सादगी
आधा मन लेकर विभीषण बनोगे
ज्यादा मन लेकर रावण बनोगे
सादा मन लेकर राम बन जाओगे
✍️ चिराग़ जैन
आधा मन लेकर विभीषण बनोगे
ज्यादा मन लेकर रावण बनोगे
सादा मन लेकर राम बन जाओगे
✍️ चिराग़ जैन
अगर भाषाओं से धर्म की पहचान होती तो हिन्दी के पास रसखान और रहीम नहीं होते तथा उर्दू के पास फ़िराक़ और गुलज़ार नहीं होते।
राजनीति को मुर्गे लड़ाने का चस्का हो, तो वह कहीं और जाए, भाषाएँ तो आश्रमों की संतति होती हैं।
रामप्रसाद बिस्मिल और भगतसिंह की भाषा को पराया मानने की प्रवृत्ति हमें संस्कृति ही नहीं, अपितु शहीदों के अपमान की भी आदत डाल देगी।
जिनकी लेखनी पर हिन्दी का साहित्य अभिमान कर सकता है उन मुंशी प्रेमचंद की रचनाओं के ‘गबन’, ‘क़फ़न’ तथा ‘ईदगाह’ जैसे शीर्षक आपकी घृणा से मिटाए नहीं जा सकेंगे।
संस्कृति और लोगों के दिलों से उर्दू को ग़ायब करने का सपना देखने वालों को पहले न्यायपालिका से उर्दू की शब्दावली हटाने का प्रयास करना होगा। और न्यायपालिका भी छोड़िए साहिब, अपनी ख़ुद की बोलचाल से जिस दिन उर्दू को ग़ायब कर दो, उस दिन उर्दू के मुँह पर कालिख पोतने का दुस्साहस करना।
आप घृणा उलीचकर एकाध क्यारी ध्वस्त कर सकते हो लेकिन भाषाई सौहार्द के बगीचे को ध्वंस नहीं कर सकते। क्योंकि उर्दू ‘हिन्दी’ के नाम में सुरक्षित है। आपकी कड़वाहट उर्दू की मिठास पर कभी हावी नहीं हो सकेगी, क्योंकि उर्दू हमारे थानों में संरक्षित है, उर्दू हमारी अदालतों में सुरक्षित है। आप उर्दू का नाम नहीं मिटा पाएंगे, क्योंकि उर्दू वीर शिरोमणि सिख गुरुओं के नाम में है। आप कभी भी उर्दू को हमारे देश से दूर नहीं कर पाएंगे, क्योंकि उर्दू के बाबा ‘शेख फ़रीद’ की कविताओं को हमने ‘सबद’ कहकर गाया है।
उर्दू को पराया कहना ठीक ऐसा ही है ज्यों कोई अपने घर में जन्मी बिटिया को ‘पराया’ कहकर तिरस्कृत करे। उर्दू को मिटाना है तो नेताजी सुभाषचंद्र बोस से ‘जय हिंद’ का उद्घोष छीनकर दिखाओ। उर्दू से घृणा करनी है तो ‘सरफ़रोशी की तमन्ना’ जैसे तरानों से घृणा करो। उर्दू को उखाड़ना है तो क्रांतिकारियों के दिलों में बसे ‘इंक़लाब ज़िन्दाबाद’ के नारे को उखाड़ने की कोशिश करो। उर्दू को मिटाना है तो चन्द्रशेखर आज़ाद के नाम से ‘आज़ाद’ उपनाम को मिटाने का जतन करो।
छोड़िए साहिब, राजनीति चंद वोटों के लिए घृणा का तेज़ाब छिड़कने से नहीं रुकेगी और ये देश हमें सिखाता रहेगा कि राम ने रावण की लंका में रहनेवाले विभीषण से भी परहेज नहीं किया। लंका के वैद्य से अपने भाई का इलाज करवाने में भी संदेह नहीं किया। लंका की ओर से लड़नेवाले इन्द्रजीत तक के शव का अपमान नहीं होने दिया। यह राम का देश है साहिब, यहाँ जूठे बेर भी सानन्द ग्रहण किये जाते हैं, यहाँ घृणा का कारवां बहुत दूर तक नहीं चल सकता।
✍️ चिराग़ जैन
छोटी बहू के
घूंघट न काढ़ने की आदत
सासू को अखरती है
और बड़ी बहू
लम्बे से घूंघट में मोबाइल छिपाकर
आराम से
वीडियो काॅल करती है
✍️ चिराग़ जैन
धूप, कंगूरों की रंगत को चाट गई जब धीरे-धीरे
तब बुनियादों की मज़बूती दीवारों के काम आ गई
होठों पर ताले लटके थे, संवादों पर बर्फ़ जमी थी
आखर-आखर आतंकित था, हर आहट सहमी-सहमी थी
सबके अपने-अपने सुख थे, सबके अपने-अपने कमरे
तब छोटी-सी एक मुसीबत, परिवारों के काम आ गई
फिर बुनियादों की मज़बूती दीवारों के काम आ गई
अपनेपन का आलिंगन भी कुछ पल ही मन को भाता है
प्रेम घड़ी भर दूर नहीं हो, तो वह पिंजरा बन जाता है
बेमतलब की भावुकता का बोझ डुबो ही देता किश्ती
तब कुछ व्यवहारिक पतवारें, मझधारों के काम आ गई
फिर बुनियादों की मज़बूती दीवारों के काम आ गई
जड़ की अनदेखी करते हैं, फुनगी पर इतरानेवाले
फिर-फिर धरती पर आते हैं, उड़कर ऊपर जानेवाले
जब ख़ुद के ईश्वर होने से ईश्वर का मन ऊब गया है
तब कुछ इंसानी लीलाएँ, अवतारों के काम आ गई
फिर बुनियादों की मज़बूती दीवारों के काम आ गई
✍️ चिराग़ जैन
सर्द हवाओं के प्रकोप से निकलकर, देह जब मंद समीर के स्पर्श से खिल उठती है; तब वसंत घटित होता है। कोहरे की सत्ता में दबी-दुबकी धरती जब रश्मियों के गुनगुने स्पर्श से रोमांचित हो उठती है; तब वसंत घटित होता है। जाड़े का ऊनी बोझा छोड़कर जब बदन, सरसों का तेल मलकर धूप सेंकते हुए मीठी नींद में गोते लगाता है, तब वसंत घटित होता है।
वसंत का आगमन पूरी सृष्टि को संकुचन के श्रम से मुक्त करके विस्तार के आनंद का आमंत्रण देता है। वसंत इस सत्य की सूचना है कि विपत्ति में जो वनस्पति बदरंग होकर बदसूरत दिखने लगती है, समय बदलने पर उसी की रंगत से वसुंधरा सिंगर सकती है।
खेतों में फूली हुई सरसों, बाग में महक उठी गुलदाउदी, क्यारियों में मोती की चादर बनकर पसरी हुई जिप्सी ग्रास, अपनी नाज़ुक डालियों पर इतराकर खिल उठा गेंदा, हज़ारों रंगों की कल्पनाएँ साकार करता ट्यूलिप, पीले और हरे रंग के लाजवाब संयोजन से खिल उठे डूरंटा व फ़ाइकस और न जाने कितने ही पौधे उतावले हो होकर वसुंधरा को सुन्दर बनाने पर तुल जाते हैं। लाल चम्पा उचककर गुलाब की पाँखुरियों को चिढ़ाने लगती है। उधर गुडहल हाथ बढ़ाकर अपने होने का शोर मचाने लगता है। गुलाब अपनी राजसी ठसक के साथ अपने कंटीले सुरक्षाचक्र में बैठा हुआ कनखियों से इन सबको देखता रहता है।
खेत गोभी के गुलदस्ते से सज उठते हैं और मटर की झालरों से क्यारियों की किस्मत सँवर जाती है। मेंढ़ पर गाजर, मूली, चुकंदर, शलगम, की पत्तियाँ बाँहें खोलकर सूर्य की किरणों का स्वागत करती दिखाई देती हैं। उधर आम, महुआ, चीकू और लोकाट सरीखे वृक्ष सृष्टि को सर्दी की भीषण तपस्या का फल देने की तैयारी करने लगते हैं। इस ऋतु में बादल आकाश से ग़ायब नहीं होते, बल्कि छितराकर आकाश मे वंदनवार की तरह लटक जाते हैं।
सूर्य की किरणों से पहाड़ी बर्फ पिघलती है तो नदियों के संगीत में हर्ष और उल्लास के साज जुड़ जाते हैं। मौसम खुलता है तो मन भी अपनी एक-एक पाँखुरी खोल देता है। किसी बगीचे की तरह ही मन में भी प्रेम और भोग के फूल खिल उठते हैं। फूलों के आभूषण से सजा अनंग, अंग-अंग में लास्य कर उठता है। हरियाली देखकर आँखों की चमक बढ़ जाती है।
कुल मिलाकर, पाँचों इंद्रियों की क्षुधापूर्ति के लिए इस ऋतु में रस उपलब्ध हो जाता है। यही कारण है कि रसराज और ऋतुराज का संयोग सहज लगता है। वाणी रसराज से विभूषित होती है और धरती ऋतुराज से। यहाँ तक कि धवला माँ सरस्वती भी पीले गेंदे और नीले अपराजिता को स्वीकार कर लेती हैं। एक ओर वीणा के तार छिड़ जाते हैं तो दूसरी ओर बाँसुरी बज उठती है। योग और भोग का सुंदर समागम है वसंत। श्वेत और पीत का अलौकिक संयोग है वसंत। वसंत इस सत्य का उद्घाटन है कि सृष्टि का कोई भी तत्व यदि संतुलन की मर्यादा न छोड़े तो वह जगत् के शृंगार का कारण बन जाता है।
सो आइये, अवचेतन को अध्यात्म की देहरी पर विराजित करके, चेतना की पाँचों इंद्रियों को वसंत का भोग करने का आमंत्रण दें। स्पर्शन को धूप का गुनगुना एहसास दें। रसना को खेतों की ताज़गी भोगने दें। घ्राण को प्रकृति की गंध का भोग लगाएं। चक्षु को बगीचे के रंगों का सुख दें और कर्ण को पंछियों के कलरव से लेकर नदियों की कलकल तक का आनंद उठाने दें।
✍️ चिराग़ जैन