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पीर के गाँव

प्रेम की राह में पीर के गाँव हैं प्रेम फिर भी हमेशा लुभावन हुआ एक सावन बिना प्रेम पतझर बना पतझरों ने छुआ प्रेम; सावन हुआ जब नदी ने समुन्दर छुआ झूम कर तब नदी की सुधा को निचोड़ा गया अपहरण कर लिया सूर्य ने देह का और बादल उसे ओढ़ बौरा गया हिमशिखर में ढली, आँसुओं-सी गली छू...
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