वक़्त
दिल बच्चा है; सपनों के संग पिकनिक करता रहता है
बूढ़ा एक दिमाग़ हमेशा चिकचिक करता रहता है
वक़्त; जिसे तुम पूरी दुनिया का सरताज समझते हो
मेरी इक दीवार घड़ी में टिकटिक करता रहता है
✍️ चिराग़ जैन
दिल बच्चा है; सपनों के संग पिकनिक करता रहता है
बूढ़ा एक दिमाग़ हमेशा चिकचिक करता रहता है
वक़्त; जिसे तुम पूरी दुनिया का सरताज समझते हो
मेरी इक दीवार घड़ी में टिकटिक करता रहता है
✍️ चिराग़ जैन
जब हम शिक्षा ग्रहण कर रहे होते हैं, तब शिक्षकों का ख़ूब उपहास करते हैं। कोई ऐसा शिक्षित न मिलेगा जिसने अपने शिक्षकों के विकृत नामकरण न किये हों। किन्तु जब हम संघर्ष की वीथियों पर चलते हैं, तब उन्हीं शिक्षकों के सामान्य व्यवहार में उच्चरित वाक्य हमारी समस्याओं का समाधान बन जाते हैं। यही कारण है कि उद्दण्ड से उद्दण्ड बालक भी जब परिपक्व होता है तो उसके हृदय में अपने शिक्षकों के प्रति सम्मान अवश्य उपजता है।
मुझे अपने शिक्षकों से अपार दुलार मिला। अनेक शिक्षक ऐसे रहे जो मित्र बनकर मेरे जीवन के अभिन्न अंग बन गए। मेरे समवयस्कों में मेरे मित्र बहुत कम रहे, इसीलिए मुझे अपनी आयु से दस-बीस-तीस वर्ष अधिक के मित्र भरपूर मिले।
मैंने नवमीं कक्षा में दरियागंज के जैन स्कूल में प्रवेश लिया। वहाँ मुझे ऐसे-ऐसे शिक्षक मिले जिनके स्नेह और आचरण ने मेरे चरित्र का निर्माण किया। संस्कृत के अध्यापक आचार्य गिरीश पुरी गोस्वामी जी से मैंने भाषा का संस्कार और कठिन परिस्थितियों में संयत रहने का गुण सीखा। वे शब्दों के अपव्यय के विरोधी हैं, इसीलिए सही जगह पर बिल्कुल सही शब्द प्रयोग करना उन्होंने मुझे अपने आचरण से सिखा दिया। हिन्दी के अध्यापक श्री राजबल्लभ पचौरी के साथ मेरी घनिष्ठता सबको पता थी। वाद-विवाद से लेकर काव्यपाठ और भाषण तक जिस भी प्रतियोगिता में जाना हो, मुझे उसकी अनुमति में कभी कोई संकट नहीं आया क्योंकि पचौरी सर की ओर से मुझे अभय प्राप्त था।
मेरे क्लास टीचर भी मुझे ‘पचौरी जी का चेला’ कहते हुए खीझते हुए ही सही, लेकिन अनुमति दे ही देते थे। संगीत के अध्यापक श्री चन्द्रकान्त पाटणकर जी का मैं अधिकृत स्टूडेंट नहीं था किंतु ‘लोकोच्चार प्रतियोगिता’ के लिए उनकी जान खाने का अधिकार मुझे उन्होंने सहर्ष प्रदान किया था। एक हमारे अध्यापक थे श्री जी एस अग्रवाल। वे हमें भूगोल और इतिहास पढ़ाते थे। उन्होंने कभी किसी विद्यार्थी को डाँटा नहीं, लेकिन यदि किसी लड़के के प्रति उन्होंने खिन्नता प्रकट भी कर दी तो इससे फ़र्क़ पड़ता था। वे अपने शिक्षार्थियों के प्रति बेहद सजग थे। वे हमारे एक ऐसे अध्यापक थे, जो पाठ्यक्रम रटाते नहीं, बल्कि सिखाते थे। एक बहुत ग़ुस्सेवाले अध्यापक थे श्री वी एस राही। उनकी दहशत पूरे स्कूल के लड़कों को थी, लेकिन जब स्कूल से निवृत्त हुआ तो समझ आया कि उनकी सख़्ती ने हमारे जीवन में अनुशासन के ऐसे बीज बो दिए जिन पर पल्लवित आदतें हमारी सफलता की प्रशस्ति बन गई। इसी विद्यालय के परिसर में श्री राजकुमार चिटकारा से कम बोलकर ज़्यादा करने का गुण ग्रहण किया; श्रीमती अलका गुप्ता और श्रीमती अंजू रगता से अपने कार्य के अतिरिक्त अन्य विषयों में ऊर्जा नष्ट न करने का व्यवहार सीखा; श्री राजेश जैन और श्री पी दास से अपने विषय में पारंगत होने का महत्व समझा।
उपप्राचार्य श्री एस सी रस्तोगी से कुशल नेतृत्व की क्षमताएँ और प्राचार्य डॉ बी डी जैन से प्रबंधन की परिवक्वता हासिल की। विद्यालयों में जीवन भर श्रेष्ठ नागरिक तैयार करनेवाले इन अध्यापकों का आभार व्यक्त तो नहीं किया जा सकता, किन्तु आज अपने व्यक्तित्व की परतों का अन्वेषण करता हूँ तो अपने एक-एक शिक्षक को अपने व्यवहार की एक-एक परत में जीवित पाता हूँ।
स्कूल से निकलकर कॉलेज में गया तो वहाँ अनेक शिक्षक ऐसे मिले जिन्होंने व्यक्तित्व के रॉ फ्लैट को डेकोरेट करके शानदार बना दिया। मैं कभी नहीं भूल सकता कि वर्ष 2004 में मुझे ‘जनसंचार के सिद्धांत’ पढ़ानेवाली अतिथि प्रवक्ता श्रीमती ऋतु नानन पाण्डेय को जब यह पता चला कि मैं एक कवि सम्मेलन के लिए बेल्जियम पहुँच रहा हूँ, तो वे नीदरलैंड से अपने परिवार के साथ मुझसे मिलने बेल्जियम आ पहुँची। कवि सम्मेलन करके जब मैं होटल पहुँचा तो पता चला कि एक फैमिली पिछले 2 घण्टे से रिसेप्शन पर बैठी मेरी प्रतीक्षा कर रही है। इस घटना ने मुझे एक बार फिर सिखाया कि विनम्रता किसे कहते हैं।
एक और अतिथि प्रवक्ता डॉ संध्या गर्ग ने जीवन में मातृत्व की भूमिका अदा की। आज भी जीवन की हर चुनौती में उनके मार्गदर्शन से समाधान खोज ही लेता हूँ। आज शिक्षक दिवस के अवसर पर मैं अपने सभी शिक्षकों का आभार व्यक्त करता हूँ जिनके कारण जीवन के इस दुर्गम पथ पर अनवरत बढ़ता जा रहा हूँ। आप भी तलाशिये, आपके भीतर भी आपके शिक्षक किसी न किसी ‘आदत’ के रूप में साँस ले रहे होंगे।
✍️ चिराग़ जैन
तुम खरगोशों के अनुयायी
मैं हूँ कछुए का पथगामी
बचपन के किस्सों से पूछो
आख़िर में जय किसकी होगी
जब सारस को आमंत्रित कर
खीर परोसी थी थाली में
लम्बी चोंच लिए बेचारा
कैसे जल पीता प्याली में
दृश्य मगर परिवर्तित होगा
सारस का भी दिन आएगा
शर्बत युक्त सुराही होगी
धूर्त देख कर पछताएगा
बंदर को छलने की नीयत
मूर्ख मगर को रिस्की होगी
बचपन के किस्सों से पूछो
आख़िर में जय किसकी होगी
आज कथा का पहला दिन है
आज बया का घर टूटेगा
संत लुटेगा, चोर हँसेगा
पाप अभी चांदी कूटेगा
लेकिन ज्यों ज्यों बात बढ़ेगी
कौआ मीठा जल पाएगा
ऊँची हांडी की खिचड़ी से
बूढ़ा ब्राह्मण फल पाएगा
वैसा हाल बनेगा उसका
जैसी करनी जिसकी होगी
बचपन के किस्सों से पूछो
आख़िर में जय किसकी होगी
ताल किनारे लक्कड़हारा
सच कहने का फल पाएगा
भगत बना बगुला खुद इक दिन
कर्क गरल से छल जाएगा
हाथी को चींटी डस लेगी
सच का मुश्किल पंथ नहीं है
न्याय अगर है न्यून जहाँ तक
वह किस्से का अंत नहीं है
खुद गड्ढे में गिर जाएगा
जिसने भी साजिश की होगी
बचपन के किस्सों से पूछो
आख़िर में जय किसकी होगी
✍️ चिराग़ जैन
बचपन में हमें सुनाई गई दादी-नानी की कहानियों में दोस्ती को कभी अच्छी नज़र से देखने की परम्परा नहीं रही। यदि कभी किसी कहानी ने बन्दर और मगरमच्छ में दोस्ती करवाई भी तो उसके सद्भाव को अंततः मगरमच्छ की धूर्तता के हलक़ में उतर जाना पड़ा। एकाध बार शेर और चूहे की असंभव दोस्ती की कहानियाँ सुनाई गईं तो उसको भी स्वार्थ के जाल में बांधकर भौंथरा कर दिया गया। सारस और लोमड़ी की दोस्ती हुई तो सारस की बुद्धिमत्ता का ढोल पीटने के लिए दोस्ती की खीर में नींबू निचुड़वा दिया। हंस और केकड़े की दोस्ती केकड़े की प्रवृत्तियों की भेंट चढ़ गई। कुल मिलाकर बचपन से ही हमारे अवचेतन में ‘दोस्ती-वोस्ती कुछ नहीं होती’ जैसे वाक्य रोंप दिए जाते हैं।
इसके बावजूद हमने ‘कोई जब राह न पाए, तो हरदम साथ निभाए, तेरी दोस्ती तेरा प्यार’ जैसे फ़िल्मी झाँसों में फँसकर कुछ दोस्त बना लिए और उनके साथ धरम-वीर जैसा रिश्ता भी क़ायम कर लिया। लेकिन अवचेतन में पड़े बचपन के बीजों ने जय-बीरू की दोस्ती को राजेश्वर और वीरसिंह की दुश्मनी में तब्दील करके एक-दूसरे की जान का सौदागर बना डाला।
किस्से-कहानियों और फिल्मों से विरक्त होकर धर्मग्रन्थ उठाए तो पता चला कि मनसुखा और कृष्ण जैसे निश्छल सम्बन्ध बचपन में बन जाते हैं जो ‘भाई नी है’ जैसे अजेय मन्त्रों के सहारे निस्पृहता का यज्ञ संपन्न कर लेते हैं। लेकिन किशोरावस्था आते-आते व्यक्तिगत हित इतनी वरीयता तो पा ही लेते हैं कि दाँत किटकिटाने का बहाना बनाकर दोस्त के हिस्से के चने खा जाने में लज्जा आनी बंद हो जाती है। बचपन की इन्हीं ग़लतियों के परिणामस्वरूप गृहस्थी की विपन्नता के बावजूद संपन्न मित्र से सहायता मांगने में संकोच उत्पन्न होने लगता है।
कर्ण और दुर्याेधन की दोस्ती में कुछ गहराई दिखी तो उनका रिश्ता समर्पण की इस सीमा तक चला गया कि एक-दूसरे को सत्पथ पर लाने की बजाय एक-दूसरे के निर्णय का सम्मान करते हुए विनाश के चौबारे तक चले आए। अश्वत्थामा ने अपने प्रतिशोध को दुर्याेधन की मित्रता के रथ पर चढ़ाकर शिशुघात तक का महापाप कर डाला।
मानस् के महानायक ने निषादराज, सुग्रीव, विभीषण जैसे अनेक मित्र बनाए; लेकिन कूटनीति के झरोखे से झाँकने पर ज्ञात होता है कि ये सभी मित्र बनाए हुए मित्र थे, बने हुए नहीं। यह सोद्देश्य मित्रता थी, निस्पृहता का भाव यहाँ आया भी, तो सशंक।
कुल मिलाकर, दोस्ती के नाम पर हमें जो भी रिश्ते मिलते हैं, उन सबके आधार को हमारे अवचेतन में पड़ी कहानियों, पौराणिक सन्दर्भों और सिनेमा की प्रतिच्छाया ने जर्जर किया हुआ है।
✍️ चिराग़ जैन
दोस्त वो नहीं जिसका आपके पास फ्रेंडशिप डे का सबसे पहला मेसेज आए। दोस्त वो जो फ्रेंडशिप डे के दिन आपसे फोन मिलाकर बोले – “साले तूने मुझे याद क्यों नहीं दिलाया कि आज फ्रेंडशिप डे है, कमीने तेरी भाभी को रात 12 बजे wish नहीं कर सका।”
और भी गहरा दोस्त वो है जो आपको बोले – “अबे मेरी एफबी से अपनी भाभी को कोई मस्त सा फ्रेंडशिप डे मेसेज भेज दे यार।”
और भी गहरा दोस्त वो है जो फ्रेंडशिप डे के दिन तुम्हें 20 बार फोन करे लेकिन उसे तुमको फ्रेंडशिप डे wish करना याद न रहे।
…दोस्त वो है, जो तुम्हारे साथ formal होने की बात सोच भी न सके; दुनियादारी तो दुनिया निभाती है।
✍️ चिराग़ जैन