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आचार्य विद्यासागर की समाधि

सभी का मन सशंकित हो रहा था
बहुत दिन से कहीं कुछ खो रहा था
जुड़े सब हाथ ढीले पड़ गए थे
पनीले नेत्र पीले पड़ गए थे
तपस्या चरम तक आने लगी थी
ये भौतिक चर्म कुम्हलाने लगी थी
व्रतों पर नूर इतना चढ़ गया था
कि तन का रंग फीका पड़ गया था

हुई जर्जर तपस्यायुक्त काया
तो यम सल्लेखना का व्रत उठाया
किया आचार्य के पद से किनारा
व्रती ने मृत्यु तक का मौन धारा

सुना जिसने, वही थम-सा गया था
गला सूखा, हलक जम-सा गया था
ख़बर ये फैलती थी आग बनकर
हृदय छलका सहज अनुराग बनकर
श्रमण सब बढ़ चले विश्वास लेकर
तपस्वी के दरस की आस लेकर
दिगम्बर साधुओं के संघ दौड़े
हृदय के संग सारे अंग दौड़े

व्रती अंतिम तपस्या कर रहा था
अभागा तन विरह से डर रहा था
हठी तप में जुटा था मौन साधे
खड़ी थी मृत्यु दोनों हाथ बांधे
धरा पर भाग्य जागा था मरण का
उसे अवसर मिला गुरु के वरण का

बिताए तीन दिन यूँ ही ठहर कर
मगर फिर रात के तीजे पहर पर
अचानक साँस की ज़ंजीर तोड़ी
वियोगी ने ये नश्वर काय छोड़ी
चले, त्रैलोक्य तक विस्तार करके
गए ज्यों राम सरयू पार करके

दिगम्बर साधना का बिंदु खोया
व्रतों का चंद्रगिरि में इंदु खोया
धरा से त्याग का प्रतिरूप लेकर
चली हो सांझ जैसे धूप लेकर
पिपासा से अमिय का कूप लेकर
चली है मौत जग का भूप लेकर

प्रजा जागी तो बस माटी बची थी
प्रयोजन गौण, परिपाटी बची थी
चिता में जल रहा दिनमान देखा
सभी ने सूर्य का अवसान देखा
धरा का धैर्य दूभर कर गया है
धरा से स्वयं विद्याधर गया है

✍️ चिराग़ जैन

विदा आचार्य श्री

आज संतत्व का एक उदाहरण साकार से निराकार हुआ है। आज तपश्चर्या का एक बिम्ब अंतर्धान हुआ है। निश्छल दिगंबरत्व की एक गाथा का पटाक्षेप हुआ है। आज आस्था और विवेक के एक अद्वितीय संगम की समाधि हुई है। आध्यात्मिक ऊर्जा के विराट केंद्र का स्थानांतरण हुआ है।
आचार्य श्री विद्यासागर जी का देह से विदेह हो जाना हमारी लौकिक आस्था को आहत कर रहा है। दुनिया के किसी भी कोने में रहते हुए आचार्य श्री का स्मरण यह एहसास कराता था कि एक देह में हमारे हिस्से के आशीष का वास इस धरती पर विराजमान है।
यह एहसास अभी भी यथावत रहेगा, किन्तु कल्पनाओं के चित्रपट पर अब वह चित्र नहीं उभरेगा जिसमें एक 77 वर्षीय बालक खिलखिलाता हुआ अपनी हथेलियाँ उठाकर आस्था को आशीर्वाद के अमृत से तृप्त कर देता था।
आचार्य श्री की हथेलियाँ जब आशीर्वाद के लिए ऊर्ध्वगामी होती थीं, तब उनकी उंगलियाँ जुड़ने की बजाय फैल जाती थीं। मानो, एक पिता अपने बालकों की समृद्धि के लिए अपना जी खोलकर वात्सल्य लुटा देना चाहता हो। उनके अधरों से मुस्कराहट कभी गौण नहीं होती थी, मानो एक बुज़ुर्ग अपनी फुलवारी को फलते-फूलते देखकर आह्लादित हुआ जाता हो।
…अब वह दिव्य मुस्कान अलभ हो गई। अब आचार्य श्री के अस्तित्व से भौतिक नयन वंचित हो गए हैं। अब आचार्य श्री की अनुभूति से भौतिक इन्द्रियाँ नदीदी हो गई हैं। अब आचार्य श्री तक पहुँचने के लिए लौकिक यातायात साधन असमर्थ हो गए हैं। अब तक आचार्य श्री को निहारनेवाली आँखों को उनके दर्शन के लिए अब मुंदना होगा। अब आचार्य श्री बाहर कहीं नहीं मिलेंगे। अब आचार्य श्री तक के लिए चलना नहीं, ठहरना होगा।
जैन आगम के अनुसार समाधि पर रोना नहीं चाहिए। जैन आगम के अनुसार मृत्यु को महोत्सव मानना चाहिए।
किन्तु मेरी आँखें रह-रहकर नम हुई जा रही हैं, मेरे लिए एक अनवरत महोत्सव की मृत्यु हुई है।
आचार्य परमेष्ठी को नमोस्तु!

✍️ चिराग़ जैन

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