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पेपर लीक की महान परम्परा

चूंकि हमें लीक पर चलना अच्छा नहीं लगता, इसलिए हम पेपर लीक कराने में कीर्तिमान बनाने लगे हैं। हम उस सिस्टम के ख़िलाफ़ हैं, जिसमें परीक्षाओं की घोषणा होते ही विद्यार्थियों की नींद उड़ जाए और अध्यापक तथा अधिकारी मज़े की नींद सोते रहें।
हमने अनवरत मेहनत और लगन से एक ऐसी व्यवस्था तैयार की है जिसमें परीक्षा की तिथि घोषित होते ही अधिकारी जागने लगते हैं। कुछ अधिकारी इस चिंता में जागते हैं कि कहीं पेपर लीक न हो जाएं। और कुछ अधिकारी इस जुगाड़ में जागते हैं कि पेपर लीक हो जाए।
जैसे ‘रस्सी के आने-जाने से सिल पर निशान पड़ जाते हैं’ वैसे ही हमारे विद्यार्थियों को भी व्यवस्था ने यह विश्वास दिलाया है कि परीक्षा हो या न हो, पेपर ज़रूर लीक होगा। मानसून के आने में देरी हो सकती है, गर्मी-सर्दी-बरसात के शिड्यूल में परिवर्तन हो सकता है। लेकिन पेपर के लीक होने का मौसम किसी सूरत नहीं टल सकता। परीक्षा टल सकती है पर लीकेज नहीं टलेगी।
परीक्षा घोषित होते ही परीक्षार्थियों में शर्त लगती है, ‘बताओ पेपर ठीक होगा या लीक होगा?’ सट्टा बाज़ार में ‘ठीक होगा’ मुफ़्त में भी कोई दांव नहीं लगा रहा है और ‘लीक होगा’ के दांव की कीमत आसमान छूने लगी है।
हमें याद है, हमारे समय में परीक्षाएं किसी युद्ध से कम नहीं होती थीं। परीक्षा की तैयारियों के लिए छात्र-छात्राएं अपने घर-परिवार के ब्याह-शादियों का मोह छोड़कर मन-मसोसकर किताबों से चिपके रहते थे। सड़ी गर्मी में दूर-दूर पड़नेवाले परीक्षा केन्द्रों पर जैसे-तैसे पहुंचते थे। और उसके बाद परीक्षा केन्द्र पर इतनी सघन चैकिंग होती थी, मानो पूरी दुनिया के राष्ट्राध्यक्ष हमारे परीक्षा केन्द्र में घुसे बैठे हों। जेब से चूरण की पुड़िया तक निकलवा ली जाती थी।
इतनी सघन सुरक्षा के बीच पेपर लीक करानेवाले धुरंधरों को अंडरकवर एजेंट बनाकर पाकिस्तान भेज देना चाहिए। ये लोग देश की धरोहर हैं। इनकी प्रतिभा का सही उपयोग करने की ज़रूरत है।
पूरी धरती को काग़ज़ बनाकर, सातों समुद्रों को स्याही बना लिया जाए तो भी इन हुनरमंद लोगों के हुनर का बखान करना मुमकिन नहीं होगा। इसलिए मैं आजकल सीधे मोबाइल पर टाइप करने लगा हूं। कौन काग़ज़ और स्याही का टंटा पाले।
डिजिटल क्रांति से याद आया। हमारे यहां परीक्षा का फॉर्म भरते समय वेबसाइटों का सर्वर हांफने लगता है। तीन घंटे की फिल्म सवा दो मिनिट में डाउनलोड करनेवाले वाईफाई को भी दो पेज का फॉर्म भरने में तीन बार हार्टअटैक आ जाता है। पेमेंट गेटवे की कुशलता ऐसी है कि पेमेंट कटने के बाद नेटवर्क प्रॉब्लम उत्पन्न होती है और ट्रांज़िक्शन फेल हो जाती है। फिर कैप्चा कोड डालकर यह सिद्ध करना होता है कि हम रोबोट नहीं हैं।
फॉर्म भरने का किला फ़तह करने के बाद परीक्षार्थी फिंगर क्रॉस करके भगवान से मनाते हैं कि हे भगवान इस बार पेपर लीक न हो। परीक्षा करानेवाली एजेंसियां पेपर को किसी अनजान टापू पर किसी अंधेरी गुफ़ा में रखकर निश्चिंत हो जाती हैं। लेकिन परीक्षा के एक दिन पहले ही यह गोपनीय दस्तावेज, व्हाट्सएप्प पर फ्री डिलीवरी की तरह विचरण करने लगता है।
जिस देश में दूध की डिलीवरी फेल हो जाती है। रिटेल एप्लीकेशन्स की डिलीवरी लेट हो जाती है। लेकिन ‘पेपर लीक वॉरियर्स’ समय के इतने पाबन्द हैं कि आंधी आए या तूफ़ान इनके नेटवर्क कभी फेल नहीं होते। इसे कहते हैं डिजिटल क्रांति का सही उपयोग।
पेपर लीक होने के बाद जांच समितियों का गठन होता है। प्रभावित छात्र-छात्राएं बिलखते हुए प्रदर्शन करते हैं। अखबारों में बेरोज़गारी के आंकड़े छापे जाते हैं। टेलीविज़न पर बहस होती हैं कि कांग्रेस के शासन में ज़्यादा पेपर लीक हुए या भाजपा के ज़माने में। शोर-शराबा होता है। हंगामा मचने लगता है। लेकिन हमारी योग्य जांच समितियां बड़े सलीके से इस हंगामे को ठण्डे बस्ते में डाल देती हैं।
कुछ दिनों में परीक्षा में पूछे जानेवाले प्रश्न बदलने लगेंगे।
प्रश्न 1. वर्ष 2025 मे कुल कितने राज्यों में पेपर लीक हो पाया?
प्रश्न 2. यदि एक पेपर 10 लाख रुपये में लीक हुआ है, तो नीचेवाले बिचौलियों और उपरवाले साहबों के कमीशन के बाद मुख्य कर्मवीर को कितना मुनाफ़ा होगा?
प्रश्न 3. क्या महाभारत काल में पितामह भीष्म ने अर्जुन को अपनी मृत्यु का रहस्य बताकर पेपरलीक की महान परंपरा का प्रादुर्भाव किया था?
प्रश्न 4. जब पेपरलीक की प्रक्रिया कुछ दिनों में सम्पन्न हो जाती है, तो इसके दोषियों को सज़ा मिलने में दस-बीस साल क्यों लग जाते हैं?
वह दिन दूर नहीं जब परीक्षा की तैयारी करते परीक्षार्थी से उसका बेटा कहेगा, ‘इतनी टेंशन न लो यार पापा, भरोसा रखो, इस बार फिर पेपर लीक होगा।’

✍️ चिराग़ जैन

शिक्षकों की परछाईं

जब हम शिक्षा ग्रहण कर रहे होते हैं, तब शिक्षकों का ख़ूब उपहास करते हैं। कोई ऐसा शिक्षित न मिलेगा जिसने अपने शिक्षकों के विकृत नामकरण न किये हों। किन्तु जब हम संघर्ष की वीथियों पर चलते हैं, तब उन्हीं शिक्षकों के सामान्य व्यवहार में उच्चरित वाक्य हमारी समस्याओं का समाधान बन जाते हैं। यही कारण है कि उद्दण्ड से उद्दण्ड बालक भी जब परिपक्व होता है तो उसके हृदय में अपने शिक्षकों के प्रति सम्मान अवश्य उपजता है।
मुझे अपने शिक्षकों से अपार दुलार मिला। अनेक शिक्षक ऐसे रहे जो मित्र बनकर मेरे जीवन के अभिन्न अंग बन गए। मेरे समवयस्कों में मेरे मित्र बहुत कम रहे, इसीलिए मुझे अपनी आयु से दस-बीस-तीस वर्ष अधिक के मित्र भरपूर मिले।
मैंने नवमीं कक्षा में दरियागंज के जैन स्कूल में प्रवेश लिया। वहाँ मुझे ऐसे-ऐसे शिक्षक मिले जिनके स्नेह और आचरण ने मेरे चरित्र का निर्माण किया। संस्कृत के अध्यापक आचार्य गिरीश पुरी गोस्वामी जी से मैंने भाषा का संस्कार और कठिन परिस्थितियों में संयत रहने का गुण सीखा। वे शब्दों के अपव्यय के विरोधी हैं, इसीलिए सही जगह पर बिल्कुल सही शब्द प्रयोग करना उन्होंने मुझे अपने आचरण से सिखा दिया। हिन्दी के अध्यापक श्री राजबल्लभ पचौरी के साथ मेरी घनिष्ठता सबको पता थी। वाद-विवाद से लेकर काव्यपाठ और भाषण तक जिस भी प्रतियोगिता में जाना हो, मुझे उसकी अनुमति में कभी कोई संकट नहीं आया क्योंकि पचौरी सर की ओर से मुझे अभय प्राप्त था।
मेरे क्लास टीचर भी मुझे ‘पचौरी जी का चेला’ कहते हुए खीझते हुए ही सही, लेकिन अनुमति दे ही देते थे। संगीत के अध्यापक श्री चन्द्रकान्त पाटणकर जी का मैं अधिकृत स्टूडेंट नहीं था किंतु ‘लोकोच्चार प्रतियोगिता’ के लिए उनकी जान खाने का अधिकार मुझे उन्होंने सहर्ष प्रदान किया था। एक हमारे अध्यापक थे श्री जी एस अग्रवाल। वे हमें भूगोल और इतिहास पढ़ाते थे। उन्होंने कभी किसी विद्यार्थी को डाँटा नहीं, लेकिन यदि किसी लड़के के प्रति उन्होंने खिन्नता प्रकट भी कर दी तो इससे फ़र्क़ पड़ता था। वे अपने शिक्षार्थियों के प्रति बेहद सजग थे। वे हमारे एक ऐसे अध्यापक थे, जो पाठ्यक्रम रटाते नहीं, बल्कि सिखाते थे। एक बहुत ग़ुस्सेवाले अध्यापक थे श्री वी एस राही। उनकी दहशत पूरे स्कूल के लड़कों को थी, लेकिन जब स्कूल से निवृत्त हुआ तो समझ आया कि उनकी सख़्ती ने हमारे जीवन में अनुशासन के ऐसे बीज बो दिए जिन पर पल्लवित आदतें हमारी सफलता की प्रशस्ति बन गई। इसी विद्यालय के परिसर में श्री राजकुमार चिटकारा से कम बोलकर ज़्यादा करने का गुण ग्रहण किया; श्रीमती अलका गुप्ता और श्रीमती अंजू रगता से अपने कार्य के अतिरिक्त अन्य विषयों में ऊर्जा नष्ट न करने का व्यवहार सीखा; श्री राजेश जैन और श्री पी दास से अपने विषय में पारंगत होने का महत्व समझा।
उपप्राचार्य श्री एस सी रस्तोगी से कुशल नेतृत्व की क्षमताएँ और प्राचार्य डॉ बी डी जैन से प्रबंधन की परिवक्वता हासिल की। विद्यालयों में जीवन भर श्रेष्ठ नागरिक तैयार करनेवाले इन अध्यापकों का आभार व्यक्त तो नहीं किया जा सकता, किन्तु आज अपने व्यक्तित्व की परतों का अन्वेषण करता हूँ तो अपने एक-एक शिक्षक को अपने व्यवहार की एक-एक परत में जीवित पाता हूँ।
स्कूल से निकलकर कॉलेज में गया तो वहाँ अनेक शिक्षक ऐसे मिले जिन्होंने व्यक्तित्व के रॉ फ्लैट को डेकोरेट करके शानदार बना दिया। मैं कभी नहीं भूल सकता कि वर्ष 2004 में मुझे ‘जनसंचार के सिद्धांत’ पढ़ानेवाली अतिथि प्रवक्ता श्रीमती ऋतु नानन पाण्डेय को जब यह पता चला कि मैं एक कवि सम्मेलन के लिए बेल्जियम पहुँच रहा हूँ, तो वे नीदरलैंड से अपने परिवार के साथ मुझसे मिलने बेल्जियम आ पहुँची। कवि सम्मेलन करके जब मैं होटल पहुँचा तो पता चला कि एक फैमिली पिछले 2 घण्टे से रिसेप्शन पर बैठी मेरी प्रतीक्षा कर रही है। इस घटना ने मुझे एक बार फिर सिखाया कि विनम्रता किसे कहते हैं।
एक और अतिथि प्रवक्ता डॉ संध्या गर्ग ने जीवन में मातृत्व की भूमिका अदा की। आज भी जीवन की हर चुनौती में उनके मार्गदर्शन से समाधान खोज ही लेता हूँ। आज शिक्षक दिवस के अवसर पर मैं अपने सभी शिक्षकों का आभार व्यक्त करता हूँ जिनके कारण जीवन के इस दुर्गम पथ पर अनवरत बढ़ता जा रहा हूँ। आप भी तलाशिये, आपके भीतर भी आपके शिक्षक किसी न किसी ‘आदत’ के रूप में साँस ले रहे होंगे।

✍️ चिराग़ जैन

चर्चा बहुत ज़रूरी है अब

युग बदला, हालात वही हैं
निर्बल पर आघात वही हैं
चेहरा बदला है चौसर ने
लेकिन शह और मात वही हैं
लगता है फिर महासमर से, बस थोड़ी ही दूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब

फिर कुंती मजबूर हुई हैं, फिर कचरे में कर्ण मिले हैं
फिर पांचाली चीररहित है, फिर कुनबे के होंठ सिले हैं
महलों की फिर गोद भरे जो, क्षमता सिर्फ़ नियोगी की है
सत्ता या तो अंधे की है या नाकारा रोगी की है
हर शासन पाखण्डी निकला
न्यायालय भी मंडी निकला
अम्बा को वरदान मिला तो
उसका रूप शिखण्डी निकला
सब प्रतिशोधों से प्रेरित हैं, सबकी साध अधूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब

गुरुकुल शिक्षा की रेवड़ियां, जाति देख कर बाँट रहे हैं
प्रतिभा का अपमान हुआ है, द्रोण अंगूठे काट रहे हैं
गुरुता स्वार्थ टटोल रही है, करुणा का पथ छोड़ चुकी है
रंगभूमि सारे नियमों को अपने हित में मोड़ चुकी है
आश्रम सभी अशुद्ध हुए हैं
विद्या पथ अवरुद्ध हुए हैं
परशुराम इक सूतपुत्र की
क्षमता लखकर क्रुद्ध हुए हैं
चिड़िया की हत्या कर देना, अर्जुन की मजबूरी है अब
लगता है सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब

कुंती पर भी प्रश्न उठाओ, बिन ब्याहे आह्वान किया क्यों
भीष्म पितामह से भी पूछो, अनुचित का सम्मान किया क्यों
क्यों दुःशासन ही दोषी हों, क्यों दुर्योधन ही दंडित हों
जो प्रतिकार नहीं कर पाए, वो क्योंकर महिमामंडित हों
हर इक सभा-समिति बदल दो
प्रतिशोधों की नीति बदल दो
अम्बा, भीष्म सुरक्षित होंगे
स्वयंवरों की रीति बदल दो
यह परिवर्तन कर देने को, हर मन की मंज़ूरी है अब
सच मानो, सारे नियमों पर चर्चा बहुत ज़रूरी है अब

✍️ चिराग़ जैन

ज्ञान की सजावट

भारत में समाज सुधारकों की भरमार रही है लेकिन समाज सुधर न सका। इसका यह अर्थ नहीं है कि समाज सुधारकों के मन में कोई बेईमानी थी। इसका कारण यह है कि हमारी ग्राह्यता और उनकी सम्प्रेषणीयता में तारतम्य नहीं था। यदि ऐसा न होता तो एक नानक ही पर्याप्त थे समूची मानवता के लिए। एक महावीर ही बहुत थे प्राणिमात्र के चित्त में अहिंसा की प्रतिष्ठापना के लिए। एक तथागत के बाद अन्य किसी की आवश्यकता ही न होती। ये सब निष्ठा और ऊर्जा के चरम पर पहुँचे हुए लोग थे।
किन्तु हमारी ग्राह्यता इतनी क्षमतावान न हो सकी। हम समझने में चूक कर गए। हम वह सुन ही न सके जो इन सुधारकों ने कहा। हम उनके तत्पर्यों से दाएँ-बाएँ होते रहे। हमने अपने-अपने अर्थ गढ़ लिए।
उन्होंने कहा- ‘कन्या भ्रूण हत्या न करो’। हमने सुना- ‘कन्या के अतिरिक्त सबकी भ्रूण हत्या कर दो।’ उन्होंने कहा- ‘स्त्री को कमज़ोर मत समझो।’ हमने सुना- ‘कमज़ोर तो पुरुष है, उसे कुचल दो।’ उन्होंने कहा- ‘मज़हब के नाम पर मत लड़ो।’ हमने सुना- ‘अन्य किसी भी कारण से लड़ते रहो।’ उन्होंने कहा- ‘दहेज के लिए वधू को मत मारो।’ हमने सुना- ‘दहेज के ऐसे क़ानून बना दो कि वर को मारा जा सके।’
हमने वो सुना ही नहीं, जो वे कहना चाहते थे। उन्होंने सती प्रथा की कुरीति का विरोध किया। किसी जीते जागते प्राणी को चिता में झोंक देने की परंपरा का विरोध किया। उन्होंने विधवा स्त्रियों पर किये जाने वाले अत्याचारों के विरोध किया। लेकिन उन्होंने ऐसा कदापि नहीं कहा कि किसी विधवा स्त्री को उच्छृंखल होने दिया जाय। उन्होंने यह कतई नहीं कहा कि वैधव्य सहानुभूति अर्जित करने का ज़रिया बना दिया जाय।
उन्होंने जाति प्रथा का विरोध किया। मनुष्य को मनुष्य समझने की वक़ालत की। किन्तु हमने उनके इस प्रयास को पलट दिया। हमने पूर्व में शोषित होते रहे मनुष्यों के वंशजों को पूर्व के सवर्ण समुदाय की संतानों से बदला लेने के मार्ग खोल दिये। जिन्हें संभ्रांत बनाना था, उन्हें अराजक बनाने पर तुल गए हम।
नारियों को क़ानून के तराजू पर समानांतर रखने को कहा गया तो हमने क़ानून का तराजू ही झुका दिया। हमने नारी को इतनी हिम्मत न दी कि वह उचककर न्याय तंत्र को छू सके बल्कि हमने न्याय का संतुलित वृक्ष ही नारी के क़दमों में झुका डाला। अब अन्याय उलट गया। एक ही ओर झुकी-झुकी न्याय प्रक्रिया कुबड़ी हो गई है। हम समस्याओं का समाधान ढूंढते-ढूंढते समाधान को समस्या बना बैठे।
हम समझ ही न सके कि धरती पर न होने का अर्थ आकाश में होना नहीं है। लेकिन हम युगों-युगों से धरती से अनुपस्थित लोगों को तारों में ढूंढने की प्रक्रिया में व्यस्त हैं। हम मान बैठे हैं कि यदि कोई आस्तिक नहीं है तो वह नास्तिक ही होगा। हमने धारणा बना ली है कि जो इस्लाम को नहीं मानता वह क़ाफ़िर ही होगा। हम आश्वस्त हो गए हैं कि जो सत्य नहीं बोलता वह असत्य अवश्य बोलेगा।
कैसी मूर्खतापूर्ण मान्यता है। किसी ने कहा कि फलां धर्म का सम्मान करो, और हमने सुना कि बाकी सब धर्मों का अपमान करो। किसी ने कहा कि फलां धर्मग्रंथ में सब सच लिखा है और हम मान बैठे कि बाकी सब ग्रंथ झूठे हैं।
चूक सुधारकों से भी हुई है। उन्होंने प्रापक के स्तर को समझे बिना, उसकी समझ की फ्रीक्वेंसी को मापे बिना ही संदेश भेज दिया। यह समझा ही नहीं कि हवाई जहाज से जाने वाली डाक उस स्थान पर नहीं भेजनी चाहिए जहाँ हवाई अड्डा ही न बना है। संदेश का माध्यम क्या है यह कतई महत्वपूर्ण नहीं होना चाहिए, बल्कि संदेश का प्रभाव कितना है इसको मापदंड बनाना चाहिए।
विशेषणों ने बड़े विचारों की हत्या कर दी। सीधे कहना चाहिए था कि भ्रूण हत्या न करो। बस, बात यहीं सम्पन्न हो जाती। इसमें कन्या या कुमार का प्रश्न ही नहीं उठना चाहिए था। आपको स्पष्ट बोलना था कि न्याय निष्पक्ष होना चाहिए। इसमें स्त्री, पुरुष, दलित, सवर्ण, गोरा, काला जैसे शब्द जोड़ने की आवश्यकता ही नहीं थी। साफ-साफ कह देते कि मांसाहार न करो। इसमें गाय, सूअर, बकरा, कुत्ता न जोड़ते तो संदेश समाधान बन जाता।
ज्ञान की सजावट के चक्कर में आपने समाधान को समस्या बना दिया। आज तक हमने इस ढर्रे को बदला नहीं है। हम अभी तक विशेषणों की लुटिया में समाधान का सागर भरने की होड़ कर रहे हैं और यही कारण है कि हर सामाजिक आंदोलन की लुटिया डूबती जा रही है।

✍️ चिराग़ जैन

छेड़छाड़ का विरोध

दिल्ली और मुम्बई जैसे शहरों को पूरे देश का सेम्पल मानने की चूक सही नीतियों के निर्माण में सबसे बड़ी बाधा है। जेएनयू, जामिया और डीयू में किसी लड़की को राह चलते परेशान करना या छेड़ना किसी मनचले के लिए महंगा पड़ सकता है लेकिन कानपुर, इलाहाबाद, पटना, बनारस, लखनऊ जैसे शहरों में स्थिति ऐसी नहीं है। इन विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेने वाली लड़कियाँ छोटे शहरों, कस्बों और गाँव से आती हैं जहाँ ‘आज भी’ जागरूकता का आलम यह है कि छेड़छाड़ के किसी मुआमले की नुक्कड़-सभाओं में लड़कियों को ही दोषी माना जाता है। यदि कहीं कानूनी प्रक्रिया लड़की का पक्ष ले भी ले तो बाद में सामाजिक कानाफूसी से उपजा जनविरोध लड़कियों के लिए किसी प्रताड़ना से कम नहीं होता। यही वह स्थिति है कि कई शताब्दियों तक ‘बदनामी’ से बचने के लिए लड़कियाँ ‘बलात्कार’ के बाद भी थाने जाने से कतराती रहीं।
दिल्ली जैसे जागरूक शहर में भी आज तक ऐसे मुआमलात खूब होते हैं कि छेड़छाड़ का विरोध करने से पहले लड़की हिचकिचाती है कि लोग उसके बारे में बातें बनानी शुरू न कर दें।
छोटे शहरों की लड़कियों के मस्तिष्क में उनके माहौल ने यह धारणा बना दी होती है कि वे बड़े शहर की लड़कियों जितनी आधुनिक नहीं हैं इसलिए न तो उनमें लड़कों से बात करने का आत्मविश्वास होता है न ही उनकी बदतमीजी का विरोध करने का। उत्तर प्रदेश के अनेक विश्वविद्यालयों में पढ़ रही लड़कियों की स्थिति इतनी दयनीय है कि उन्हें अपने हॉस्टल से मेस तक जाने के लिए भी किसी साथिन की जरूरत होती है। बेंच पर दो-चार लड़के बैठे हों और लड़कियाँ वहाँ से गुजरें तो यह मुमकिन नहीं कि उन पर फब्ती न कसी जाए। यदि किसी लड़की का दुपट्टा पेड़ की झाड़ी में अटक जाए तो वह वहां रुक कर उसे निकालने में समय लगाते हुए अश्लील डायलॉग सुनने की अपेक्षा उसे त्याग कर आगे बढ़ जाना उचित समझती है। शाम के बाद तो सड़क पर किसी भी अकेली लड़की का रास्ता रोकने, हाथ पकड़ने, छातियाँ मसलने और किसी भी हद तक बढ़ जाने का अधिकार लड़कों को मिल जाता है।
इन परिस्थितियों में पढ़ना-लिखना तो दूर, साँस लेना तक कितना दूभर होता होगा इसकी कल्पना करने के लिए कुछ क्षण स्वयं को वहाँ खड़ा करना आवश्यक है। एक लड़का किसी लड़की को दबोच कर चूम ले और फिर रोज शाम अपने दोस्तों के साथ उसकी खामोश लाचारी का जुलूस निकालकर उस पर हँसता हुआ निकले तो कैसा लगता होगा इसका अनुमान लगाना जरूरी है। हॉस्टल के बाथरूम में नहाते हुए किसी लड़की की निगाह ऊपर के झरोखे से टकराए और वहाँ दो आँखें उसे बेशर्मी से टंगी हुई दिखाई दें तो कैसा एहसास होता होगा।
शिक्षाध्य्यन के समय इन संस्थानों की लड़कियों को यह पहेली भी बूझनी होती है कि इनके सामने से गुजरते हुए बेचारे लड़कों को अपने गुप्तांग खुजाने का नियम क्यों निभाना पड़ता है?
मैं हमेशा आश्चर्य करता था कि इस दमघोंटू माहौल में रहकर पढ़ना और फिर अपनी काबिलियत सिद्ध करके उन्नति करना कितना मुश्किल होता होगा। इन छोटे शहरों की लड़कियों का चेहरा अपने ध्यान में लाकर एक बार हम सबको यह प्रश्न स्वयं से करना चाहिए कि इन मासूम परियों को हमने कितनी मुसीबत में डाल दिया है? हमें सोचना चाहिए कि इतनी सारी जिल्लत सहकर भी मौन रहने की इनकी विवशता हमारी कौन सी परंपराओं और संस्कारों के सम्मिलन से जन्मी है?
पहली बार इन डरी हुई बच्चियों ने इस देश के प्रशासन को अभिभावक समझ कर इन हरकतों की शिकायत की है। इन्हें फटकार लगाकर चुप रहने को न कहें। इनके साथ वह सुलूक न करें जो अब तक इनके माता-पिता करते आए हैं। इनके साथ मारपीट न करें हुजूर, सच मानिए, इन्हें किसी लड़के ने छेड़ा इसमें इनका कोई कुसूर नहीं है।
बेटियों को बचाने की जिम्मेदारी प्रशासन उठा ले तो बेटियों को पढ़ाने में किसी परिवार में हिचक न होगी। एक बात और, ये सब लड़कियाँ किसी और मुल्क से भागकर आईं शरणार्थी नहीं हैं, ये हमारे आंगन में गूंजी वही किलकारियां हैं जिनका आकर्षण हमें दफ्तर से घर लौटने के लिए बेताब कर देता है।

✍️ चिराग़ जैन

वाराणसी विश्वविद्यालय में लड़कियों की सुरक्षा की मांग के संदर्भ में।

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