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सादगी

आधा मन लेकर विभीषण बनोगे ज्यादा मन लेकर रावण बनोगे सादा मन लेकर राम बन जाओगे ✍️ चिराग़ जैन

उर्दू और भारत

अगर भाषाओं से धर्म की पहचान होती तो हिन्दी के पास रसखान और रहीम नहीं होते तथा उर्दू के पास फ़िराक़ और गुलज़ार नहीं होते। राजनीति को मुर्गे लड़ाने का चस्का हो, तो वह कहीं और जाए, भाषाएँ तो आश्रमों की संतति होती हैं। रामप्रसाद बिस्मिल और भगतसिंह की भाषा को पराया मानने...

आधुनिकता और संस्कार

छोटी बहू के घूंघट न काढ़ने की आदत सासू को अखरती है और बड़ी बहू लम्बे से घूंघट में मोबाइल छिपाकर आराम से वीडियो काॅल करती है ✍️ चिराग़...

बुनियादों की मज़बूती

धूप, कंगूरों की रंगत को चाट गई जब धीरे-धीरे तब बुनियादों की मज़बूती दीवारों के काम आ गई होठों पर ताले लटके थे, संवादों पर बर्फ़ जमी थी आखर-आखर आतंकित था, हर आहट सहमी-सहमी थी सबके अपने-अपने सुख थे, सबके अपने-अपने कमरे तब छोटी-सी एक मुसीबत, परिवारों के काम आ गई फिर...

वसन्त का मौसम

सर्द हवाओं के प्रकोप से निकलकर, देह जब मंद समीर के स्पर्श से खिल उठती है; तब वसंत घटित होता है। कोहरे की सत्ता में दबी-दुबकी धरती जब रश्मियों के गुनगुने स्पर्श से रोमांचित हो उठती है; तब वसंत घटित होता है। जाड़े का ऊनी बोझा छोड़कर जब बदन, सरसों का तेल मलकर धूप सेंकते...
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