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सर्दी : एक श्वेतवर्णा बूढ़ी दादी

कँपकँपाते शरीर को सफेद चादर में लपेटे हुए रोज़ सुबह एक बूढ़ी दादी ठंडे-ठंडे हाथों से गाल छूती है। मैं झल्लाकर सिर तक रजाई खींच लेता हूँ। दादी हँसकर रसोई में जाती है और सरसों के साग की ख़ुशबू से मेरे आलस्य में व्यवधान करती है। खेतों में हरी सब्ज़ियों की ताज़गी देखकर बूढ़ी...

ख़ौफ़

इश्क़ को बेदर्दियों का ख़ौफ़ है ताज़रों को फ़र्दियों का ख़ौफ़ है जानवर इन्सान का दुश्मन कहाँ आदमी को वर्दियों का ख़ौफ़ है ओस, कोहरा, बर्फ़ और ठण्डी हवा बेघरों को सर्दियों का ख़ौफ़ है ज़ख़्म को मरहम न मिल जाए कहीं ज़ुल्म को हमदर्दियों का ख़ौफ़ है मन के जज़्बातों को दुनिया में ‘चिराग़’...
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