनके स्नेह और आचरण ने मेरे चरित्र का निर्माण किया। संस्कृत के अध्यापक आचार्य गिरीश पुरी गोस्वामी जी से मैंने भाषा का संस्कार और कठिन परिस्थितियों में संयत रहने का गुण सीखा। वे शब्दों के अपव्यय के विरोधी हैं, इसीलिए सही जगह पर बिल्कुल सही शब्द प्रयोग करना उन्होंने मुझे अपने आचरण से सिखा दिया। हिन्दी के अध्यापक श्री राजबल्लभ पचौरी के साथ मेरी घनिष्ठता सबको पता थी। वाद-विवाद से लेकर काव्यपाठ और भाषण तक जिस भी प्रतियोगिता में जाना हो, मुझे उसकी अनुमति में कभी कोई संकट नहीं आया क्योंकि पचौरी सर की ओर से मुझे अभय प्राप्त था।
मेरे क्लास टीचर भी मुझे ‘पचौरी जी का चेला’ कहते हुए खीझते हुए ही सही, लेकिन अनुमति दे ही देते थे। संगीत के अध्यापक श्री चन्द्रकान्त पाटणकर जी का मैं अधिकृत स्टूडेंट नहीं था किंतु ‘लोकोच्चार प्रतियोगिता’ के लिए उनकी जान खाने का अधिकार मुझे उन्होंने सहर्ष प्रदान किया था। एक हमारे अध्यापक थे श्री जी एस अग्रवाल। वे हमें भूगोल और इतिहास पढ़ाते थे। उन्होंने कभी किसी विद्यार्थी को डाँटा नहीं, लेकिन यदि किसी लड़के के प्रति उन्होंने खिन्नता प्रकट भी कर दी तो इससे फ़र्क़ पड़ता था। वे अपने शिक्षार्थियों के प्रति बेहद सजग थे। वे हमारे एक ऐसे अध्यापक थे, जो पाठ्यक्रम रटाते नहीं, बल्कि सिखाते थे। एक बहुत ग़ुस्सेवाले अध्यापक थे श्री वी एस राही। उनकी दहशत पूरे स्कूल के लड़कों को थी, लेकिन जब स्कूल से निवृत्त हुआ तो समझ आया कि उनकी सख़्ती ने हमारे जीवन में अनुशासन के ऐसे बीज बो दिए जिन पर पल्लवित आदतें हमारी सफलता की प्रशस्ति बन गई। इसी विद्यालय के परिसर में श्री राजकुमार चिटकारा से कम बोलकर ज़्यादा करने का गुण ग्रहण किया; श्रीमती अलका गुप्ता और श्रीमती अंजू रगता से अपने कार्य के अतिरिक्त अन्य विषयों में ऊर्जा नष्ट न करने का व्यवहार सीखा; श्री राजेश जैन और श्री पी दास से अपने विषय में पारंगत होने का महत्व समझा।
उपप्राचार्य श्री एस सी रस्तोगी से कुशल नेतृत्व की क्षमताएँ और प्राचार्य डॉ बी डी जैन से प्रबंधन की परिवक्वता हासिल की। विद्यालयों में जीवन भर श्रेष्ठ नागरिक तैयार करनेवाले इन अध्यापकों का आभार व्यक्त तो नहीं किया जा सकता, किन्तु आज अपने व्यक्तित्व की परतों का अन्वेषण करता हूँ तो अपने एक-एक शिक्षक को अपने व्यवहार की एक-एक परत में जीवित पाता हूँ।
स्कूल से निकलकर कॉलेज में गया तो वहाँ अनेक शिक्षक ऐसे मिले जिन्होंने व्यक्तित्व के रॉ फ्लैट को डेकोरेट करके शानदार बना दिया। मैं कभी नहीं भूल सकता कि वर्ष 2004 में मुझे ‘जनसंचार के सिद्धांत’ पढ़ानेवाली अतिथि प्रवक्ता श्रीमती ऋतु नानन पाण्डेय को जब यह पता चला कि मैं एक कवि सम्मेलन के लिए बेल्जियम पहुँच रहा हूँ, तो वे नीदरलैंड से अपने परिवार के साथ मुझसे मिलने बेल्जियम आ पहुँची। कवि सम्मेलन करके जब मैं होटल पहुँचा तो पता चला कि एक फैमिली पिछले 2 घण्टे से रिसेप्शन पर बैठी मेरी प्रतीक्षा कर रही है। इस घटना ने मुझे एक बार फिर सिखाया कि विनम्रता किसे कहते हैं।
एक और अतिथि प्रवक्ता डॉ संध्या गर्ग ने जीवन में मातृत्व की भूमिका अदा की। आज भी जीवन की हर चुनौती में उनके मार्गदर्शन से समाधान खोज ही लेता हूँ। आज शिक्षक दिवस के अवसर पर मैं अपने सभी शिक्षकों का आभार व्यक्त करता हूँ जिनके कारण जीवन के इस दुर्गम पथ पर अनवरत बढ़ता जा रहा हूँ। आप भी तलाशिये, आपके भीतर भी आपके शिक्षक किसी न किसी ‘आदत’ के रूप में साँस ले रहे होंगे।
✍️ चिराग़ जैन
Chirag Jain Writings, Geet, Poetry, Unpublished Geet
युग बदला, हालात वही हैं
निर्बल पर आघात वही हैं
चेहरा बदला है चौसर ने
लेकिन शह और मात वही हैं
लगता है फिर महासमर से, बस थोड़ी ही दूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
फिर कुंती मजबूर हुई हैं, फिर कचरे में कर्ण मिले हैं
फिर पांचाली चीररहित है, फिर कुनबे के होंठ सिले हैं
महलों की फिर गोद भरे जो, क्षमता सिर्फ़ नियोगी की है
सत्ता या तो अंधे की है या नाकारा रोगी की है
हर शासन पाखण्डी निकला
न्यायालय भी मंडी निकला
अम्बा को वरदान मिला तो
उसका रूप शिखण्डी निकला
सब प्रतिशोधों से प्रेरित हैं, सबकी साध अधूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
गुरुकुल शिक्षा की रेवड़ियां, जाति देख कर बाँट रहे हैं
प्रतिभा का अपमान हुआ है, द्रोण अंगूठे काट रहे हैं
गुरुता स्वार्थ टटोल रही है, करुणा का पथ छोड़ चुकी है
रंगभूमि सारे नियमों को अपने हित में मोड़ चुकी है
आश्रम सभी अशुद्ध हुए हैं
विद्या पथ अवरुद्ध हुए हैं
परशुराम इक सूतपुत्र की
क्षमता लखकर क्रुद्ध हुए हैं
चिड़िया की हत्या कर देना, अर्जुन की मजबूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
कुंती पर भी प्रश्न उठाओ, बिन ब्याहे आह्वान किया क्यों
भीष्म पितामह से भी पूछो, अनुचित का सम्मान किया क्यों
क्यों दुःशासन ही दोषी हों, क्यों दुर्योधन ही दंडित हों
जो प्रतिकार नहीं कर पाए, वो क्योंकर महिमामंडित हों
हर इक सभा-समिति बदल दो
प्रतिशोधों की नीति बदल दो
अम्बा, भीष्म सुरक्षित होंगे
स्वयंवरों की रीति बदल दो
यह परिवर्तन कर देने को, हर मन की मंज़ूरी है अब
सच मानो, सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब
✍️ चिराग़ जैन